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प्रयाग पाण्डे
देश को आजाद हुए आठ दशक पूरे होने को हैं। आज कोई प्रशासनिक अधिकारी भूले- भटके कभी किसी दूरस्थ क्षेत्र में चले जाएं तो यह हर्ष और कौतूहल का विषय बन जाता है। लेकिन पराधीन भारत में ऐसा नहीं था। उस दौर में प्रशासनिक अधिकारी सदैव दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों के दौरों पर रहते थे। जांच और आख्या के बहाने समस्याओं को लटकाया नहीं जाता था। समस्याएं मौके पर ही हल की जाती थीं। कोशिश होती थी कि समस्याओं का समाधान ग्रामीणों के बीच से ही निकाला जाए। ग्रामीणों की रायशुमारी एवं सर्वानुमति से निकला समाधान तुरंत प्रभावी और कारगर होता था। आपसी विवादों में तबके प्रशासनिक अधिकारी मात्र मध्यस्थ की भूमिका अदा करते थे। आज देश में जांच और आख्या के बहाने अनगिनत मामले लंबित रहते हैं। कभी-कभार तो जांच फाइलों से बाहर ही नहीं निकलती।
मशहूर शिकारी, रोमांचक शिकार कथा लेखक और प्रकृति विज्ञानी जेम्स एडवर्ड कॉर्बेट यानी जिम कॉर्बेट ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'माय इंडिया' में उस दौर के ऐसे तमाम वाकया का रोचक एवं प्रेरक उल्लेख किया है। ब्रिटिश शासनकाल में कुमाऊं के तराई क्षेत्र को 'तराई एंड भाबर गवर्नमेंट एस्टेट' कहा जाता था। यानी वह जमीन या क्षेत्र, जिसमें प्रत्यक्ष रूप से किसी व्यक्ति विशेष का स्वामित्व न हो। उस जमाने में तराई में 473 छोटे-बड़े गांव थे, इनमें से 376 गांव सीधे एस्टेट के स्वामित्व या नियंत्रण में थे। तराई का प्रशासनिक नियंत्रण सुपरिटेंडेंट ऑफ तराई के पास था। सुपरिटेंडेंट ऑफ तराई का कोई निश्चित मुख्यालय नहीं था। वह जगह-जगह कैंप लगाकर लोगों की समस्याएं सुनते और उनका निराकरण करते थे।
जिम कार्बेट की किताब में उल्लिखित यह किस्सा करीब एक सौ साल से भी पुराना है।तब सर फ्रेडरिक एंडरसन तराई के सुपरिटेंडेंट थे। एंडरसन ने जनवरी में तराई के एक गांव में कैंप लगाया था। जिम लिखते हैं उस कैंप में मैं भी मौजूद था। जिम ने माय इंडिया' में 'लालफीताशाही के पहले का जमाना' नामक शीर्षक में लिखा है कि इस गांव से कुछ सौ गज दूरी पर एंडरसन का कैंप लगा था। गांव के सारे लोग एंडरसन के प्रति आदर प्रकट करने आ पहुंचे और कैंप लगाने में जो भी मदद हो सकती थी, वो कर रहे थे। उस शाम जब गांव के बाहर कैंप के लिए तंबू गड़ रहे थे और पूरे गांव के लोग वहां इकट्ठे थे तब एंडरसन ने सब लोगों को बैठ जाने को कहा और उनसे कहा कि यदि किसी को कोई शिकायत, फरियाद करनी हो या दरख्वास्त देनी हो, तो वे उन्हें अभी सुनेंगे।
