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-डॉ. मयंक चतुर्वेदी
दुनिया की बदलती आर्थिक और भू-राजनीतिक परिस्थितियों के बीच भारत आज वैश्विक निवेशकों के लिए सबसे भरोसेमंद और स्थिर बाजार के रूप में उभर रहा है। अमेरिकी कंपनियों द्वारा पिछले छह महीनों में भारत में 60 अरब डॉलर से अधिक निवेश की प्रतिबद्धता निश्चित ही भारत की बढ़ती वैश्विक साख का प्रमाण है।
वस्तुत: वर्तमान में अमेजन, गूगल, सेमीकंडक्टर कंपनियों और बहुराष्ट्रीय कॉरपोरेट समूहों की भारत में बढ़ती दिलचस्पी यह दर्शाती है कि वैश्विक निवेशक अब चीन-केंद्रित मॉडल से हटकर भारत को दीर्घकालिक आर्थिक केंद्र के रूप में देख रहे हैं। अच्छी बात यह है कि व्यापक रूप में यह बदलाव तकनीक, डेटा सेंटर, लॉजिस्टिक्स, ग्रीन हाइड्रोजन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे भविष्य के क्षेत्रों में भी दिखाई दे रहा है।
कहना होगा कि पिछले कुछ वर्षों में भारत ने आर्थिक सुधारों, डिजिटल ढांचे और स्थिर नीतियों के जरिए अंतरराष्ट्रीय निवेशकों का भरोसा जीता है। मंत्री पीयूष गोयल ने कहा भी है, भारत ऐसा आर्थिक ढांचा प्रदान करता है जहां “पैमाना, प्रतिभा और बाजार” तीनों एक साथ उपलब्ध हैं। भारत के पास 1.4 अरब की विशाल आबादी, तेजी से बढ़ता मध्यम वर्ग और डिजिटल उपभोक्ता बाजार है। बढ़ती आय और उपभोग क्षमता विदेशी कंपनियों को आकर्षित कर रही है। अमेरिकी कंपनियां यह समझ चुकी हैं कि भारत केवल उत्पादन का केंद्र नहीं, बल्कि उपभोक्ता अर्थव्यवस्था का भी सबसे बड़ा भविष्य है। यही कारण है कि अमेरिका सहित दुनिया की बड़ी कंपनियां भारत में दीर्घकालिक निवेश को सुरक्षित मान रही हैं।
गूगल और अमेज़न जैसी टेक कंपनियों द्वारा भारत में बड़े डेटा सेंटर स्थापित करने की योजनाएं इस भरोसे का सबसे बड़ा उदाहरण हैं। डेटा लोकलाइजेशन, क्लाउड सर्विस और डिजिटल सेवाओं की बढ़ती मांग भारत को डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर का वैश्विक हब बना रही है।
अमेरिकी कंपनियों की ओर से आए 60 अरब डॉलर के निवेश प्रस्ताव भारत-अमेरिका संबंधों को नई ऊंचाई पर ले जा रहे हैं। यह निवेश आईटी सेक्टर के साथ ही विनिर्माण, लॉजिस्टिक्स, सेमीकंडक्टर, हरित ऊर्जा और इंफ्रास्ट्रक्चर तक फैला हुआ है। भारत ने बौद्धिक संपदा अधिकारों के संरक्षण, पारदर्शी कारोबारी माहौल और तेज निर्णय प्रक्रिया के जरिए विदेशी निवेशकों को भरोसा दिया है।
इस बीच यह भी एक सच है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था इस समय कई चुनौतियों से जूझ रही है। रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में तनाव, ऊंची महंगाई और डॉलर की मजबूती ने अधिकांश देशों की अर्थव्यवस्थाओं को प्रभावित किया है। भारतीय रुपया भी अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 96 के स्तर तक कमजोर हुआ है, किंतु जैसा कि केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल का कहना है कि भारत सरकार पूरी स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है और विभिन्न आर्थिक उपायों पर काम किया जा रहा है। उनका विश्वास है कि भारत इस कठिन दौर से भी विजेता बनकर उभरेगा।
