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जे. नंदकुमार
सौ वर्ष पूरे कर चुका कोई संगठन सामान्यतः अपनी आयु के भार से पहचाना जाता है। उसके इतिहास की चर्चा उसके वर्तमान से अधिक होती है और उसकी स्मृतियाँ उसके भविष्य पर हावी होने लगती हैं। लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संदर्भ में स्थिति कुछ अलग दिखाई देती है। संघ की शताब्दी का सबसे उल्लेखनीय पक्ष उसका अतीत नहीं बल्कि उसकी युवा होती वर्तमान चेतना है। आज यदि संघ की किसी शाखा में जाएँ तो वहाँ उसकी शताब्दी का भार नहीं, बल्कि सोलह वर्ष की ऊर्जा दिखाई देती है। यही वह बिंदु है जहाँ संघ और नई पीढ़ी के संबंध को समझना आवश्यक हो जाता है।
हाल ही में मुंबई में 6 अगस्त को सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत का युवाओं के साथ संवाद इसी वास्तविकता का सहज उदाहरण बनकर सामने आया। Gen-Z की भाषा और अभिव्यक्ति के एक लोकप्रिय संकेत को उन्होंने स्वयं अपनाया और मुस्कराकर कहा—“आज मैंने आपसे एक नई अभिव्यक्ति सीखी।”
यह छोटा-सा प्रसंग केवल सोशल मीडिया पर वायरल हुआ कोई मनोरंजक दृश्य नहीं था। इसके पीछे एक गहरा सामाजिक और संगठनात्मक संदेश छिपा था-पीढ़ियों के बीच संवाद तभी संभव है, जब दोनों पक्ष एक-दूसरे से सीखने को तैयार हों।
आज Gen-Z और Gen-Alpha को लेकर दुनिया भर में चर्चा है। यह ऐसी पीढ़ी है जो डिजिटल तकनीक के साथ बड़ी हुई है, जिसकी भाषा पिछली पीढ़ियों से अलग है, जिसके प्रश्न अलग हैं और जिसकी सामाजिक संवेदनाएँ भी बदल रही हैं। इसलिए स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि एक शताब्दी पुराने संगठन का नेतृत्व करने वाला व्यक्ति इस पीढ़ी से इतनी सहजता से कैसे संवाद स्थापित कर पाता है? इसका उत्तर किसी संचार-तकनीक में नहीं बल्कि संघ की मूल संगठनात्मक संस्कृति में छिपा है।
संघ का आरंभ ही युवा ऊर्जा से हुआ
संघ को समझने के लिए उसके इतिहास के प्रारंभिक क्षणों को याद करना होगा। डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने जब कुछ बालकों को साथ लेकर संगठनात्मक कार्य का प्रारंभ किया, तब उनके पास न कोई विशाल संस्थागत ढाँचा था, न संसाधनों की प्रचुरता और न ही किसी स्थापित शक्ति का संरक्षण। उनके पास था-युवा मन, संगठन का संस्कार और राष्ट्र के प्रति समर्पण। शुरुआत में संघ को “बच्चों का खेल” कहा गया। उसे “बॉयज़ क्लब” कहकर उसकी उपेक्षा की गई। लेकिन इतिहास की विडंबना देखिए कि जिस संगठन को कभी बच्चों का खेल समझा गया, उसी ने आगे चलकर देश के सामाजिक जीवन के अनेक क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। प्रतिबंध आए। आपातकाल आया। युद्ध और प्राकृतिक आपदाएँ आईं। अनेक स्वयंसेवकों को कठिनाइयों और यातनाओं का सामना करना पड़ा। हर संकट में एक पीढ़ी ने दूसरी पीढ़ी को पीछे छोड़ते हुए दायित्व संभाला। संघ का इतिहास वास्तव में पीढ़ियों के हस्तांतरण का इतिहास है। यही उसकी सबसे बड़ी संगठनात्मक शक्ति है।
संगठन की आयु और उसकी ऊर्जा