पहली शिकायत गांव के नजदीक ही एक अन्य गांव के मुखिया ने की। शिकायतकर्ता मुखिया के गांव और जिस गांव में एंडरसन का कैंप लगा था उस गांव के बीच एक साझी नहर थी, जिसका पानी सिंचाई के लिए दोनों गांव के लोग इस्तेमाल करते थे। उस साल मानसून कमजोर था और नहर में इतना पानी नहीं था कि दोनों गांव के खेतों की सिंचाई इससे हो पाती। जो गांव ऊपर पड़ता था उस गांव के लोगों ने ही नहर का सारा पानी इस्तेमाल कर डाला था। मुखिया के गांव में धान की पूरी फसल मारी गई थी। जहां कैंप लगा था, उस गांव के मुखिया ने भी यह स्वीकार किया कि उन्होंने नहर का पानी आगे नहीं जाने दिया था। उसने दलील दी कि यदि पानी दोनों गांवों में पहले की तरह बांटा जाता तो दोनों ही गांव की फसल मारी जाती।
एंडरसन के यहां आने के कुछ दिन पहले ही फसल कटी थी। एंडरसन ने दोनों मुखिया की बात सुनी और अपना फैसला सुनाया कि पूरी फसल दोनों गांवों में जोत के रकबे को आधार बनाकर बांट दी जाए। जिस गांव में फसल हुई थी वहां के निवासियों ने इस फैसले पर सहमति जताई, लेकिन यह एतराज जरूर किया कि वे फसल का हिस्सा तो दूसरे गांव को दे रहे हैं, लेकिन उन्होंने खेतों में जो परिश्रम किया है, उसका मुआवजा उन्हें नकद मिलना चाहिए। गांव के लोगों ने कहा निचले गांव के लोगों को पारिश्रमिक मांगने का कोई हक नहीं है, क्योंकि उन्होंने उनसे कभी परिश्रम करने को नहीं कहा। एंडरसन ने एक पल विचार किया और कहा कि फसल उगाने वाले गांव के लोग मजदूरी के हकदार हैं। इस फैसले के बाद किसी ने कोई आपत्ति नहीं की और दोनों गांव के मुखिया उठकर फसल का बंटवारा करने चल दिए। दोनों गांवों के मुखिया ने गांव के रकबे के आधार पर फसल का बंटवारा कर लिया।
अब एंडरसन के सामने अगली शिकायत आई। छेदी नाम के एक ग्रामीण ने शिकायत की कि गांव निवासी कालू नामक व्यक्ति ने उसकी पत्नी तिलनी का अपहरण कर लिया है। एंडरसन ने पूछा- ''कालू भीड़ में मौजूद है क्या?'' तो गोलाई में फैली भीड़ के दूसरे कोने पर बैठा एक आदमी उठ खड़ा हुआ और उसने कहा ''जी हजूर, मैं कालू हूं।'' एंडरसन के पूछने पर कालू ने स्वीकार किया कि तिलनी उसकी दी हुई झोपड़ी में रह रही है, लेकिन इस बात से उसने साफ इनकार किया कि उसने तिलनी का अपहरण किया है। कालू से पूछा गया कि क्या वह तिलनी को उसके पति को लौटाने के लिए तैयार है तो कालू ने जवाब दिया कि तिलनी अपनी मर्जी से आई है और वो हरगिज उस पर दबाव डालकर उसके पति के पास जाने को नहीं कहेगा। ''क्या तिलनी मौजूद है?'' एंडरसन ने पूछा। महिलाओं के झुंड से एक लड़की उठ खड़ी हुई और सामने आकर बहुत अदब से बोली-मैं तिलनी हूं। हजूर का क्या हुक्म है? एंडरसन ने तिलनी से पूछा कि क्या उसने अपनी मर्जी से अपने पति को छोड़ा है। उसने छेदी की तरफ इशारा किया और कहा, ''हुजूर, आप देखिए उसको, वह कितना गंदा है। वह सिर्फ गंदा ही नहीं, भारी कंजूस भी है। दो साल से मैं उसकी पत्नी हूं और उसने मुझे न तो कभी कपड़े खरीद कर दिए और न ही गहने।''
