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- डॉ. नुपूर निखिल देशकर
तमिलनाडु के कलपक्कम स्थित परमाणु ऊर्जा केंद्र से हाल ही में प्राप्त एक महत्वपूर्ण उपलब्धि ने भारत की ऊर्जा यात्रा को नई दिशा दी है। वैज्ञानिकों ने परमाणु अभिक्रिया की संतुलित अवस्था, जिसे ‘क्रिटिकैलिटी’ कहा जाता है, सफलतापूर्वक प्राप्त कर ली है। यह उपलब्धि एक वैज्ञानिक प्रयोग की सफलता के साथ भारत के ऊर्जा आत्मनिर्भरता के सपने की ओर एक ठोस कदम है। इस परिप्रेक्ष्य में थोरियम एक ऐसे “भविष्य के अमृत ईंधन” के रूप में उभर रहा है, जिसे लेकर अब उम्मीद है कि आने वाले समय में ऊर्जा क्षेत्र की तस्वीर बदल जाएगी।
थोरियम की सबसे बड़ी विशेषता उसका अत्यधिक ऊर्जा घनत्व है। सामान्यतः यह माना जाता है कि एक टन थोरियम से उतनी ऊर्जा प्राप्त की जा सकती है जितनी लगभग 35 लाख टन कोयले से मिलती है। यह तुलना न केवल थोरियम की क्षमता को दर्शाती है, बल्कि यह भी स्पष्ट करती है कि यदि इसका प्रभावी उपयोग किया जाए तो ऊर्जा संकट का स्थायी समाधान संभव है।
भारत की भौगोलिक संरचना इसे थोरियम के मामले में विशेष रूप से समृद्ध बनाती है। विश्व के सबसे बड़े थोरियम भंडारों में भारत का महत्वपूर्ण स्थान है। केरल के अलप्पुझा और कोल्लम तट, तमिलनाडु के कन्याकुमारी और मनावलकुरिची, ओडिशा के चांदीपुर तट तथा आंध्र प्रदेश के कुछ तटीय क्षेत्रों में मोनाज़ाइट रेत के रूप में थोरियम प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। यह संसाधन भारत को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर ही नहीं, बल्कि वैश्विक नेतृत्व की स्थिति में भी ला सकता है। अनुमान है कि यह भंडार हजारों वर्षों तक देश की ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने में सक्षम है।
थोरियम की इस अपार संभावना को भारत ने बहुत पहले पहचान लिया था। वर्ष 1950 में महान वैज्ञानिक डॉ. होमी जहांगीर भाभा ने इस दिशा में दूरदर्शिता दिखाई। उन्होंने यह समझ लिया था कि भारत में यूरेनियम की सीमित उपलब्धता के कारण थोरियम ही भविष्य का विकल्प बन सकता है। हालांकि, थोरियम का सीधा उपयोग संभव नहीं है; इसे पहले यूरेनियम-233 में परिवर्तित करना पड़ता है, जो एक जटिल और महंगी प्रक्रिया है। इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए डॉ. भाभा ने भारत के लिए त्रि-स्तरीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम की परिकल्पना की।
इस कार्यक्रम के पहले चरण में प्राकृतिक यूरेनियम का उपयोग कर ऊर्जा उत्पादन के साथ-साथ प्लूटोनियम तैयार किया जाता है। दूसरे चरण में इस प्लूटोनियम की सहायता से थोरियम को यूरेनियम-233 में परिवर्तित किया जाता है। तीसरे और अंतिम चरण में इस परिवर्तित ईंधन का उपयोग कर बड़े पैमाने पर ऊर्जा उत्पादन किया जाता है। यह एक दीर्घकालिक और वैज्ञानिक रूप से जटिल योजना थी, लेकिन इसकी सफलता भारत को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बना सकती है।
