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-डॉ. निवेदिता शर्मा
भारत में प्रदूषण की समस्या कोई नई नहीं है। यह हर साल की कहानी बन चुकी है। विशेषकर सर्दियों में जब दिल्ली और उत्तर भारत के कई राज्य जहरीली धुंध और स्मॉग से ढक जाते हैं, तब यह विषय चर्चा का केंद्र बनता है। परंतु सच्चाई यह है कि प्रदूषण अब केवल मौसम विशेष की परेशानी नहीं रहा, अब ये एक स्थायी संकट बन चुका है और इस संकट की जड़ हमारी असंवेदनशीलता है।
आम लोगों की धारणा रही है कि प्रदूषण का असर केवल फेफड़ों पर पड़ता है, लेकिन विज्ञान ने इसे गलत करार दिया है। नई चिकित्सीय खोजें बताती हैं कि प्रदूषण का सीधा असर हमारे दिल पर होता है। न्यू इग्लेंड जर्नल ऑफ मेडिसिन और अमेरिका हेल्स एसोसिएशन के अनुसार प्रदूषण में मौजूद कण जैसे पीएम₂.₅, पीएम₁₀, और जहरीली गैसें (कार्बन मोनोऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड, ओजोन) रक्त प्रवाह तक पहुंचकर हृदय को प्रभावित करती हैं।
ये सूक्ष्म कण शरीर में सूजन और ऑक्सीडेटिव तनाव बढ़ाते हैं। धमनियों की आंतरिक परत कमजोर पड़ने लगती है, जिससे ब्लॉकेज, हाई ब्लड प्रेशर और रक्त के थक्के बनने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। इसका सीधा परिणाम हार्ट अटैक, स्ट्रोक और हार्ट फेल्योर जैसे गंभीर रोगों के रूप में सामने आता है। वर्तमान में प्रदूषण और दिल की बीमारियों का यह रिश्ता अब वैश्विक स्तर पर प्रमाणित तथ्य बन चुका है। द लांसेट कमीशन की रिपोर्ट कहती है कि वर्ष 2019 में पूरी दुनिया में लगभग 90 लाख मौतें केवल वायु प्रदूषण के कारण हुईं। इनमें से 62 प्रतिशत मौतें हार्ट अटैक और स्ट्रोक जैसी हृदय रोगों से जुड़ी थीं।
भारत की स्थिति इस मामले में बेहद चिंताजनक है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट बताती है कि दिल्ली, कानपुर, लुधियाना, पटना और झारखंड जैसे कई हिस्सों में वायु गुणवत्ता सूचकांक लगातार खतरनाक श्रेणी में रहता है। सर्दियों में जब मौसम ठंडा और स्थिर होता है तो प्रदूषित कण हवा में ज्यादा देर तक टिके रहते हैं और लोगों को जहरीली धुंध का सामना करना पड़ता है। इसके लिए कई कारण जिम्मेदार हैं। औद्योगीकरण के साथ बड़ी संख्या में बढ़ते वाहन, बिजली घरों और फैक्ट्रियों से निकलता धुआं, जीवाश्म ईंधन पर बढ़ती निर्भरता, सर्दियों में किसानों द्वारा पराली जलाना, शहरों में कचरा खुलेआम जलाना, निर्माण कार्यों से निकलती धूल और प्रदूषण नियंत्रण नियमों की अनदेखी, ये सब मिलकर इस समस्या को भयावह बनाते हैं।
सबसे खतरनाक बात यह है कि लोग इस समस्या को अब सामान्य मान चुके हैं। हमारी असंवेदनशीलता इस संकट की सबसे बड़ी वजह बन चुकी है। सड़कों पर कचरा जलाना, निजी वाहनों की अंधाधुंध बढ़ोतरी, औद्योगिक इकाइयों का नियमों का उल्लंघन करना, और खेतों में पराली जलाने की परंपरा जारी रखना, ये सब हमारी ही लापरवाही और असंवेदनशीलता के उदाहरण हैं। हमें लगता है कि प्रदूषण का असर कहीं बाहर होता है, हमारी निजी जिंदगी पर इसका सीधा असर नहीं पड़ता। परंतु सच्चाई यह है कि यह जहर हमारी सांसों और हमारे दिल की धड़कनों तक पहुंच चुका है।
स्वास्थ्य पर इसके प्रभाव बेहद गहरे हैं। दिल की बीमारियाँ बढ़ने का अर्थ है कार्य क्षमता में कमी, अस्पतालों का बढ़ता बोझ, इलाज पर बढ़ता खर्च और जीवन की गुणवत्ता में गिरावट। यह केवल व्यक्ति की नहीं पूरे देश की अर्थव्यवस्था की समस्या बनता जा रहा है। जब बड़ी संख्या में लोग बीमारी के कारण अपनी उत्पादकता खो देते हैं तो यह राष्ट्रीय विकास को धीमा कर देता है। प्रदूषण इसलिए केवल स्वास्थ्य का ही नहीं बल्कि आर्थिक विकास का भी गंभीर मुद्दा है।
अब सवाल है कि समाधान क्या है। क्या इस अंधकार में कोई रोशनी है। इसका उत्तर हाँ में है, बशर्ते कि हम सब मिलकर प्रयास करें। सरकार को कड़े नियम लागू करने होंगे। प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों पर निगरानी और दंडात्मक कार्रवाई होनी चाहिए। वाहनों की संख्या नियंत्रित करने के लिए सार्वजनिक परिवहन को सस्ता, सुविधाजनक और सुरक्षित बनाना होगा। किसानों को पराली जलाने के विकल्प उपलब्ध कराने होंगे ताकि वे मजबूरी में खेतों को जलाने के बजाय नई तकनीकों का उपयोग कर सकें।
निर्माण कार्यों के लिए भी सख्त नियम बनाकर उनकी निगरानी करनी होगी। किंतु इसके साथ यह भी समझना होगा कि यह जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं है। आम नागरिकों को भी आगे आना होगा। हमें निजी वाहनों पर निर्भरता कम करनी होगी और सार्वजनिक परिवहन, साइकिल तथा पैदल चलने को प्राथमिकता देनी होगी। घरों और मोहल्लों में अधिक से अधिक पेड़ लगाने होंगे और उनकी देखभाल करनी होगी। बिजली और पानी की बचत करनी होगी और नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों जैसे सौर और पवन ऊर्जा को अपनाना होगा। कचरा जलाने से बचना होगा और उसका वैज्ञानिक ढंग से प्रबंधन करना होगा। सबसे महत्वपूर्ण है कि हम प्रदूषण के खतरों और उसके स्वास्थ्य पर असर को लेकर लोगों में जागरूकता फैलाएं।
असल में प्रदूषण का असली समाधान हमारी संवेदनशीलता में छिपा है। जब तक हम यह नहीं समझेंगे कि प्रदूषण से लड़ना हमारी निजी जिम्मेदारी है, तब तक यह संकट कम नहीं होगा। यह केवल अदालतों या प्रशासन का विषय नहीं है, यह हमारे जीवन और मृत्यु का प्रश्न है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि प्रदूषण को कम करना कोई अतिरिक्त जिम्मेदारी नहीं, बल्कि जीवन बचाने की अनिवार्यता है।
आज भारत का पर्यावरण और हमारे दिल दोनों एक ही संकट से गुजर रहे हैं। अगर हम आज नहीं चेते तो आने वाली पीढ़ियां जहरीली हवा और बीमार शरीर की विरासत पाएंगी। क्या हम उन्हें ऐसा भविष्य देना चाहते हैं। अगर नहीं, तो आज ही हमें प्रण लेना होगा कि हम पर्यावरण के प्रति संवेदनशील होंगे, प्रदूषण रोकने के प्रयासों में सक्रिय रूप से भाग लेंगे और अपनी जीवनशैली में ऐसे बदलाव करेंगे जो प्रकृति और स्वास्थ्य दोनों के लिए अनुकूल हों।
स्वच्छ हवा और स्वस्थ दिल केवल सरकारी आदेशों या वैज्ञानिक उपायों से नहीं मिल सकते। यह तभी संभव है जब नागरिक और शासन मिलकर आगे बढ़ें और एक नई सोच विकसित करें। भारत के भविष्य की कुंजी इसी सामूहिक जिम्मेदारी में छिपी है। हमारी असंवेदनशीलता ही प्रदूषण का सबसे बड़ा सच है और यदि हमने समय रहते इसे संवेदनशीलता में नहीं बदला तो यह संकट हमारे अस्तित्व पर ही प्रश्नचिह्न लगा देगा।
(लेखिका, बच्चों एवं पर्यावरण विषय पर कार्य करती है, समाजिक कार्यकर्ता हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी