छात्रशक्ति से राष्ट्रशक्ति में परिणीति के 78 वर्ष
-अंकित शुक्ल भारतीय ज्ञान परंपरा में शिक्षा को केवल जीविकोपार्जन का साधन नहीं अपितु चरित्र निर्माण, समाजोत्थान व राष्ट्र चेतना का आधार माना गया है। हमारे ग्रंथों में वर्णित है-विद्या ददाति विनयं, विनयाद् याति पात्रताम्। पात्रत्वात् धनमाप्नोति, धना

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