2025-26 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार संघ की शाखाओं की संख्या 88,949 तक पहुँची है। लेकिन किसी संगठन की शक्ति केवल उसकी संख्या से नहीं मापी जाती। अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि उन शाखाओं में सक्रिय कौन है? उत्तर है—युवा। 2025 के विजयादशमी कार्यक्रम में 27,08,186 तरुण और 5,36,955 बाल स्वयंसेवकों की सहभागिता तथा देशभर के पथसंचलनों में लाखों युवाओं और बाल स्वयंसेवकों की भागीदारी केवल सांख्यिकीय उपलब्धि नहीं है। यह उस सामाजिक ऊर्जा का संकेत है जो संघ के संगठनात्मक जीवन को निरंतर गतिशील बनाए हुए है। दैनिक शाखाओं में 60 प्रतिशत से अधिक विद्यार्थियों की भागीदारी इस तथ्य को और स्पष्ट करती है। कोविड जैसी असाधारण परिस्थिति में भी लगभग 61 प्रतिशत दैनिक शाखा सहभागियों का विद्यार्थी होना यह बताता है कि संघ की संगठनात्मक धारा का बड़ा हिस्सा नई पीढ़ी से जुड़ा हुआ है। यही कारण है कि संघ को केवल सौ वर्ष पुरानी संस्था कहना अधूरा होगा। संघ सौ वर्ष पुराना है; लेकिन उसकी संगठनात्मक ऊर्जा लगातार नई होती रही है। शायद इसी अर्थ में कहा जा सकता है-संघ की आयु सदा सोलह वर्ष है।
नई पीढ़ी केवल सहभागी नहीं, उत्तराधिकारी भी है
युवा शक्ति की वास्तविक परीक्षा केवल किसी कार्यक्रम में उपस्थिति से नहीं होती। वह तब सामने आती है जब युवा अपने समय, प्रतिभा और सुविधा का त्याग कर किसी व्यापक उद्देश्य के लिए स्वयं को समर्पित करता है। शताब्दी वर्ष में पूर्णकालिक विस्तारक के रूप में दो वर्ष देने के आह्वान पर 2,453 स्वयंसेवकों का आगे आना इसी दृष्टि से महत्वपूर्ण है। यह उस पीढ़ी की तस्वीर प्रस्तुत करता है जिसके बारे में अक्सर कहा जाता है कि वह सुविधा, तात्कालिकता और व्यक्तिगत सफलता को सर्वोच्च मानती है।
लेकिन तस्वीर का दूसरा पक्ष भी है। आज भी हजारों युवा ऐसे हैं जो अपने व्यक्तिगत जीवन की गति को कुछ समय के लिए रोककर समाज और राष्ट्र के लिए कार्य करने का निर्णय लेते हैं। यही किसी भी विचार-आधारित संगठन के भविष्य की वास्तविक पूँजी होती है। 2025 की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा के संदर्भ में प्रस्तुत आँकड़ा भी उल्लेखनीय है। प्रारंभिक वर्ग में सहभागी 2,22,962 स्वयंसेवकों में से 1,63,000 की आयु 14 से 25 वर्ष के बीच थी। यह संख्या एक प्रश्न भी पूछती है- क्या हम युवा पीढ़ी को केवल उपभोक्ता मानते हैं या उसे समाज-निर्माण का सक्रिय कर्ता भी मानते हैं? संघ की संगठनात्मक दृष्टि का उत्तर स्पष्ट है। युवा भविष्य नहीं है; युवा वर्तमान का कर्ता है।
डिजिटल पीढ़ी और शाखा का प्रत्यक्ष संवाद
आज के युवा की दुनिया बदल गई है। उसका सामाजिक संपर्क मोबाइल स्क्रीन पर है, सूचना का प्रवाह सेकंडों में होता है और उसकी भाषा लगातार बदलती रहती है। ऐसे समय में किसी शताब्दी पुराने संगठन का उसके साथ संवाद स्थापित कर पाना अपने आप में अध्ययन का विषय है। लेकिन यहाँ संघ की एक विशेषता सामने आती है। संघ ने नई पीढ़ी से संवाद करने के लिए केवल नई भाषा सीखने की कोशिश नहीं की; उसने उसके बीच जाकर संवाद की परंपरा को ही निरंतर बनाए रखा। “Join RSS” जैसे ऑनलाइन माध्यम से कोविड काल में 1,25,000 युवाओं द्वारा संघ से जुड़ने की इच्छा व्यक्त करना इसी बदलते परिवेश का संकेत है। 