वैश्विक मंच पर भारतीय समुदाय की आर्थिक, सामाजिक और पेशेवर साख
- डॉ. मयंक चतुर्वेदीडोनाल्ड ट्रंप द्वारा साझा की गई ‘इमिग्रेंट वेलफेयर रिसिपिएंट रेट्स’ की सूची ने एक बार फिर वैश्विक मंच पर भारतीय समुदाय की आर्थिक, सामाजिक और पेशेवर साख को उजागर कर दिया है। 120 देशों के नामों वाली इस सूची में भारत का नाम न होन
अमेरिका में भारतीय


अमेरिका : भारतीयों के लिए गौरव


- डॉ. मयंक चतुर्वेदीडोनाल्ड ट्रंप द्वारा साझा की गई ‘इमिग्रेंट वेलफेयर रिसिपिएंट रेट्स’ की सूची ने एक बार फिर वैश्विक मंच पर भारतीय समुदाय की आर्थिक, सामाजिक और पेशेवर साख को उजागर कर दिया है। 120 देशों के नामों वाली इस सूची में भारत का नाम न होना बता रहा है कि दशकों की मेहनत, शिक्षा, अनुशासन और योगदान का ये सुखद परिणाम है। यह तथ्य आज हर भारतीय के लिए गर्व का विषय है! यह दर्शाता है कि अमेरिका जैसे देश की अर्थव्यवस्था में भारतीय समुदाय बोझ नहीं है, वह यहाँ की अर्थव्यवस्था का एक मजबूत स्तंभ है।

कहना होगा कि अमेरिका में भारतीय प्रवासियों की पहचान हमेशा मेहनती, शिक्षित और आत्मनिर्भर समुदाय के रूप में रही है। ट्रंप द्वारा जारी ये सूची भले ही राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित हो, किंतु आज सभी के समक्ष एक अनकहा सत्य सामने रख देती है कि भारतीय समुदाय अमेरिका की सरकारी मदद पर निर्भर नहीं है। इसके उलट वे टैक्स देने वाले, नौकरियां पैदा करने वाले और नवाचार को आगे बढ़ाने वाले नागरिक हैं। जब पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और चीन जैसे देशों से आए प्रवासियों का बड़ा हिस्सा अमेरिकी वेलफेयर सिस्टम पर निर्भर दिखता है, तब भारत का इस सूची से बाहर होना भारतीय समाज की आर्थिक आत्मनिर्भरता और पेशेवर क्षमता का प्रमाण बन सामने आता है।

प्यू रिसर्च सेंटर के आंकड़े जो इस संदर्भ में सभी के सामने आए हैं, ये बताते हैं कि भारतीय-अमेरिकियों की औसत वार्षिक घरेलू आय लगभग 1,51,200 डॉलर है, जोकि अमेरिका के किसी भी अन्य जातीय या प्रवासी समूह से अधिक है। यह आंकड़ा उस मानसिकता को दर्शाता है जो शिक्षा, कौशल और दीर्घकालिक स्थिरता को प्राथमिकता देती है। भारतीय परिवारों में शिक्षा को सबसे बड़ा निवेश माना जाता है। यही कारण है कि भारतीय मूल के लोग अमेरिका में डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, प्रोफेसर, टेक लीडर और बड़ी-बड़ी कंपनियों के सीईओ के रूप में नजर आते हैं।

भारतीय समुदाय की यह आर्थिक सफलता अमेरिका की अर्थव्यवस्था पर सीधा प्रभाव डालती है। उच्च आय का मतलब है अधिक टैक्स योगदान, अधिक उपभोग और अधिक निवेश। सिलिकॉन वैली से लेकर वॉल स्ट्रीट तक भारतीय पेशेवरों ने टेक्नोलॉजी, हेल्थकेयर, फाइनेंस और स्टार्टअप इकोसिस्टम को नई दिशा दी है। आज अमेरिका की कई बड़ी कंपनियों, चाहे वे टेक सेक्टर की हों या कंज्यूमर इंडस्ट्री, उनके शीर्ष पदों पर भारतीय मूल के लोग बैठे हैं। ये लोग यहाँ कंपनियों को मुनाफा दिलाते हैं, लाखों अमेरिकियों के लिए रोजगार भी पैदा करते हैं।

इसके विपरीत, ट्रंप की सूची में शामिल देशों के आंकड़े एक अलग तस्वीर पेश करते हैं। बांग्लादेश के करीब 54.8 प्रतिशत प्रवासी परिवारों का अमेरिकी वेलफेयर पर निर्भर होना, पाकिस्तान के 40.2 प्रतिशत और नेपाल के 34.8 प्रतिशत परिवारों का सरकारी सहायता लेना, चीन (32.9 प्रतिशत), इजरायल/फिलिस्तीन (25.9 प्रतिशत), यूक्रेन (42.7 प्रतिशत) और एशिया (कहीं और वर्गीकृत या निर्दिष्ट नहीं) के 38.8 प्रतिशत प्रवासियों को आज अमेरिकी सहायता मिल रही है। वस्‍तुत: यह सवाल खड़ा करता है कि आखिर इन समुदायों पर अमेरिकी खजाने का दबाव आखिर अधिक क्‍यों है!

इस अंतर का कारण जो सीधे तौर पर समझ आता है वो भारतीयों का वर्क कल्चर और सामाजिक मूल्य हैं। भारतीय प्रवासी आमतौर पर अमेरिका में पढ़ाई या उच्च कौशल वाली नौकरियों के जरिए प्रवेश करते हैं। वे शॉर्टकट या सिस्टम के दुरुपयोग के बजाय लंबी मेहनत में विश्वास रखते हैं। परिवार केंद्रित सोच, बचत की आदत और शिक्षा पर जोर उन्हें जल्दी आत्मनिर्भर बना देता है। यही वजह है कि भारतीय समुदाय में सरकारी सहायता लेने की जरूरत न्यूनतम रहती है।

यहां ध्‍यातव्‍य यह भी है कि डोनाल्ड ट्रंप लंबे समय से अवैध इमिग्रेशन और वेलफेयर सिस्टम के दुरुपयोग के खिलाफ बयान देते रहे हैं। ऐसे में भारत का नाम इस सूची में न होना एक तरह से यह संदेश देता है कि अगर कोई प्रवासी समुदाय अमेरिकी समाज में घुल-मिलकर योगदान दे रहा है तो वह भारतीय है। भले ही ट्रंप ने सीधे तौर पर भारतीयों की तारीफ न की हो किंतु आंकड़े खुद बोलते हैं। यह एक अनजानी प्रशंसा है जो खुलकर बता रही है कि अमेरिका में भारतीय “लेने वाले” नहीं, बल्कि “देने वाले” समुदाय के रूप में स्थापित हैं।

आज भारतीय-अमेरिकी समुदाय अमेरिका की कुल एशियाई आबादी का लगभग 21 प्रतिशत हिस्सा है और दूसरा सबसे बड़ा एशियाई समूह है। संख्या के साथ-साथ गुणवत्ता में भी यह समुदाय आगे है। रिसर्च, इनोवेशन, मेडिकल एडवांसमेंट और टेक्नोलॉजिकल ग्रोथ में भारतीयों का योगदान अमेरिकी अर्थव्यवस्था की गति को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाता है। कोविड-19 जैसे वैश्विक संकट के दौरान भी भारतीय मूल के डॉक्टरों, वैज्ञानिकों और हेल्थकेयर वर्कर्स ने फ्रंटलाइन पर रहकर अमेरिका को संभाला है।

वस्तुतः भारत का नाम ट्रंप की ‘वेलफेयर लिस्ट’ में न होना आज ये बता रहा है कि यहाँ भारतीय उस सॉफ्ट पावर का संकेत हैं जोकि सिर्फ अपने लिए नहीं बल्कि इस देश के लिए भी मूल्य जोड़ते हैं। इसलिए ही आज अमेरिका की अर्थव्यवस्था जिन मजबूत स्तंभों पर टिकी है, उनमें भारतीय समुदाय एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। टैक्सपेयर्स, इनोवेटर्स, लीडर्स और प्रोफेशनल्स के रूप में भारतीयों ने यह साबित कर दिया है कि वे बोझ नहीं अमेरिकन अर्थव्‍यवस्‍था की रीढ़ हैं। ट्रंप की सूची ने भले ही राजनीतिक बहस को जन्म दिया हो, पर भारतीयों के लिए यह एक शांत, लेकिन मजबूत प्रमाण है, इस बात का कि मेहनत, शिक्षा और ईमानदारी से दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में भी अपनी सफलतम जगह बनाई जा सकती है।

(लेखक केंन्‍द्रीय फिल्‍म प्रमाणन बोर्ड एडवाइजरी कमेटी के पूर्व सदस्‍य एवं पत्रकार हैं)

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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी