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शिमला, 12 अगस्त (हि.स.)। हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने कहा है कि रोजगार कार्यालय में नाम दर्ज होने या पंजीकरण कराने मात्र से किसी उम्मीदवार को सरकारी नौकरी में सीधी भर्ती का कानूनी अधिकार नहीं मिल जाता। अदालत ने कहा कि सरकारी नौकरी के लिए संबंधित भर्ती नियमों के तहत पद और पात्रता का होना जरूरी है।
मुख्य न्यायाधीश जी.एस. संधावालिया और न्यायमूर्ति बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने पी.ई.टी. शिक्षकों की भर्ती से जुड़े मामले में यह टिप्पणी की। खंडपीठ ने सिंगल बेंच के पहले दिए गए फैसले को बरकरार रखते हुए नौ अपीलकर्ताओं की याचिकाएं खारिज कर दीं।
मामला फिजिकल एजुकेशन डिप्लोमा धारकों की सरकारी स्कूलों में नियुक्ति से जुड़ा था। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि वे रोजगार कार्यालय में पंजीकृत हैं और उनसे जूनियर कुछ लोगों को रोजगार कार्यालय के माध्यम से नियुक्ति दी गई है। ऐसे में उन्हें भी समानता के आधार पर सरकारी नौकरी दी जानी चाहिए।
उच्च न्यायालय ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने पाया कि शिक्षा विभाग ने वर्ष 1997 के बाद फिजिकल एजुकेशन डिप्लोमा धारकों की नियमित सीधी भर्ती नहीं की है। इस दौरान पी.टी.ए. और पैरा-टीचर नीतियों के तहत बड़ी संख्या में नियुक्तियां की गईं।
अदालत के सामने रखे गए रिकॉर्ड के अनुसार प्रदेश में शारीरिक शिक्षकों का कुल कैडर 1,527 पदों का है। भर्ती नियमों के तहत इनमें 25 प्रतिशत पद सीधी भर्ती के लिए रखे गए हैं। यह संख्या 382 पद बनती है। हालांकि, सरकार इस कोटे से अधिक 645 पदों पर नियुक्तियां कर चुकी है। इस स्थिति में सीधी भर्ती के कोटे में कोई पद उपलब्ध नहीं बचा है।
याचिकाकर्ताओं ने जिन कर्मचारियों का उदाहरण दिया, उच्च न्यायालय ने उनकी नियुक्तियों की स्थिति भी देखी। अदालत ने कहा कि इन कर्मचारियों की सेवाएं 95 प्रतिशत सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों से सरकार की विशेष नीति के तहत ली गई थीं। अपीलकर्ता इस श्रेणी में नहीं आते। इसलिए वे उन नियुक्तियों के आधार पर अपने लिए समानता या भेदभाव का दावा नहीं कर सकते।
खंडपीठ ने कहा कि अदालत किसी नागरिक के पक्ष में नियुक्ति का आदेश तभी दे सकती है, जब कानून या भर्ती नियमों के तहत उसका कोई कानूनी अधिकार बनता हो। केवल रोजगार कार्यालय में पंजीकरण होने से सरकारी नौकरी पाने का पूर्ण अधिकार पैदा नहीं होता।
उच्च न्यायालय ने यह भी माना कि पी.टी.ए. और पैरा-टीचरों के नियमितीकरण के कारण सीधी भर्ती के लिए निर्धारित कोटा पहले ही निर्धारित सीमा से काफी आगे निकल चुका है। इसका असर अब पदोन्नति के कोटे पर भी पड़ रहा है।
इस आधार पर खंडपीठ ने सिंगल बेंच के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया और नौ अपीलकर्ताओं की याचिकाएं खारिज कर दीं।
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हिन्दुस्थान समाचार / उज्जवल शर्मा