अपनी कलाइयों पर चांदी की चूड़ियां, अपने गले में पहनी कांच की मोतियों वाली मालाओं पर उंगलियां फिराते हुए और तिलनी ने अपने कपड़ों की तरफ इशारा किया और कहा ''ये जो कपड़े और गहने आप देख रहे हैं, मुझे कालू ने दिए हैं।'' यह पूछने पर कि क्या वह वापस छेदी के पास जाना चाहेगी, उसने अपने सिर को जोरदार झटका दिया और कहा कि 'दुनिया में ऐसी कोई चीज नहीं जिसकी वजह से वह वापस छेदी के पास जाना चाहे।' एंडरसन ने छेदी से पूछा कि क्या उसको कुछ कहना है तो छेदी ने जवाब दिया, ''हजूर,आप हमारे माई-बाप हैं। मैं आपके पास इंसाफ के लिए आया था और यदि माई-बाप मेरी पत्नी को मेरे पास लौटने के लिए मजबूर नहीं करना चाहते तो मैं मुआवजे का दावेदार हूं।'' एंडरसन ने पूछा कि तिलनी का मुआवजा कितना होना चाहिए। छेदी ने जवाब दिया, ''मैं डेढ़ सौ रुपये का दावा करता हूं।'' भीड़ के हर कोने से आवाजें उठने लगी- ''बहुत ज्यादा मांग रहा है। कुछ हिसाब तो होना चाहिए।''
इसके बाद एंडरसन ने कालू से पूछा कि क्या वो डेढ़ सौ रुपये का मुआवजा देने के लिए तैयार है। कालू ने कहा, ''तिलनी की जो कीमत मांगी जा रही है वो बहुत ज्यादा है। पूरे गांव और मुझे मालूम है कि जब छेदी तिलनी को लाया था तो उसने सिर्फ सौ रुपये कीमत चुकाई थी।...... मैं पचास रुपये का हर्जाना अदा कर सकता हूं।'' भीड़ तुरंत दो हिस्सों में बंट गई। कुछ कालू की तरफदारी कर रहे थे तो कुछ छेदी की। कुछ का मानना था कि मांगी गई कीमत बहुत ज्यादा है और बाकी का कहना था कि दी जा रही कीमत बहुत कम है। आखिरकार मुद्दे के हर पहलू पर तब तक बहस हुई और एंडरसन ने तिलनी की कीमत पचहत्तर रुपये तय कर दी और कालू को आदेश दिया कि वह रकम छेदी को चुका दे। कालू ने अपना कमरबंद खोला औऱ उसमें से एक डोरीदार बटुवा निकालकर एंडरसन के पैरों के पास जमीन पर पलट दिया। बटुये में से चांदी के बावन कलदार (चांदी के सिक्के) निकले। कालू के दो दोस्त आगे आए और उन्होंने तेईस कलदार और मिलाकर रकम पूरी कर दी। छेदी को पैसे गिनने को कहा गया। छेदी रुपये गिनने में मशगूल हो गया। इसी दरम्यान गांव की ओर से बहुत धीरे-धीरे एक महिला आ रही थी। उसकी चाल से जाहिर हो रहा था कि उसे चलने में बहुत दर्द हो रहा है। यह महिला भीड़ से कुछ दूर हटकर बैठ गई थी। जब रुपयों की गिनती हो चुकी तो वह उठ खड़ी हुई। खड़े होने में उसे जाहिरा तौर पर तकलीफ हो रही थी। वह बोली-''मेरा क्या होगा हजूर?'' एंडरसन ने पूछा कि तुम कौन हो? उसने जवाब दिया -''माई-बाप, मैं कालू की पत्नी हूं।''
