कायम है आवाज की दुनिया का जादू
विश्व रेडियो दिवस'' (13 फरवरी) पर विशेष प्रयाग पाण्डे आज विश्व रेडियो दिवस है। आज से करीब एक सौ बीस साल पहले रेडियो का आविष्कार हुआ था। रेडियो के आविष्कार ने वैश्विक संचार में अभूतपूर्व क्रांति ला दी थी। भारत में आवाज की इस अनोखी दुनिया को एक सौ
प्रयाग पाण्डे


'विश्व रेडियो दिवस' (13 फरवरी) पर विशेष

प्रयाग पाण्डे

आज विश्व रेडियो दिवस है। आज से करीब एक सौ बीस साल पहले रेडियो का आविष्कार हुआ था। रेडियो के आविष्कार ने वैश्विक संचार में अभूतपूर्व क्रांति ला दी थी। भारत में आवाज की इस अनोखी दुनिया को एक सौ तीन वर्ष पूरे होने जा रहे हैं। पिछली करीब एक सदी की शानदार यात्रा में रेडियो, भारत के जन-जन के जीवन का अभिन्न अंग बन गया है। नई संचार तकनीकी के अभ्युदय से पहले रेडियो ने भरोसेमंद जनसंचार के एक शक्तिशाली माध्यम के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।

एक स्थान से दूसरे स्थान तक बे-तार आवाज पहुँचाने और इस क्रम में रेडियो जैसे बोलते उपकरण के आविष्कार की कहानी बेहद दिलचस्प है। तरंगों के द्वारा आवाज को एक स्थान से दूसरे स्थान तक संप्रेषित करने वाले रेडियो नाम के उपकरण को मूर्त रूप लेने में करीब चार दशक लगे। इस कालखंड में अनेक भौतिकविदों एवं अभियंताओं ने रेडियो के क्रमिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

साल 1864 में एक अंग्रेज गणितीय भौतिकविद जेम्स क्लर्क मैक्सवेल ने पहली बार रेडियो तरंगों के अस्तित्व की भविष्यवाणी की थी। साल 1888 में एक जर्मन भौतिकविद हेनरिश हर्ट्ज ने रेडियो तरंगों के अस्तित्व को तो स्वीकारा लेकिन उन्होंने रेडियो तरंगों का दूरसंचार में उपयोग की संभावनाओं को नकार दिया था। इसी दरम्यान एक अंग्रेज भौतिकविद रदरफोर्ड ने तीन चौथाई मील दूरी तक रेडियो संकेत भेजकर हर्ट्ज की अवधारणा को गलत सिद्ध कर दिया। 12 दिसंबर, 1881 में इटली के विद्युत अभियंता मारकोनी ने एक स्थान से भेजी गई आवाज को सुनने और पुनः अपनी आवाज दूसरे स्थान पहुँचाने में सफलता प्राप्त कर ली, लेकिन तब रेडियो का वर्तमान स्वरूप अस्तित्व में नहीं आ पाया था। साल 1904 में विद्युत अभियंता जॉन एम्ब्रोज फ्लेमिंग और साल 1906 में अमेरिका के डी. फारेस्टर ने रेडियो के आविष्कार को आगे बढ़ाया।

प्रारंभिक चरण में रेडियो का सबसे अधिक उपयोग समुद्री जहाजों द्वारा किया गया। समुद्री जहाज खतरे या दुर्घटना की स्थिति में एक-दूसरे जहाज या तट से सहायता प्राप्त करने के लिए रेडियो का उपयोग करते थे। 25 दिसंबर, 1906 की रात को अचानक जहाजियों ने तारयंत्र से पहले एक पुरूष की आवाज सुनी फिर उन्हें एक महिला का गीत और वायलिन की धुन सुनाई दी, इसी के साथ रेडियो को अपना अस्तित्व मिल गया।

शुरुआती दौर में इंग्लैंड में रेडियो को वायरलेस कहा जाता था। अमेरिका में इसे रेडियो टेलीग्राफ कहते थे। बाद में अमेरिकी लोगों ने इसमें से टेलीग्राफ शब्द को छोड़ कर सिर्फ रेडियो कहना शुरू कर दिया।साल 1920 में वेस्टिंग हाउस कंपनी के एक इंजीनियर ने अमरीकी सरकार से रेडियो प्रसारण का लाइसेंस प्राप्त कर पिट्सबर्ग में दुनिया का पहला रेडियो प्रसारण केंद्र स्थापित किया। डॉ. फ्रैंक कॉनराड ने रेडियो में सांध्य कार्यक्रमों की एक श्रृंखला प्रारंभ की। 23 फरवरी, 1920 को मारकोनी कंपनी ने चेम्सफोर्ड से रेडियो प्रसारण शुरू किया था। नवंबर, 1922 में जॉन रीथ के निर्देशन में ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कंपनी की स्थापना हुई। इसके साथ ही इंग्लैंड में रेडियो का नियमित प्रसारण शुरू हो गया।

साल 1923 में रेडियो क्लब, मुंबई ने भारत में रेडियो का पहला प्रसारण शुरू किया। इसी वर्ष कोलकाता समेत अन्य महानगरों में भी रेडियो प्रसारण शुरू हुए। इसके बाद भारत में इंडियन ब्रॉडकास्टिंग कंपनी का गठन हुआ। कंपनी ने भारत सरकार से रेडियो प्रसारण का अनुज्ञा-पत्र प्राप्त कर 23 जुलाई, 1927 को मुंबई से रेडियो प्रसारण प्रारंभ कर दिया। इस प्रसारण केंद्र का उद्घाटन भारत के तत्कालीन वायसराय लॉर्ड इरविन ने किया था। साल 1936 में दिल्ली में रेडियो के केंद्रीय स्टेशन की स्थापना हुई। इसी वर्ष इंडियन स्टेट ब्रॉडकास्टिंग कॉर्पोरेशन वजूद में आई। साल 1936 में इसका नाम ऑल इंडिया रेडियो कर दिया गया था। साल 1957 में आकाशवाणी किया गया।

