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जयपुर, 04 फ़रवरी (हि.स.)। राजस्थान हाईकोर्ट की खंडपीठ ने प्रदेश में सार्वजनिक निर्माण कार्यों की दरें तय करने वाली बीएसआर (बेसिक शेड्यूल ऑफ रेट्स) को पिछले दो साल से नहीं बदलने व नए टेंडर्स से प्राइस वेरिएशन क्लॉज हटाए जाने को गंभीर माना है। साथ ही राज्य सरकार से पूछा है कि बीएसआर को क्यों नहीं बदला गया। यह भी पूछा है कि मौजूदा बाजार दरों की तुलना में पुराने बीएसआर को लागू रखने का क्या औचित्य है और क्या नियमों के तहत प्राइस वेरिएशन क्लॉज हटाने की अनुमति ली गई थी।
खंडपीठ ने कहा कि राज्य सरकार अपने जिम्मेदार अधिकारी के जरिए हलफनामा दाखिल करे, जिसमें इन सभी सवालों के जवाब हों। मामले की आगामी सुनवाई 19 फरवरी 2026 को तय की है। एक्टिंग सीजे संजीव प्रकाश शर्मा व जस्टिस संगीता शर्मा की खंडपीठ ने ओमप्रकाश मीना की पीआईएल पर दिया। मामले से जुड़े अधिवक्ता महेन्द्र शांडिल्य ने बताया कि प्रार्थी सिविल वर्क कॉन्ट्रेक्टर है। पीएचईडी विभाग सहित अन्य विभागों ने राजस्थान पब्लिक वर्क्स फाइनेंस एंड अकाउंट्स रूल्स के स्पष्ट प्रावधानों का उल्लंघन करते हुए न तो समय पर बीएसआर जारी किया और न ही वित्त विभाग से अनुमति लेकर टेंडरों की शर्तों में बदलाव किया। इतना ही नहीं जल जीवन मिशन और अमृत 2.0 जैसी बड़ी योजनाओं के लिए भी टेंडर जारी करते हुए प्राइस वेरिएशन क्लॉज को पूरी तरह से हटा दिया गया। प्र्रार्थी की ओर से आरोप लगाया कि कई नए टेंडरों में प्राइस वेरिएशन क्लॉज को पूरी तरह से हटाया है। जबकि नियमानुसार हर साल बीएसआर का पुनरीक्षण जरूरी है ताकि बाजार में श्रम और सामग्री की वास्तविक दरों को प्रतिबिंबित किया जा सके। लेकिन साल 2023-24 के बाद प्रदेश में नया बीएसआर जारी नहीं किया, जबकि बाजार दरों में गिरावट हुई है। यह न केवल नियमों के विरुद्ध है, बल्कि इससे राजस्व का भी नुकसान हो रहा है। प्राइस वेरिएशन क्लॉज हटाकर ठेकेदारों को अनुचित लाभ व राज्य को नुकसान पहुंचाया जा रहा है। यह राजस्थान पब्लिक वर्क्स फाइनेंस एंड अकाउंट्स रूल्स और राज्य की घोषित नीति के विपरीत है।
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हिन्दुस्थान समाचार / पारीक