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शिमला, 14 जुलाई (हि.स.)। हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि पति की मृत्यु के बाद अनुकंपा के आधार पर नियुक्त हुई किसी चतुर्थ श्रेणी की महिला कर्मचारी को केवल इस वजह से नियमितीकरण के लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता कि वह अपने गृह क्षेत्र से करीब 300 किलोमीटर दूर जाकर नौकरी जॉइन नहीं कर सकी। अदालत ने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में महिला कर्मचारी की पारिवारिक जिम्मेदारियों और भौगोलिक कठिनाइयों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
न्यायाधीश जिया लाल भारद्वाज की एकल पीठ ने नोरात्रु देवी की ओर से हिमाचल प्रदेश राज्य वन निगम के खिलाफ दायर याचिका पर यह फैसला सुनाया। अदालत ने कहा कि विभाग का रवैया उचित नहीं था और याचिकाकर्ता को नियमितीकरण के अधिकार से वंचित नहीं किया जाना चाहिए था।
मामले के अनुसार नोरात्रु देवी के पति लेख राम हिमाचल प्रदेश राज्य वन निगम में दैनिकभोगी चौकीदार थे। वर्ष 1996 में उनकी मृत्यु हो गई। इसके बाद नोरात्रु देवी को जनवरी 1999 में अनुकंपा के आधार पर दैनिकभोगी चौकीदार के रूप में नियुक्त किया गया। वह चंबा जिले के जनजातीय और दुर्गम पांगी क्षेत्र में अपनी सेवाएं दे रही थीं।
वर्ष 2011 में वन निगम ने उन्हें नियमित करने का विकल्प दिया, लेकिन इसके साथ यह शर्त रखी कि नियमित होने के बाद उन्हें नाहन या बिलासपुर स्थित रेजिन एंड टरपेन्टाइन फैक्ट्री में अनस्किल्ड वर्कर के रूप में कार्यभार संभालना होगा। नोरात्रु देवी ने निगम से अनुरोध किया कि वह अकेली महिला हैं, उनके छोटे बच्चे हैं और उनके लिए पांगी से लगभग 300 किलोमीटर दूर जाकर नौकरी करना संभव नहीं है। उन्होंने पांगी में ही नियमित करने की मांग की, लेकिन निगम ने इसे स्वीकार नहीं किया। इस कारण उन्हें वर्ष 2011 में नियमितीकरण का लाभ नहीं मिल सका। बाद में अगस्त 2015 में उन्हें पांगी इकाई में ही चपरासी के पद पर नियमित किया गया।
याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में मांग की कि उन्हें वर्ष 2011 से नियमित कर्मचारी माना जाए, क्योंकि उसी समय उनके साथ कार्यरत अन्य कर्मचारियों को नियमित किया गया था। अदालत ने कहा कि नोरात्रु देवी ने कम उम्र में अपने पति को खो दिया था और उनके ऊपर बच्चों की जिम्मेदारी थी। ऐसे में एक चतुर्थ श्रेणी की महिला कर्मचारी से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह अपने बच्चों को छोड़कर सैकड़ों किलोमीटर दूर जाकर नौकरी करे। अदालत ने यह भी कहा कि आज भी पांगी जैसे जनजातीय, बर्फबारी वाले और कठिन क्षेत्र में तैनाती से कई कर्मचारी बचते हैं, जबकि याचिकाकर्ता वहीं सेवाएं देने के लिए तैयार थीं।
हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों के हितों को ध्यान में रखते हुए आदेश दिया कि नोरात्रु देवी को जुलाई 2011 से काल्पनिक आधार पर नियमित माना जाए, जिस समय उनके साथ के अन्य कर्मचारियों का नियमितीकरण हुआ था। अदालत ने स्पष्ट किया कि वर्ष 2011 से 2015 के बीच उन्होंने नियमित पद पर कार्य नहीं किया था, इसलिए उस अवधि का वास्तविक वेतन नहीं मिलेगा। हालांकि उनकी वरिष्ठता और नियमितीकरण से जुड़े अन्य सभी परिणामी लाभ सुरक्षित रहेंगे।
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हिन्दुस्थान समाचार / उज्जवल शर्मा