रेडियो एक सशक्त श्रव्य माध्यम है। ध्वनि की अजूबी दुनिया है। वेदों के अनुसार सृष्टि की रचना का आधार ध्वनि को माना जाता है। कहा गया है कि ध्वनि से सृष्टि की रचना हुई। ध्वनि से ब्रह्मांड का विस्तार होता है। ध्वनि से ही वाणी उत्पन्न हुई। वाणी को मन का यथार्थ चित्र माना गया है।

रेडियो की दुनिया, आवाज की दुनिया है। इसका अद्भुत और आकर्षक संसार है। अपना सम्मोहन है। रेडियो की आवाज की सम्मोहक दुनिया श्रोताओं को पलक झपकते संपूर्ण ब्रह्मांड का विचरण करा देती है। रेडियो की इसी विशेषता ने रेडियो के 'दीवानों' की लंबी परंपरा कायम की है। तत्काल और तत्क्षण संदेश प्रसारित करने की अद्भुत विशेषता की वजह से द्वितीय विश्वयुद्ध में प्रसार की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए रेडियो का तीव्र गति से विस्तार हुआ।

शुरुआती दिनों में हेडफोन लगाकर रेडियो सुना जाता था। कालांतर में बड़े रेडियो आए, जिन्हें सामूहिक रूप से सुना जाता था। साल 1947 में राकले, ब्राटेन और बार्डिन नाम के तीन अमेरिकी वैज्ञानिकों ने ट्रांजिस्टर का आविष्कार किया। ट्रांजिस्टर के आविष्कार से रेडियो की दुनिया में क्रांति आ गई। रेडियो सुनना सामूहिक से निजी हो गया। तब जहाँ सड़क, बिजली और यातायात के साधन नहीं थे, उन दूरस्थ क्षेत्रों में भी ट्रांजिस्टर पहुँच गया। पहुँच, निरंतरता, सुलभता और सस्ती तकनीक के कारण रेडियो सूचना, शिक्षा और मनोरंजन का लोकप्रिय जनसंचार माध्यम बन गया।

रेडियो सर्वसुलभ एवं सस्ता जनसंचार माध्यम है। साक्षर और निरक्षर सभी के लिए उपयोगी है। नेत्रहीनों के लिए वरदान है। रेडियो का लचीलापन और पहुँच बेजोड़ है। रेडियो को जहाँ जी चाहे ले जा सकते हैं, सुन सकते हैं। कोई भी काम करते समय इसे सुना जा सकता है। रेडियो के लिए भौगोलिक सीमाएं कोई बाधा उत्पन्न नहीं करती हैं। दूरदराज के क्षेत्रों और गाँवों में, जहाँ जनसंचार के अन्य माध्यमों की पहुँच नहीं है, वहाँ के लिए रेडियो ज्ञान का प्रवेश द्वार है।

रेडियो दृश्यहीन माध्यम है। रेडियो की दुनिया का सारा दारोमदार ध्वनि और आवाज पर निर्भर है। श्रव्य माध्यम होने के कारण इसकी कुछ सीमाएं हैं। बावजूद इसके रेडियो की अपनी कुछ अनूठी विशेषताएं हैं। रेडियो 'वर्तमान' और 'जीवंत' होने का बोध कराता है। रेडियो श्रोताओं की कल्पनाशक्ति को जागृत करता है। श्रोताओं की कल्पनाशक्ति और विचारशक्ति को उन्मुक्त उड़ान भरने का अवसर प्रदान करता है, इसके उलट दृश्य माध्यम दर्शकों की विचारशक्ति को कुंठित करते हैं और उनकी मौलिक सोच को प्रभावित करते हैं।

साल 1990 के दशक में इलेक्ट्रॉनिक क्षेत्र में आई क्रांति ने संचार क्रांति को जन्म दिया है। उपग्रहों और अनेक प्रकार के अत्याधुनिक उपकरणों की सहायता से जनसंचार माध्यमों की शक्ति और विस्तार को अकल्पनीय ऊँचाइयों तक पहुँचा दिया है। नित नए आविष्कारों ने टीवी, मोबाइल समेत रोजमर्रा के जीवन में उपयोग में आने वाले अनेक उपकरणों को 'स्मार्ट' बना दिया है। संपूर्ण ब्रह्मांड की समस्त जानकारियां एक छोटे-से मोबाइल में समा गई हैं।

संचार क्रांति के मौजूदा दौर में भी रेडियो की प्रासंगिकता बनी हुई है। कम्युनिटी रेडियो आ गए हैं। सैकड़ों खबरिया चैनलों के आ जाने के बावजूद रेडियो सूचना, शिक्षा और मनोरंजन का लोकप्रिय माध्यम है। रेडियो का विशाल श्रोता वर्ग है। दूसरे इलेक्ट्रॉनिक समाचार माध्यमों के बनिस्बत रेडियो में प्रसारित समाचारों की विश्वनीयता आज भी असंदिग्ध मानी जाती है। पहले 'कानों सुनी' के मुकाबले 'आँखों देखी' पर ज्यादा भरोसा किया जाता था लेकिन मौजूदा दौर के खबरिया चैनलों ने इस भ्रम को तोड़ दिया है।

(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

-----------------------

हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश