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जयपुर, 07 जनवरी (हि.स.)। राजस्थान उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार की ओर से एक साथ बडी संख्या में शिक्षकों के तबादले करने पर सवाल उठाए हैं। इसके साथ ही अदालत ने कहा कि बीच सत्र शिक्षकों के तबादले करना न सिर्फ गलत है, बल्कि शिक्षा व्यवस्था और विद्यार्थियों के हितों के भी खिलाफ है। वहीं अदालत ने एक समान मामले में अलग-अलग तरह के फैसले देने पर सिविल सेवा अपीलीय अधिकरण को आडे हाथों लिया है। अदालत ने अधिकरण के अध्यक्ष और सदस्य पारदर्शिता रखें। वहीं अदालत ने कार्मिक सचिव को कहा है कि अधिकरण के अध्यक्ष व सदस्यों के प्रशिक्षण की उचित व्यवस्था करें, ताकि भविष्य में ऐसी स्थिति का सामना नहीं करना पडे। जस्टिस अशोक कुमार जैन की एकलपीठ ने यह आदेश प्रिंसिपल हरगोविंद मीणा के ट्रांसफर आदेश पर अंतरिम रोक लगाते हुए दिए।
अदालत ने कहा कि शिक्षा कैलेंडर की जानकारी होने के बावजूद सरकार ने शैक्षणिक सत्र के बीच सिंतबर मे प्रिंसिपल के सामूहिक ट्रांसफर कर दिए। ऐसा करना बताता है कि शिक्षा प्रणाली प्रशासकों की मनमानी से चल रही है न कि छात्रों की जरूरत के अनुसार। अदालत ने कहा कि 22 सिंतबर 2025 को शैक्षणिक सत्र के बीच में ही सीनियर सैकंडरी स्कूल के 4,527 प्रिंसिपल के सामूहिक ट्रांसफर करके न केवल शिक्षकों बल्कि इन स्कूलों और उनके छात्रों को भी परेशान किया। अदालत ने कहा कि देश के ज्यादातर प्रदेशों में न तो कोई विस्तृत ट्रांसफर पॉलिसी है न ही टीचर्स सहित अन्य कर्मचारियों के ट्रांसफर को नियंत्रित करने का कोई विशेष नियम है। अदालत ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति का उद्देश्य गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना है, लेकिन बार-बार और असमय तबादले इस नीति के मूल उद्देश्यों को कमजोर करते हैं।
याचिका में अधिवक्ता रामरख शर्मा ने अदालत को बताया कि याचिकाकर्ता साल 2022 में प्राचार्य पद पर पदोन्नत हुआ था। गत अप्रैल माह में उसका तबादला दूसरी स्कूल में किया गया था। वहीं पांच माह बाद सितंबर माह में उसका तबादला करीब चार सौ किलोमीटर दूर भरतपुर जिले की एक स्कूल में कर दिया गया। इस तबादला आदेश के खिलाफ उसे सिविल सेवा अपीलीय अधिकरण में अपील दायर की, लेकिन उसे राहत नहीं मिली। याचिका में यह भी कहा गया कि अधिकरण ने अन्य समान मामलों में तबादला आदेशों पर रोक लगाई, लेकिन याचिकाकर्ता को राहत देने से इनकार कर दिया।
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हिन्दुस्थान समाचार / पारीक