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अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस (12 अगस्त) पर विशेष
- योगेश कुमार गोयल
युवा किसी भी राष्ट्र की जनसंख्या का केवल एक बड़ा हिस्सा नहीं बल्कि उसकी ऊर्जा, रचनात्मकता, नवाचार, परिवर्तन की आकांक्षा और भविष्य की सबसे महत्वपूर्ण पूंजी होते हैं। दुनिया के अलग-अलग देशों, समाज और आर्थिक परिस्थितियों में रहने वाले युवाओं की समस्याएं भले ही अलग-अलग दिखाई दें लेकिन उनके सपनों और आकांक्षाओं में आश्चर्यजनक समानता है। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सम्मानजनक रोजगार, सुरक्षित और स्वस्थ जीवन, सामाजिक न्याय, स्वतंत्र अभिव्यक्ति तथा अपने भविष्य से जुड़े निर्णयों में सार्थक भागीदारी, ये ऐसी साझा आकांक्षाएं हैं, जो सीमाओं, भाषाओं और संस्कृतियों से परे पूरी दुनिया के युवाओं को एक सूत्र में जोड़ती हैं। इसी सार्वभौमिक सत्य को रेखांकित करता है अंतर्राष्ट्रीय युवा दिवस 2026 का विषय ‘विभिन्न परिस्थितियां, साझा आकांक्षाएं’। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, इस वर्ष की थीम वैश्विक एकजुटता, साझा चुनौतियों और युवा नवाचार को केंद्र में रखती है।
अंतर्राष्ट्रीय युवा दिवस प्रत्येक वर्ष 12 अगस्त को मनाया जाता है। इस दिवस की अवधारणा 1991 में वियना, ऑस्ट्रिया में आयोजित संयुक्त राष्ट्र प्रणाली के विश्व युवा मंच के प्रथम सत्र में युवाओं द्वारा रखे गए प्रस्ताव से विकसित हुई थी और 12 अगस्त 2000 को पहली बार अंतर्राष्ट्रीय युवा दिवस मनाया गया। तब से यह दिवस युवाओं से जुड़े मुद्दों को वैश्विक विमर्श के केंद्र में लाने तथा उन्हें विकास प्रक्रिया का सक्रिय भागीदार बनाने का माध्यम बना हुआ है। वर्ष 2026 की थीम अपने आप में आज की युवा पीढ़ी की वास्तविक तस्वीर प्रस्तुत करती है। दुनिया का कोई युवा युद्ध और विस्थापन के बीच भविष्य तलाश रहा है, कोई जलवायु परिवर्तन से प्रभावित छोटे द्वीपीय देश में अपने अस्तित्व की चिंता कर रहा है तो कोई कृत्रिम बुद्धिमत्ता और तेजी से बदलती रोजगार व्यवस्था के बीच अपने कौशल को प्रासंगिक बनाए रखने की चुनौती से जूझ रहा है। कहीं युवा को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक पहुंच नहीं मिलती, कहीं शिक्षा तो है लेकिन रोजगार के अवसर सीमित हैं। कहीं डिजिटल तकनीक अवसरों के नए द्वार खोल रही है तो कहीं डिजिटल विभाजन युवाओं को विकास की मुख्यधारा से बाहर कर रहा है।
संयुक्त राष्ट्र का आकलन बताता है कि शिक्षा, रोजगार, जलवायु परिवर्तन, डिजिटल समावेशन और मानसिक स्वास्थ्य जैसी चुनौतियां अलग-अलग परिस्थितियों में रहने वाले युवाओं को साझा रूप से प्रभावित कर रही हैं। इसके बावजूद युवा दुनिया की सबसे बड़ी परिवर्तनकारी शक्ति हैं। वे जलवायु कार्रवाई में नेतृत्व कर रहे हैं, सामाजिक उद्यम खड़े कर रहे हैं, डिजिटल समाधान विकसित कर रहे हैं, नई तकनीकों को अपना रहे हैं और अपने समुदायों की समस्याओं के स्थानीय समाधान खोज रहे हैं। भारत के लिए वर्ष 2026 का विषय बेहद प्रासंगिक है। राष्ट्रीय युवा नीति के मसौदे के अनुसार, भारत में 15 से 29 वर्ष आयु वर्ग के युवाओं की संख्या 2021 के अनुमान में लगभग 37.14 करोड़ यानी कुल आबादी का लगभग 27.3 प्रतिशत थी। यह विशाल युवा आबादी भारत के लिए अभूतपूर्व जनसांख्यिकीय लाभांश का अवसर है लेकिन तभी, जब युवाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, कौशल, रोजगार, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा के पर्याप्त अवसर उपलब्ध हों। उसी नीति दस्तावेज में यह भी रेखांकित किया गया है कि बड़ी संख्या में युवा शिक्षा, रोजगार या प्रशिक्षण से बाहर हैं।
भारत में विभिन्न कार्यक्रम युवाओं की क्षमता को अलग-अलग क्षेत्रों में विकसित करने का प्रयास कर रहे हैं लेकिन इन योजनाओं की सफलता का वास्तविक पैमाना यह है कि उनका लाभ अंतिम पंक्ति के युवा तक कितनी प्रभावी ढ़ंग से पहुंच रहा है। आज युवा केवल नौकरी नहीं चाहता बल्कि वह ऐसी व्यवस्था चाहता है, जिसमें उसकी मेहनत, योग्यता और समय का सम्मान हो। यही कारण है कि भर्ती परीक्षाओं में अनियमितता, पेपर लीक, परिणामों में देरी और नियुक्तियों की अनिश्चितता जैसे मुद्दे युवाओं के लिए उनके जीवन के वर्षों और सपनों से जुड़े प्रश्न बन जाते हैं। दिल्ली का जंतर-मंतर इस युवा बेचैनी और लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति का एक महत्वपूर्ण प्रतीक बनकर उभरा। परीक्षा संबंधी अनियमितताओं के मुद्दे पर वहां हुए युवा विरोध प्रदर्शनों ने दिखाया कि अलग-अलग राज्यों और सामाजिक पृष्ठभूमियों से आए विद्यार्थी तथा अभ्यर्थी एक साझा मांग (परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही) के साथ खड़े हो सकते हैं। जून-जुलाई 2026 में परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर जंतर-मंतर पर चले प्रदर्शन में देश के विभिन्न हिस्सों से विद्यार्थी, अभिभावक और अभ्यर्थी पहुंचे। कुछ प्रदर्शनकारी लंबे समय तक वहां डटे रहे और परीक्षा व्यवस्था में जवाबदेही की मांग उठाते रहे।
इसी पृष्ठभूमि में झारखंड में युवाओं का हालिया आक्रोश इस वर्ष की थीम को और अधिक जीवंत बना देता है। राज्य में जेपीएससी और जेएसएससी से जुड़ी भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं के विरोध में जुलाई से अगस्त 2026 तक आंदोलन तेज हुआ। 22 जुलाई को जेपीएससी ने राज्य सिविल सेवा मुख्य परीक्षा स्थगित की और इसी दौरान सीआईडी ने परीक्षा प्रक्रिया से जुड़े कुछ लोगों की गिरफ्तारी की, जिसके बाद अभ्यर्थियों के विरोध प्रदर्शनों ने व्यापक रूप लिया। 30 जुलाई को रांची में युवाओं और छात्र संगठनों ने जेपीएससी-जेएसएससी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं के विरोध में मार्च निकाला और 14वीं जेपीएससी परीक्षा की जांच तथा भर्ती व्यवस्था में सुधार की मांग की। अगस्त में आंदोलन और तीव्र हुआ तथा 10 अगस्त को हजारों युवा विधानसभा की ओर मार्च करते हुए पुलिस से भिड़ गए। पुलिस द्वारा आंसू गैस, पानी की बौछार और बल प्रयोग किए जाने की खबरें सामने आई। यह घटनाक्रम बताता है कि जब युवाओं के भीतर रोजगार, परीक्षा की निष्पक्षता और भविष्य की सुरक्षा को लेकर लंबे समय तक असुरक्षा जमा होती रहती है तो असंतोष व्यापक सामाजिक आंदोलन का रूप ले सकता है।
इन आंदोलनों का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि युवा अब केवल नीति के लाभार्थी बने रहना नहीं चाहते; वे नीति और व्यवस्था की गुणवत्ता पर सवाल पूछने वाले सक्रिय नागरिक भी हैं। परीक्षा में वर्षों की मेहनत लगाने वाले विद्यार्थी के लिए एक कथित पेपर लीक या भर्ती प्रक्रिया में अनियमितता केवल एक परीक्षा का संकट नहीं होती। उसके पीछे परिवार की आर्थिक उम्मीदें, कई वर्षों की तैयारी, मानसिक दबाव और जीवन की दिशा जुड़ी होती है। यही कारण है कि पारदर्शी और समयबद्ध भर्ती व्यवस्था आज युवा आकांक्षाओं की सबसे महत्वपूर्ण मांगों में शामिल है। दिल्ली का जंतर-मंतर हो या रांची की सड़कें, परिस्थितियां अलग हैं लेकिन आकांक्षा एक ही है; योग्यता का सम्मान, व्यवस्था में पारदर्शिता और भविष्य का भरोसा। इन आंदोलनों को केवल राजनीतिक विरोध या कानून-व्यवस्था की समस्या के रूप में देखना युवा मनोविज्ञान को समझने में चूक होगी। लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध युवाओं के नागरिक अधिकारों और उनकी सक्रिय भागीदारी का महत्वपूर्ण माध्यम है। साथ ही आंदोलनों का शांतिपूर्ण रहना, संवाद के रास्ते खुले रखना और किसी भी प्रकार की हिंसा से बचना भी उतना ही आवश्यक है।
आज आवश्यकता है कि प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए ऐसी विश्वसनीय व्यवस्था बनाई जाए, जिसमें प्रश्नपत्र की सुरक्षा से लेकर परिणाम और नियुक्ति तक हर चरण पारदर्शी हो। परीक्षा कैलेंडर का कठोर पालन, तकनीकी सुरक्षा, स्वतंत्र निगरानी, त्वरित शिकायत निवारण और दोषियों के विरुद्ध समयबद्ध कार्रवाई इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं। रोजगार को केवल सरकारी नौकरियों तक सीमित रखने के बजाय निजी क्षेत्र, स्टार्टअप, ग्रामीण उद्यमिता, हरित अर्थव्यवस्था और डिजिटल कार्य के अवसरों का व्यापक विस्तार करना होगा। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स, साइबर सुरक्षा, ग्रीन टेक्नोलॉजी, सेमीकंडक्टर, जैव-प्रौद्योगिकी और डिजिटल सेवाओं जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए युवाओं को भविष्य उन्मुख कौशल देना होगा। तकनीकी कौशल के साथ आलोचनात्मक चिंतन, रचनात्मकता, संवाद क्षमता और नैतिक विवेक भी विकसित करना होगा। मानसिक स्वास्थ्य को भी युवा नीति का केंद्रीय हिस्सा बनाना होगा क्योंकि बेरोजगारी, प्रतियोगिता, सामाजिक दबाव और भविष्य की अनिश्चितता युवाओं पर गहरा मनोवैज्ञानिक प्रभाव डाल सकती है।
दुनिया के युवाओं की परिस्थितियां भिन्न हो सकती हैं लेकिन उनके सपनों की भाषा समान है। वे अवसर चाहते हैं पर अवसर के साथ न्याय भी चाहते हैं; वे तकनीक चाहते हैं पर मानवीय गरिमा के साथ; वे विकास चाहते हैं पर प्रकृति की कीमत पर नहीं; वे लोकतंत्र चाहते हैं पर केवल मतदान तक सीमित लोकतंत्र नहीं बल्कि निर्णय प्रक्रिया में अपनी सार्थक भागीदारी भी चाहते हैं। यदि सरकारें और समाज इन साझा आकांक्षाओं को समझ लें तो युवा असंतोष को संकट नहीं, परिवर्तन की ऊर्जा बनाया जा सकता है। किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसकी युवा आबादी की संख्या में नहीं, इस बात में निहित होती है कि वह अपने युवाओं के सपनों को कितने अवसरों, विश्वास और न्याय में बदल पाता है।
(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश