अब एक साल में देश में सबसे तेज जीडीपी ग्रोथ राज्य बन जाएगा पश्चिम बंगाल
-भाजपा शासन आते ही बंगाल बना उद्योगपतियों के लिए आशा का केंद्र डॉ. मयंक चतुर्वेदी पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन का बदलाव एक नई आर्थिक सोच, नई दिशा और नए आत्मविश्वास का प्रतीक बनकर उभरा है। लंबे समय से निवेशकों के मन में जो संदेह था, जिसमें कि
पश्चिम बंगाल और शुभेंदु सरकार


-भाजपा शासन आते ही बंगाल बना उद्योगपतियों के लिए आशा का केंद्र

डॉ. मयंक चतुर्वेदी

पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन का बदलाव एक नई आर्थिक सोच, नई दिशा और नए आत्मविश्वास का प्रतीक बनकर उभरा है। लंबे समय से निवेशकों के मन में जो संदेह था, जिसमें कि सबसे अधिक नीतियों की अनिश्चितता, प्रोजेक्ट्स का अटकना और राजनीतिक खींचतान रही, अब वह धीरे-धीरे खत्म होता नजर आ रहा है। वहीं, राज्य की अर्थव्यवस्था में तेजी लाने के लिए केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। प्रधानमंत्री की अगुआई वाले नीति आयोग ने राज्य के पुन: औद्योगीकरण के लिए दीर्घकालिक रोडमैप तैयार करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।

ताजपुर बंदरगाह बना विकास की नई उम्मीद

दरअसल, भाजपा के सत्ता मे आते ही राज्य एक ऐसे मोड़ पर आ खड़ा है जहां से विकास की रफ्तार तेज होने की प्रबल संभावना व्यक्त की जा रही है। इस परिवर्तन की सबसे ठोस मिसाल बना है ताजपुर बंदरगाह। लगभग 25,000 करोड़ रुपये की यह परियोजना वर्षों तक फाइलों में कैद रही, पर अब सत्ता परिवर्तन के बाद इसे प्राथमिकता दिए जाने की संभावना बहुत बढ़ गई है। यह पोर्ट भविष्य में पूरे पूर्वी भारत की अर्थव्यवस्था को गति देने वाला इंजन बन सकता है। इसके जरिए बड़े जहाज सीधे बंगाल के तट पर पहुंच सकेंगे, जिससे व्यापार की लागत घटेगी और अंतरराष्ट्रीय कनेक्टिविटी बढ़ेगी।

लॉजिस्टिक्स और कनेक्टिविटी पर बड़ा फोकस

ताजपुर पोर्ट के साथ-साथ सड़क, रेल और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क को मजबूत करने की योजना है। कोलकाता बंदरगाह और हल्दिया बंदरगाह पर दबाव कम होगा, जिससे माल ढुलाई अधिक सुगम होगी। यदि मल्टीमॉडल कनेक्टिविटी को सही तरीके से लागू किया गया, तो बंगाल पूर्वी भारत का सबसे बड़ा लॉजिस्टिक हब बन सकता है।

नीति आयोग तैयार कर रहा औद्योगिक ब्लूप्रिंट

दूसरी ओर मोदी सरकार ने नीति आयोग के उपाध्यक्ष बने अर्थशास्त्री व पूर्व भाजपा विधायक अशोक लाहिड़ी को राज्य की औद्योगिक और आर्थिक स्थिति को मजबूत करने के लिए ब्लूप्रिंट तैयार करने की जिम्मेदारी सौंपी है। नीति आयोग के सदस्य लाहिड़ी का कहना है, “बंगाल के लिए एक व्यापक और दीर्घकालिक औद्योगिक विकास खाका तैयार किया जा रहा है, जिसमें उत्पादन क्षमता बढ़ाने, मजबूत सप्लाई चेन विकसित करने, आधुनिक बुनियादी ढांचे के निर्माण, नदी आधारित व्यापार को प्रोत्साहन देने और बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन पर विशेष जोर होगा।”

‘एक्ट ईस्ट’ नीति का प्रवेश द्वार बनेगा कोलकाता

उन्होंने कहा, “इसके साथ ही कोलकाता को भारत की ‘एक्ट ईस्ट’ नीति के प्रमुख प्रवेश द्वार के रूप में स्थापित करने की रणनीति भी बनाई जा रही है। कभी देश के सबसे समृद्ध राज्यों में गिने जाने वाला बंगाल आज औद्योगिक उत्पादन के क्षेत्र में अपनी पुरानी पहचान से काफी पीछे छूट गया है। ऐसे में उसे पुन: उसके पुराने विकसित स्वरूप में वापिस लाना ही हमारा लक्ष्य है।”

केंद्र-राज्य तालमेल से बढ़ेगी विकास की गति

इस संबंध में एचएलबीसी के मैनेजिंग डारेक्टर, उत्पाद समूह इलेक्ट्रॉनिक इंडस्ट्रीज एसोसिएशन ऑफ इंडिया (ELCINA) आईटी प्रोडेक्ट चेयरमेन मितेश लोकवानी ने कहा, “जब केंद्र और राज्य में एक ही दल भारतीय जनता पार्टी की सरकार होती है, तो नीतिगत तालमेल बेहतर होता है। यही ‘डबल इंजन’ मॉडल अब बंगाल में लागू होने की उम्मीद है। इससे इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएं गति पकड़ती हुई जल्द दिखाई देंगी।”

उन्होंने कहा, “यदि राज्य की शुभेंदु सरकार विषय विशेषज्ञों की टीम बनाकर प्लानिंग पार्ट पर सही दिशा में योजना बनाकर चरण बद्ध तरीके से आगे बढ़ेगी तो उसे बहुत अच्छे परिणाम देखने को मिलेंगे। इसके लिए पश्चिम बंगाल सरकार को चाहिए कि वह एक टास्क फोर्स बनाएं।”

कर्नाटक मॉडल से सीख लेने की सलाह

मितेश लोकवानी कहते हैं, “कर्नाटक सरकार ने उद्योगों और विनिर्माण क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए टास्क फोर्स का गठन किया है। यह एयरोस्पेस और रक्षा (अंतरिक्ष तकनीक और ड्रोन सहित) इलेक्ट्रॉनिक्स और सेमीकंडक्टर, पूंजीगत सामान और रोबोटिक्स, ऑटोमोबाइल और इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी), तकनीकी और मानव निर्मित फाइबर (एमएमएफ) आधारित कपड़ा उद्योग, उपभोक्ता उत्पाद (एफएमसीजी, जूते और खिलौने सहित) पर विशेष ध्यान देने में सफल रही है। ऐसा ही प्रयोग आज बंगाल में किए जाने की जरूरत है।”

गुजरात की औद्योगिक नीति से प्रेरणा

उन्होंने कहा कि इस दिशा में बहुत कुछ गुजरात की उद्योगिक नीति के अध्ययन से भी सीखा जा सकता है। जिसके कारण से आज गुजरात देश में उद्योग का हब और लीडर बना हुआ है। वे कहते हैं कि राजनीतिक स्थिरता और स्पष्ट नीतियां निवेशकों के लिए सबसे बड़ा आकर्षण होती हैं। पहले अडाणी पोर्ट्स और विेशेष आर्थिक क्षेत्र जैसे बड़े निवेशकों के साथ हुए उतार-चढ़ाव ने भरोसा कमजोर किया था, लेकिन अब उद्योग जगत में उत्साह देखा जा रहा है। निवेशक यह मानकर चल रहे हैं कि अब प्रोजेक्ट्स बीच में नहीं रुकेंगे और नीतियां लंबे समय तक स्थिर रहेंगी।

वरिष्ठ पत्रकार संतोष मधुप का कहना है, “सत्ता परिवर्तन के बाद से राज्य के लोगों में कुछ अच्छा होने की उम्मीद जगी है। इस उम्मीद पर खरे उतरना शुभेंदु सरकार की पहली प्राथमिकता होगी, इसमें कोई संदेह नहीं। हालांकि पिछली सरकारों ने विगत 4-5 दशकों में राज्य की जो दुर्गति की है उससे बाहर निकलने के लिए निरंतर और सुनियोजित प्रयास की आवश्यकता है। उद्योग, वाणिज्य, शिक्षा, स्वास्थ्य और कार्य संस्कृति में व्यापक सुधार की गुंजाइश स्पष्ट नजर आती है।”

मधुप कहते हैं, “अच्छी बात यह है कि नई सरकार इन चुनौतियों को भली भांति समझती है। शपथ ग्रहण के तुरंत बाद से शुभेंदु सरकार ने जिस तरह एक के बाद एक बड़े फैसले लिए हैं उससे साफ है कि सरकार के इरादे मजबूत हैं और वह बंगाल की जनता की बेहतरी के लिए कठोर फैसले लेने में भी संकोच नहीं कर रही। प्रचंड बहुमत से सत्ता में आई नई सरकार और उसके मुखिया शुभेंदु अधिकारी को आगे भी अपना यह बोल्ड इमेज'' बनाए रखना होगा।” उन्होंने कहा, अगर सब कुछ सही दिशा में चला तो आने वाले वर्षों में बंगाल फिर से भारत के औद्योगिक मानचित्र पर चमक सकता है, जहां विकास के द्वार खुलेंगे और निवेश की नई गाथा लिखी जाएगी।

ट्रेड यूनियनवाद और आंदोलनों का असर

उल्लेखनीय है कि एक समय था जब कोलकाता देश का औद्योगिक केंद्र हुआ करता था, लेकिन वामपंथी शासन के दौरान बढ़ते ट्रेड यूनियनवाद और लगातार हड़तालों ने उद्योगों को कमजोर कर दिया। इसके बाद सिंगूर और नंदीग्राम जैसे आंदोलनों ने निवेशकों के भरोसे को और चोट पहुंचाई। टाटा मोटर्स की नैनो परियोजना का राज्य से बाहर जाना इसका बड़ा उदाहरण है। जब बेंगलुरु, हैदराबाद और पुणे जैसे शहर आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर और स्टार्टअप संस्कृति के साथ आगे बढ़ रहे थे, तब बंगाल नीतिगत उलझनों में फंसा रहा। परिणामस्वरूप, निवेश और प्रतिभा दोनों का पलायन हुआ।

(लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी