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प्रोडक्शन व डिस्कवरी के कानूनी अंतर से बहाल हुआ 23 साल पुराना मुकदमा
जोधपुर, 06 मार्च (हि.स.)। राजस्थान हाईकोर्ट ने एक रिपोर्टेबल फैसले में स्पष्ट किया है कि दस्तावेज पेश करने के आदेश की पालना न होने पर किसी भी दीवानी मुकदमे को खारिज नहीं किया जा सकता। जस्टिस संदीप शाह की कोर्ट ने हनुमानगढ़ के भादरा निवासी ओमप्रकाश व अन्य की अपील पर सुनवाई करते हुए वहां के ट्रायल कोर्ट के 3 सितंबर 2008 का मुकदमा खारिज करने का आदेश रद्द कर दिया है। कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि डिस्कवरी ऑफ डॉक्यूमेंट्स और प्रोडक्शन ऑफ डॉक्युमेंट्स कानूनन दो अलग प्रक्रियाएं हैं।
दरअसल अपीलकर्ता स्व. ओमप्रकाश, ललिता देवी, दीपक कुमार आदि ने भादरा निवासी बलवंत, भूपसिंह और अन्य के खिलाफ साल 2003 में 6.30 लाख रुपये में तय हुए जमीन सौदे की पालना को लेकर मुकदमा दर्ज कराया था। प्रतिवादियों के वकील ने तर्क दिया था कि उन्होंने जमीन बेचने का करार नहीं किया, बल्कि वादी से केवल 1.10 लाख रुपये का कर्ज लिया था और वादी धोखाधड़ी कर रहे हैं। बचाव पक्ष के वकील ने ट्रायल कोर्ट में प्रार्थना पत्र लगाकर वादी से 1999 से 2001 तक के मूल बही-खाते पेश करने की मांग की। 23 मार्च 2006 को भादरा कोर्ट ने वादी को खाते पेश करने का आदेश दिया। वादी ने बताया कि मूल खाते उनके पिता के पास गांव नेठराणा में हैं। वे केवल अपने पास मौजूद दस्तावेज ही पेश कर सकते हैं। कोर्ट के आदेश की पूर्ण पालना न होने पर, एडीजे कोर्ट ने 3 सितंबर 2008 को सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 11 नियम 21(1) के तहत वादी का पूरा मुकदमा ही खारिज कर दिया था। वादी ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी।
हाईकोर्ट ने नियमों की व्याख्या करते हुए अपने फैसले में लिखा कि डिस्कवरी ऑफ डॉक्यूमेंट्स और प्रोडक्शन ऑफ डॉक्युमेंट्स कानूनन दो अलग अवधारणाएं हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आदेश 11 नियम 21(1) के तहत मुकदमा खारिज करने या बचाव खत्म करने जैसी दंडात्मक कार्रवाई केवल नियम 11 (प्रश्नावली), नियम 12 (दस्तावेजों की खोज) या नियम 15 (निरीक्षण) के उल्लंघन पर ही की जा सकती है। नियम 14 (दस्तावेजों को पेश करना) इसके दायरे से पूरी तरह बाहर है। कोर्ट ने कहा कि किसी का दावा खारिज करने का नियम केवल दुर्लभतम मामलों में इस्तेमाल होना चाहिए, जहां पक्षकार की अदालत के आदेश की अवहेलना करने की जानबूझकर की गई कोशिश साबित हो।
हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि वह 3 सितंबर 2008 के स्तर से ही इस मामले की सुनवाई दोबारा शुरू करे। चूंकि यह मुकदमा 2003 का है, इसलिए कोर्ट ने ट्रायल जल्द पूरा करने के निर्देश दिए हैं। इसके साथ ही कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रतिवादी चाहें तो साक्ष्य अधिनियम की धारा 65 के तहत सेकेंडरी एविडेंस पेश करने या विपरीत निष्कर्ष निकालने के लिए कानूनन उचित आवेदन ट्रायल कोर्ट में कर सकते हैं।
हिन्दुस्थान समाचार / सतीश