थोरियम का उपयोग केवल ऊर्जा उत्पादन तक सीमित नहीं है। यह एक रेडियोधर्मी धातु है जिसका उपयोग रेडियोमेट्रिक डेटिंग में किया जाता है, जिससे चट्टानों और जीवाश्मों की आयु का निर्धारण संभव होता है। इसके अलावा, मैग्नीशियम के साथ मिश्रधातु के रूप में इसका उपयोग उच्च ताप सहनशील और मजबूत सामग्री बनाने में होता है, जो विमानन और उन्नत तकनीकी क्षेत्रों में अत्यंत उपयोगी है। हालांकि, इस महत्वाकांक्षी कार्यक्रम को अपने प्रारंभिक वर्षों में कई बाधाओं का सामना करना पड़ा। प्रशासनिक उदासीनता, संसाधनों की कमी और 1974 के पोखरण परमाणु परीक्षण के बाद लगे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों ने इसकी गति को धीमा कर दिया। इसके अतिरिक्त, तकनीकी चुनौतियों और वैश्विक सहयोग की कमी के कारण भी यह कार्यक्रम अपेक्षित प्रगति नहीं कर सका।
इक्कीसवीं सदी के प्रारंभिक वर्षों में एक और गंभीर समस्या सामने आई थोरियम की तस्करी और अवैध खनन। 2004 के बाद से समुद्री तटीय क्षेत्रों से बड़े पैमाने पर मोनाज़ाइट रेत के गायब होने की घटनाएं सामने आईं। कुछ रिपोर्टों के अनुसार, लाखों टन सामग्री अवैध रूप से विदेशों, विशेषकर चीन, को भेजी गई। यदि ये आरोप सत्य हैं, तो यह न केवल आर्थिक नुकसान है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी गंभीर चिंता का विषय है।
वर्तमान समय में भारत सरकार ने इस दिशा में नए सिरे से प्रयास शुरू किए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में थोरियम आधारित ऊर्जा कार्यक्रम को प्राथमिकता दी जा रही है। डॉ. भाभा का जो सपना दशकों पहले अधूरा रह गया था, वह अब साकार होता दिखाई दे रहा है। भारत के पास विश्व के लगभग 25 फीसद थोरियम भंडार हैं, जो इसे इस क्षेत्र में एक वैश्विक शक्ति बना सकते हैं।
सरकार ने स्वदेशी तकनीकों के विकास पर जोर देते हुए छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर और उन्नत भारी जल रिएक्टर जैसी परियोजनाओं को बढ़ावा दिया है। इन रिएक्टरों का उद्देश्य थोरियम के सुरक्षित और प्रभावी उपयोग को सुनिश्चित करना है। साथ ही अंतरराष्ट्रीय सहयोग, नीतिगत सुधार और निवेश में वृद्धि ने इस क्षेत्र को नई ऊर्जा प्रदान की है। आज जब पूरी दुनिया ऊर्जा संकट और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों से जूझ रही है, तब थोरियम एक स्वच्छ, सुरक्षित और दीर्घकालिक विकल्प के रूप में सामने आया है। थोरियम आधारित ऊर्जा उत्पादन में रेडियोधर्मी कचरा अपेक्षाकृत कम होता है और इसकी सुरक्षा भी अधिक होती है। यही कारण है कि इसे भविष्य का “गेम-चेंजर” ईंधन कहा जा रहा है।
अत: यह कहा जा सकता है कि थोरियम न केवल भारत की ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने में सक्षम है, बल्कि यह देश को वैश्विक ऊर्जा मानचित्र पर एक अग्रणी स्थान भी दिला सकता है। आवश्यकता है तो केवल दूरदर्शिता, पारदर्शिता और सतत प्रयासों की। यदि भारत अपने इस प्राकृतिक संसाधन का सही दिशा में उपयोग करता है, तो वह न केवल आत्मनिर्भर बनेगा, बल्कि विश्व को भी स्वच्छ और सतत ऊर्जा का मार्ग दिखा सकेगा।
(लेखिका प्राध्यापिका एवं स्तम्भकार हैं)
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी