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मुंबई,09 जनवरी ( हि.स.) । इलेक्शन कमीशन पूरे देश में वोट करें, डेमोक्रेसी का जश्न जैसे बहुत सारे ऐड दिखा रहा है। लेकिन, दूसरी तरफ, क्योंकि कई जगहों पर कैंडिडेट बिना मुकाबले के चुने जा रहे हैं, इसलिए वोटर्स के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है: वोट कहाँ दें?
यह बात तेज़ी से साफ़ होती जा रही है कि म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन, ग्राम पंचायत और म्युनिसिपैलिटी जैसे लोकल सेल्फ-गवर्नमेंट बॉडी के चुनावों में कई सीटें बिना मुकाबले के जा रही हैं। कुछ जगहों पर, लोग आरोप लगा रहे हैं कि नॉमिनेशन पेपर फाइल करते समय दबाव, पॉलिटिकल मिलीभगत, पैसे की ताकत और डर का माहौल बनाया जा रहा है। इस वजह से, बिना वोट दिए ही रिप्रेजेंटेटिव अपॉइंट किए जा रहे हैं, और वोटर्स को डेमोक्रेसी में उनकी एक्टिव हिस्सेदारी से दूर रखा जा रहा है।
महाराष्ट्र में आने वाले म्युनिसिपल चुनावों के बैकग्राउंड में यह मामला और भी सीरियस होता जा रहा है। मुंबई, ठाणे, पुणे, नासिक और छत्रपति संभाजीनगर जैसी नगर पालिकाओं में चुनाव की तैयारी चल रही है, ऐसे में बिना विरोध के चुनाव की बढ़ती संख्या लोकतंत्र की सेहत पर सवाल उठा रही है।
अगर शहरी स्व-सरकारी निकायों, जिन्हें लोकतंत्र का गढ़ माना जाता है, में वोटरों को वोट देने का मौका नहीं मिलता है, तो यह भावना जताई जा रही है कि “लोकतंत्र का जश्न” सिर्फ एक नारा है।
ऐसे में सीधा सवाल यह उठ रहा है कि चुनाव आयोग के “वोट” विज्ञापनों का क्या फायदा है। अगर वोटरों को वोट देने का अधिकार नहीं है, तो यह सवाल और भी तीखा होता जा रहा है: क्या लोकतंत्र का जश्न मनाया जा रहा है या इसे लोकतंत्र की औपचारिकता के तौर पर निभाया जा रहा है?
लोकतंत्र में चुनाव मुकाबले पर आधारित होते हैं। अगर कोई विकल्प नहीं है, तो विकल्प सिर्फ नाम का रह जाता है। राजनीतिक वैज्ञानिक और नागरिक अधिकार कार्यकर्ता यह राय दे रहे हैं कि बिना विरोध के चुनाव की बढ़ती संख्या न सिर्फ एक प्रशासनिक मामला है, बल्कि यह लोकतंत्र की नींव को कमजोर करने वाला भी मामला है। लोगों की ज़ोरदार मांग है कि इलेक्शन कमीशन सिर्फ़ वोटर टर्नआउट बढ़ाने तक ही सीमित न रहे, बल्कि ऐसा माहौल बनाने की ज़िम्मेदारी भी ले, जिससे सच में आज़ाद, निष्पक्ष, पारदर्शी और मुकाबले वाले चुनाव हो सकें।
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हिन्दुस्थान समाचार / रवीन्द्र शर्मा