वर्षों से न्याय के इंतजार में पीढ़ियां-दर-पीढ़ियां
-डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा केन्द्रीय विधि एवं न्याय मंत्रालय के गत वर्ष के आंकड़ों की ही मानें तो देश के उच्च न्यायालयों और जिला न्यायालयों में ही 65 लाख से अधिक मुकदमे निर्णय के इंतजार में दशकों से प्रतीक्षारत हैं। 3 हजार से अधिक मामले तो
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा


-डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

केन्द्रीय विधि एवं न्याय मंत्रालय के गत वर्ष के आंकड़ों की ही मानें तो देश के उच्च न्यायालयों और जिला न्यायालयों में ही 65 लाख से अधिक मुकदमे निर्णय के इंतजार में दशकों से प्रतीक्षारत हैं। 3 हजार से अधिक मामले तो 50 साल भी अधिक समय से लंबित हैं। 10 साल या इससे अधिक समय से निर्णय का इंतजार कर रहे मुकदमों की बात करें तो यह संख्या इतनी अधिक है कि सोचने पर मजबूर कर देती है। देश के 25 उच्च न्यायालयों व राज्यों के जिला अदालतों में लबित मुकदमों की बात की जाए तो यह सामने आ रहा है कि 54 लाख 58 हजार 832 मुकदमे 10 से 20 साल की अवधि के हैं और निष्पादन का इंतजार कर रहे हैं। 20 से 30 साल और 30 से 40 साल की अवधि के निर्णय के इंतजार के मुकदमे भी लाखों में हैं। सालों से लोक अदालतें भी लग रही हैं पर मुकदमों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है।

अदालतों की कार्यप्रणाली पर टिप्पणी नहीं की जा सकती क्योंकि नित नए सुधार और मुकदमों के अंबार से स्वयं अदालतों में बैठे माननीय न्यायाधीश, सर्वोच्च अदालत और सरकार चिंतित और गंभीर है। इसका हल खोजने के प्रयास जारी हैं। चिंता की बात यह है कि उच्च न्यायालयों और जिला न्यायालयों में 50 साल से अधिक समय से आज भी 3442 मुकदमे चल रहे हैं। इनमें से 2329 मुकदमे उच्च न्यायालयों व 1113 मुकदमे जिला न्यायालयों में पेंडिंग हैं।

मुकदमों की संख्या को लेकर सवाल नहीं है क्योंकि यदि 50 साल से एक मुकदमा भी पेंडिंग है तो यह अपने आप में गंभीर है। सवाल 50 साल की अवधि का विश्लेषण करने का भी है। 50 साल की अवधि का मतलब कई मामलों में तो निश्चित रुप से अदालतों में हाजिरी देते-देते दो से तीन पीढ़ियां खप गई होंगी। दोनों ही अदालतों में 50 साल से अधिक अवधि के लंबित मुकदमों में सिविल प्रकरण ही अधिक है। निश्चित रुप में इनमें से अधिकांश मामले जमीन जायदाद को लेकर होंगे। हालांकि दोनों अदालतों के मिलाकर 459 मुकदमें आपराधिक श्रेणी के हैं और 50 साल से अधिक समय से निर्णय के इंतजार में है। अब आज से 50 साल पहले जिसने भी जैसा भी अपराध किया था या जिसने भी जैसा भी अपराधी के कारण मानसिक-शारीरिक संताप या प्रताड़ना झेली थी उनमें से कई तो हो सकता है दुनिया में न हों या उनकी शारीरिक-मानसिक हालत का अंदाजा लगाया जा सकता है।

सरकार और सर्वोच्च न्यायालय के स्तर पर इस समस्या पर गंभीर चिंतन किया जाता रहा है। इसके समाधान खोजने के प्रयास भी किये जाते रहे हैं। अच्छी बात है कि अब सर्वोच्च न्यायालय में माननीय न्यायाधीशों के अधिकांश पद भरे रहने लगे हैं। समग्र प्रयासों से उच्च न्यायालयों और जिला अदालतों के न्यायमूर्तियों के पद भी भरने के प्रति गंभीर प्रयास जारी हैं। पर तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि एक मोटे अनुमान के अनुसर उच्च न्यायालयों के करीब 1100 से अधिक स्वीकृत पदों में से 300-350 से अधिक पद रिक्त चल रहे हैं। जहां तक जिला अदालतों का प्रश्न है, एक मोटे अनुमान के अनुसार करीब 4 से 5 हजार पद रिक्त हैं। इसमें दो राय नहीं कि इससे काम प्रभावित होता है। पर दस साल से अधिक के कुल मिलाकर 65 लाख से अधिक मुकदमों में निर्णय का इंतजार कहीं ना कहीं हमारी व्यवस्था पर प्रश्न तो उठाता ही है।

इसी तरह से निस्तारण में देरी के लिए किसी पर दोष जड़ने से भी कोई समाधान नहीं होने वाला है। यह कोई विवाद का विषय भी नहीं होना चाहिए। कुछ इस तरह का सिस्टम विकसित करना होगा जिससे पुराने मुकदमों को प्राथमिकता से निपटाया जा सके। सरकार ने कुछ माह पहले कानून में संशोधन कर सुधार की दिशा में कदम बढ़ाये हैं। उससे निस्तारण की समय-सीमा तय होगी। पर कुछ इस तरह का रोस्टर सिस्टम या केवल और केवल पुराने मुकदमों के निस्तारण के लिए अलग से ही माननीय न्यायाधीशों की बेंच बना दी जाएं तो प्राथमिकता से वर्षों से न्याय की आस में चल रहे मुकदमों का निष्पादन हो सके। न्यायालयों व सरकार दोनों के पास मुकदमों की वर्षवार बकाया सूची उपलब्ध है। यह तय हो जाए कि प्रति कार्यदिवस निश्चित संख्या में पुराने मुकदमों की भी सुनवाई होगी तो बैकलॉग निपटाना आसान हो जाएगा। इन मुकदमों से जुड़े वकीलों का भी यह दायित्व हो जाता है कि पक्ष-विपक्ष दोनों के वकील मुकदमे के निस्तारण में सहभागी बनें। इससे अदालतों में पुराने मुकदमों का बोझ कम होगा और लोगों को न्याय मिल सकेगा। अदालत और संबंधित व्यक्तियों दोनों को राहत मिल सकेगी।

(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

---------------

हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश