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वाराणसी, 25 मई (हि.स.)। भारतीय कृषि अनुसंधान परिसर—भारतीय सब्जी अनुंसधान संस्थान वाराणसी में विकसित मटर की उन्नत एवं उच्च उत्पादक किस्म ‘काशी नंदिनी’ के व्यावसायीकरण की दिशा में सोमवार को महत्वपूर्ण कदम उठाया गया। संस्थान ने इस किस्म के उत्पादन एवं वितरण के लिए नेशनल एग्रो फार्मिंग मल्टी स्टेट को-ऑपरेटिव सोसाइटी लिमिटेड (नैफको), नई दिल्ली के साथ लाइसेंस समझौते पर हस्ताक्षर किए।
समझौते पर संस्थान के निदेशक डॉ. राजेश कुमार तथा नैफको की ओर से समित सक्सेना ने हस्ताक्षर किए। इस पहल को कृषि क्षेत्र में सार्वजनिक–निजी सहभागिता को मजबूत करने तथा किसानों को गुणवत्तायुक्त बीज समय पर उपलब्ध कराने की दिशा में अहम माना जा रहा है। इस अवसर पर निदेशक डॉ. राजेश कुमार ने कहा कि संस्थान किसानों की आय बढ़ाने, पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने और टिकाऊ कृषि विकास को बढ़ावा देने के उद्देश्य से उच्च उत्पादकता वाली किसान हितैषी सब्जी किस्मों के विकास पर लगातार कार्य कर रहा है। उन्होंने कहा कि निजी एवं सहकारी संस्थाओं के माध्यम से उन्नत किस्मों का लाइसेंस हस्तांतरण गुणवत्तायुक्त बीजों के तीव्र उत्पादन और व्यापक वितरण में सहायक सिद्ध होगा। उन्होंने कहा कि अनुसंधान संस्थानों और किसानों के बीच इस प्रकार की साझेदारियाँ तकनीकी सेतु का कार्य करती हैं तथा कृषि आधारित उद्यमिता को नई दिशा प्रदान करती है।
संस्थान के वैज्ञानिकों के अनुसार ‘काशी नंदिनी’ मटर की शीघ्र परिपक्व होने वाली उन्नत किस्म है। इसमें प्रति पौधा औसतन 7 से 8 फलियाँ लगती हैं, जबकि फलियों की लंबाई 8 से 9 सेंटीमीटर तक होती है। प्रत्येक फली में लगभग 8 से 9 दाने पाए जाते हैं तथा इसका शेलिंग प्रतिशत 47 से 48 प्रतिशत तक है। यह किस्म प्रति हेक्टेयर 110 से 120 क्विंटल तक उत्पादन देने में सक्षम मानी गई है।
लाइसेंस हस्ताक्षर समारोह में विभागाध्यक्ष एवं प्रधान वैज्ञानिक डॉ. डी. पी. सिंह, डॉ. नीरज सिंह, डॉ. त्रिभुवन चौबे, डॉ. सुदर्शन मौर्य तथा डॉ. ज्योति देवी उपस्थित रहीं। कार्यक्रम का समन्वयन वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. इन्दीवर प्रसाद माैजूद रहें।
डॉ. इन्दीवर प्रसाद ने संस्थान की प्रौद्योगिकी प्रबंधन इकाई (आईटीएमयू) की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए बताया कि यह इकाई संस्थान द्वारा विकसित नवाचारों एवं तकनीकों के व्यावसायीकरण, लाइसेंसिंग और व्यापक प्रसार के लिए सक्रिय रूप से कार्य कर रही है।
हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी