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यमुनानगर, 12 फ़रवरी (हि.स.)। यमुनानगर में महाशिवरात्रि पर्व से पूर्व आचार्य पंडित कमलेश शास्त्री द्वारा बातचीत करते हुए इस महापर्व के धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला गया। उन्होंने कहा कि महाशिवरात्रि केवल एक पर्व नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, संयम और शिवत्व को अपने जीवन में धारण करने का दिव्य अवसर है।
आचार्य ने बताया कि फाल्गुन कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाया जाने वाला यह पर्व भगवान शिव और माता पार्वती के दिव्य विवाह का प्रतीक है। मान्यता है कि इसी रात्रि में भगवान शिव का प्राकट्य हुआ था। इस दिन विधि-विधान से व्रत, उपवास और रात्रि जागरण करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है तथा समस्त कष्टों का निवारण होता है। उन्होंने व्रत के विधान की जानकारी देते हुए कहा कि श्रद्धालुओं को प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए तथा शिवालय में जाकर शिवलिंग पर जल, दूध, दही, शहद, घी और गंगाजल से अभिषेक करना चाहिए।
बिल्वपत्र, धतूरा, आक के पुष्प और सफेद पुष्प अर्पित करना अत्यंत शुभ माना गया है। “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जाप और रुद्राभिषेक करने से मन की शुद्धि होती है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। आचार्य कमलेश शास्त्री ने कहा कि महाशिवरात्रि का वास्तविक संदेश अहंकार त्यागकर सरल, सात्विक और संयमित जीवन अपनाना है। भगवान शिव त्याग, तप और करुणा के प्रतीक हैं। उनके आदर्शों को आत्मसात कर समाज में सद्भाव, प्रेम और भाईचारे को बढ़ावा देना ही इस पर्व की सार्थकता है। उन्होंने समस्त श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे इस पावन अवसर पर नशामुक्ति, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक सद्भाव का संकल्प लें तथा मंदिरों में अनुशासन और स्वच्छता बनाए रखें। आचार्य ने विश्वास व्यक्त किया कि श्रद्धा और विधि-विधान से किया गया पूजन भक्तों के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि लेकर आएगा।
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हिन्दुस्थान समाचार / सुशील कुमार