वस्तुत: भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी घरेलू मांग और मजबूत सेवा अर्थव्यवस्था है। दुनिया के कई देशों में जहां आर्थिक मंदी की आशंका है, वहीं भारत आज भी दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था बना हुआ है। जिसमें कि प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी की हालिया पांच देशों की यात्रा ने भारत के आर्थिक और रणनीतिक संबंधों को और मजबूत किया है। संयुक्त अरब अमीरात, नीदरलैंड, स्वीडन, नॉर्वे और इटली की यात्रा के दौरान कई महत्वपूर्ण निवेश और रणनीतिक समझौते हुए।
यूएई ने भारत में लगभग पांच अरब डॉलर के नए निवेश का ऐलान किया। वहीं, कुल नए निवेश और व्यापार विस्तार योजनाओं का अनुमानित मूल्य लगभग 40 अरब डॉलर बताया गया। इस यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने 50 से अधिक बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मुख्य कार्यकारी अधिकारियों और वरिष्ठ प्रतिनिधियों से मुलाकात की। इन कंपनियों का संयुक्त बाजार मूल्य लगभग तीन ट्रिलियन डॉलर के करीब माना जा रहा है। यह तथ्य अपने आप में दर्शाता है कि भारत वैश्विक निवेश मानचित्र पर कितना महत्वपूर्ण बन चुका है।
आज सरकार का फोकस भविष्य की तकनीकों पर है। सेमीकंडक्टर निर्माण, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, ग्रीन हाइड्रोजन और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर में तेजी से निवेश बढ़ रहा है। नीदरलैंड के साथ सेमीकंडक्टर और ग्रीन हाइड्रोजन पर रणनीतिक साझेदारी इसका महत्वपूर्ण उदाहरण है। वहीं स्वीडन और इटली के साथ टेक्नोलॉजी एवं रक्षा सहयोग भारत की औद्योगिक क्षमता को नई दिशा देगा।
भारत में पहले से मौजूद बहुराष्ट्रीय कंपनियों का कुल निवेश और कारोबार लगभग 180 अरब डॉलर के आसपास पहुंच चुका है। अब ये कंपनियां अपने परिचालन का और विस्तार करना चाहती हैं। इसका सीधा लाभ रोजगार, तकनीकी विकास और निर्यात वृद्धि के रूप में भारत को मिलेगा।
ऐसे में कहना यही होगा कि वर्तमान भारत को दुनिया एक विकासशील देश से कहीं आगे खाद्य सुरक्षा, डिजिटल अर्थव्यवस्था और टिकाऊ विकास के मॉडल के रूप में देख रही है। भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है। मोबाइल निर्माण, रक्षा उत्पादन, इलेक्ट्रॉनिक्स और नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में भारत तेजी से आत्मनिर्भर बन रहा है।विदेशी निवेश का लगातार बढ़ता प्रवाह यह संकेत देता है कि आने वाले वर्षों में भारत वैश्विक आर्थिक शक्ति के रूप में और मजबूत होगा।
वस्तुत: 60 अरब डॉलर का अमेरिकी निवेश, 40 अरब डॉलर की नई व्यापार योजनाएं, यूएई का 5 अरब डॉलर निवेश और 180 अरब डॉलर का मौजूदा विदेशी कारोबारी आधार, ये सभी आंकड़े भारत की आर्थिक ताकत को प्रमाणित करते हैं। अत: स्वभाविक तौर पर स्पष्ट है कि भारत अब अवसरों का वास्तविक केंद्र बन चुका है। हम उम्मीद करें कि वैश्विक कंपनियों का बढ़ता भरोसा इस बात का संकेत है कि आने वाले दशक में भारत विश्व अर्थव्यवस्था की दिशा तय करने वाले देशों में अग्रणी भूमिका जरूर निभाएगा।
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी