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- महाशिवरात्रि को निकलेगी भोलेनाथ की बरात, तैयारियां शुरू-महाशिवरात्रि पर्व को लेकर शल्लेश्वर मंदिर में महोत्सव भी शुरू-नौंवी सदी में मठ, गुंबद के जरिए बने मंदिर में स्थापित है शिवंलग
हमीरपुर, 12 फरवरी (हि.स.)। उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जिले में शल्लेश्वर मंदिर और इसमें स्थापित शिवलिंग का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा है। इसे गुप्त काल में निर्मित कराया गया था। महाशिवरात्रि पर्व पर इस बार भी शिव बारात की शोभायात्रा निकालने की तैयारी शुरू कर दी गई है।
हमीरपुर जिले के सरीला कस्बे में शल्लेश्वर मंदिर का इतिहास हजारों साल पुराना है। इस मंदिर की नक्काशी भी बड़ी ही अद्भुत है जो खजुराहो के मंदिर से मिलती है। यहां महाशिवरात्रि पर्व पर शिव बारात की शोभायात्रा निकालकर भगवान भोले नाथ का विवाह कराए जाने की परम्परा वर्ष 1972 से चली आ रही है। अबकी बार महाशिवरात्रि के दिन इस मंदिर में शिव बारात निकालकर शिव और पार्वती का विवाद कराने की सभी रस्में सम्पन्न करायी जायेगी। नगर सांस्कृतिक समिति के सचिव महेन्द्र राजपूत मंत्री ने बताया कि महाशिवरात्रि के दिन सुबह से ही प्राचीन शल्लेश्वर मंदिर में जलाभिषेक होगा।
बुन्देलखंड के अलावा पड़ोसी मध्यप्रदेश के कई इलाकों से कांवरिए यहां आकर भगवान भोले नाथ का जलाभिषेक करेंगे। इसके बाद दोपहर बाद शिव बारात की शोभायात्रा पूरे नगर में धूमधड़ाके के साथ निकाली जाएगी। शोभायात्रा में इस बार भी तमाम हाथी, घोड़े और नयनाभिराम झांकियां भी शामिल होगी। शिव बारात में पछइयां और भी नाचेगी। शिव बारात की शोभायात्रा की झांकियां बनाने का काम भी शुरू है।
गुप्तकाल में शल्लेश्वर मंदिर का कराया गया था निर्माण
समाजसेवी महेन्द्र राजपूत व इतिहासकार डाॅ.बीडी प्रजापति ने बताया कि शल्लेश्वर धाम मंदिर सरीला में प्राचीनतम शिवलिंग में एक है। यहां बने मठ को देख प्रतीत होता है कि इसका निर्माण गुप्तकाल एवं चंदेलकाल के मध्य कराया गया है। लेकिन शिवलिंग को देखने से लगता है कि इसका निर्माण चंदेलकाल के पूर्व हुआ है। मठ में गुम्बद दीवार होने के कारण यह मंदिर चंदेलकालीन प्रतीत होता है। मौजूदा में इस मंदिर का सुन्दरीकरण हो चुका है।
नरेश छत्रसाल से शुरू हुई थी सरीला स्टेट की वंशावली
सरीला कस्बे के समाजसेवी महेन्द्र सिंह राजपूत ने बताया कि सरीला स्टेट की वंशावली महाराज छत्रसाल से प्रारम्भ हुयी थी और आज यह सरीला स्टेट हमीरपुर की एक तहसील है। बुन्देलखण्ड में गुप्तकाल को स्वर्ण काल माना गया है। गुप्तकाल में ही सरीला क्षेत्र में मंदिरों, गुफाओं व वास्तुकला का उदय हुआ था जबकि इसके पहले यहां मंदिरों का कोई उल्लेख नहीं है। गुप्तकाल में बने मंदिरों का विस्तार चंदेलकाल तक चरम सीमा पर रहा।
मुस्लिम शासकों के आधीन रहा है वीरभूमि के मंदिर
यहां के इतिहासकार डाॅ. भवानीदीन प्रजापति ने बताया कि बुन्देलखंड क्षेत्र के इलाकों में चंदेलों का साम्राज्य नौवीं शताब्दी में स्थापित हुआ था। चंदेलकाल में प्रथम शासक चंद्रवर्धन हुये जो चन्द्रवंशी क्षत्रिय थे। क्षेत्र में सर्वाधिक मंदिरों का निर्माण चंदेल शासन काल में हुआ था। राजा परमाल 1202 में कुतुबुद्दीन एबक से हारने के बाद कालिंजर चले गये थे। उनके जाने के बाद सरीला समेत वीर भूमि के इलाके मुस्लिम शासकों के आधीन रहे थे।
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हिन्दुस्थान समाचार / पंकज मिश्रा