वो लंबी और मजबूत कद-काठी की महिला थी,लेकिन गंभीर बीमारी से जूझ रही थी। उसकी तिल्ली बहुत अधिक बढ़ी हुई थी, जिस कारण उसका शरीर बहुत बेढंगा लग रहा था। उसके पैरों में जबरदस्त सूजन थी। तराई का अभिशाप कहे जाने वाले मलेरिया ने उसकी यह दुर्दशा कर दी थी। इस महिला ने थकी - थकी और भावहीन आवाज में बताना शुरू किया-''चूंकि कालू ने दूसरी पत्नी कर ली है अब मैं बेघर हो जाऊंगी। इस गांव में मेरा कोई रिश्तेदार भी नहीं है। मेरी शारीरिक स्थिति भी ऐसी नहीं है कि कुछ काम करके अपनी जिंदगी चला सकूं। मेरी देखभाल करने वाला कोई नहीं है और न ही कोई मेरे मुंह में निवाला डालने वाला है। मैं तो ऐसे ही मर जाऊंगी।'' अपने पल्लू से उसने अपना चेहरा ढंक लिया और बिना आवाज किए रोने लगी।
मामले ने ऐसा मोड़ ले लिया जो किसी ने नहीं सोचा था। इस मोड़ पर एंडरसन के लिए भी बड़ी असमंजस की स्थिति उत्पन्न हो गई, क्योंकि पूरी सुनवाई के दौरान कहीं यह जिक्र नहीं आया था कि कालू की पहले से ही पत्नी मौजूद है। इस महिला के विलाप से पूरी भीड़ में छाया सन्नाटा तब टूटा जब लोगों की निगाह बहुत देर से खड़ी तिलनी पर पड़ी। वह अब बड़ी तेजी से उस महिला की तरफ बढ़ रही थी। नजदीक पहुंचकर तिलनी ने अपनी मजबूत बांहों में कालू की पहली पत्नी को जकड़ लिया और बोली- ''मत रोओ, मत रोओ बहन और ये मत कहो कि तुम बेघर हो। कालू ने जो नई झोपडी मेरे लिए बनाई है, तुम मेरे साथ उसमें रहोगी। मैं तुम्हारा ध्यान रखूंगी। मैं तुम्हारी देखभाल करूंगी और जो कुछ भी कालू मुझे देगा उसका आधा हिस्सा मैं तुम्हें दूंगी। इसलिए चुप हो जाओ। रोओ मत और मेरे साथ चलो। मैं तुम्हें अपनी झोपडी में ले चलती हूँंजो कि अब से हम दोनों की है।''
जैसे ही तिलनी और बीमार महिला वहाँंसे रवाना हुईं, एंडरसन उठ खड़े हुए और बोले- ''आज की कार्रवाई यहीं खत्म।'' एंडरसन वाक्य पूरा नहीं कर पाए थे कि छेदी तेज कदमों से एंडरसन के पास पहुंचा और उनसे अपनी दरख्वास्त वापस मांगी। कागज वापस हाथ में आने पर उसने उसके टुकड़े-टुकड़े कर दिए और 75 कलदारों वाली अपनी पोटली जेब से बाहर निकाल कर खोल ली, बोला- ''कालू और मैं एक ही गांव के हैं और अब उसके पास खिलाने के लिए दो मुंह और हो गए हैं। उनमें से एक को खास किस्म की खुराक की जरूरत है। मैं समझता हूं कि कालू को पैसे की आवश्यकता मुझसे कहीं अधिक है। मैं आपसे आज्ञा चाहता हूं कि कालू को यह रकम वापस कर दूं। मेहरबानी करके मुझे इसकी आज्ञा दें।'' इसके तुरंत बाद भीड़ की मौजूदगी में छेदी ने स्वेच्छा से कालू को पूरी रकम लौटा दी। जिम कॉर्बेट ने लिखा है, ''लालफीताशाही के पहले के जमाने में एंडरसन और उनसे पहले के अफसर दौरा करते हुए ऐसे सैकड़ों नहीं, हजारों मामले निपटाते थे, जिनमें दोनों तरफ इंसाफ मिलने की पूरी तसल्ली होती थी। वह भी बगैर एक भी पैसा खर्च किए।''
(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / मुकुंद