2012 में इस मंच की शुरुआत के बाद से लाखों युवाओं ने इसके माध्यम से संघ की गतिविधियों में रुचि दिखाई है। यहाँ डिजिटल माध्यम साधन है; संबंध का मूल आधार नहीं। मूल आधार है- प्रत्यक्ष संपर्क। शाखा का पूरा ढाँचा इसी प्रत्यक्ष संपर्क पर आधारित है। व्यक्ति से व्यक्ति संवाद, साथ बैठना, साथ खेलना, साथ सीखना और साथ काम करना- यह संगठनात्मक पद्धति किसी सोशल मीडिया एल्गोरिद्म पर निर्भर नहीं है। शायद यही कारण है कि संघ डिजिटल युग की पीढ़ी से संवाद करते हुए भी अपनी मूल संगठनात्मक प्रकृति को बनाए रख सकता है।
“Clock it” से आगे की कहानी
मुंबई का वह प्रसंग इसलिए महत्वपूर्ण है कि उसमें एक प्रतीक छिपा हुआ है। जब एक वरिष्ठ व्यक्ति युवा की भाषा में प्रयुक्त अभिव्यक्ति को सहजता से स्वीकार करता है, तो वह केवल युवा होने का अभिनय नहीं कर रहा होता। वह यह संदेश दे रहा होता है कि सीखना किसी एक आयु-वर्ग का विशेषाधिकार नहीं है। युवा वरिष्ठों से अनुभव लेता है। वरिष्ठ युवाओं से नवीनता सीखते हैं। यही संवाद किसी संगठन को जीवित रखता है। यदि कोई संगठन केवल अपनी पुरानी पीढ़ी की भाषा में बोलता रहे, तो वह धीरे-धीरे संग्रहालय में बदल जाता है। और यदि वह अपनी मूल दृष्टि छोड़कर केवल नई पीढ़ी की भाषा की नकल करने लगे तो उसकी पहचान समाप्त हो जाती है। संघ के सामने चुनौती इन दोनों अतियों से बचने की है। मूल्य स्थिर रहें, अभिव्यक्ति समयानुकूल हो। ध्येय स्थिर रहे, कार्यपद्धति गतिशील हो। विचार की निरंतरता रहे, लेकिन पीढ़ियों के बीच संवाद खुला रहे। संघ की शताब्दी के संदर्भ में यही सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है।
सोलह वर्षः आयु नहीं, एक मानसिकता
“सोलह वर्ष” को यदि केवल युवावस्था की जैविक आयु के रूप में देखा जाए तो संघ की वास्तविकता समझ में नहीं आएगी। सोलह वर्ष यहाँ एक मानसिक अवस्था का प्रतीक है। सवाल पूछने का साहस। नई चीज सीखने की उत्सुकता। असफलता से न घबराने की क्षमता। भविष्य के प्रति विश्वास। और किसी बड़े उद्देश्य के लिए स्वयं को समर्पित करने की आकांक्षा। यही गुण किसी संगठन को वृद्ध होने से बचाते हैं। संघ के पास वरिष्ठता का विशाल अनुभव है लेकिन उसकी शाखाओं में नई पीढ़ी की ऊर्जा है। उसके पास सौ वर्ष का इतिहास है लेकिन उसके सामने भविष्य की अनेक संभावनाएँ हैं। इसलिए संघ की शताब्दी का वास्तविक उत्सव केवल अतीत का स्मरण नहीं हो सकता। उसका वास्तविक अर्थ यह देखना होगा कि अगली शताब्दी के लिए कौन-सी पीढ़ी तैयार हो रही है।
यदि आज की शाखाओं में बाल स्वयंसेवक और तरुण स्वयंसेवक उसी उत्साह से उपस्थित हैं, यदि वे प्रश्न पूछ रहे हैं, सीख रहे हैं, नेतृत्व कर रहे हैं और समाज के लिए समय दे रहे हैं, तो यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि संघ ने अपनी शताब्दी पूरी अवश्य की है परंतु उसने अपनी युवा ऊर्जा नहीं खोई है। संगठन बूढ़ा तब होता है जब उसकी अगली पीढ़ी उससे प्रश्न पूछना बंद कर देती है। संघ की शाखाओं में आज भी प्रश्न हैं, संवाद है, उत्साह है और नई पीढ़ी है। शायद इसीलिए संघ सौ वर्ष का होकर भी सदा सोलह वर्ष का है।
(लेखक, प्रज्ञा प्रवाह के राष्ट्रीय संयोजक हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश