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रायगढ़ 19 जुलाई (हि.स.)। मानसून के दौरान रायगढ़ शहर की जीवनदायिनी केलो नदी प्रदूषण की गंभीर मार झेल रही है। शहर के नालों से बहकर आने वाला प्लास्टिक, घरेलू कचरा, थर्माकोल, पॉलीथिन और अन्य ठोस अपशिष्ट सीधे नदी में पहुंच रहे हैं। इससे नदी का पानी अत्यधिक मटमैला और प्रदूषित हो गया है। हालात ऐसे हैं कि करोड़ों रुपये की आधुनिक मशीनों के उपयोग और क्लोरीन की मात्रा बढ़ाने के बावजूद जल शोधन व्यवस्था पर भारी दबाव बना हुआ है।
उल्लेखनीय है कि कि आईपीएस इंटेकवेल की जल उठाव क्षमता 2 करोड़ 50 लाख लीटर प्रतिदिन है। बारिश के दौरान जलस्तर और प्रवाह बढ़ने के कारण अब बाय-पंपिंग के माध्यम से लगभग 3 करोड़ लीटर प्रतिदिन पानी का उठाव किया जा रहा है। हालांकि बढ़े हुए जल उठाव के साथ नदी में बहकर आने वाले कचरे और गाद की मात्रा भी कई गुना बढ़ गई है, जिससे जल शोधन की प्रक्रिया बेहद कठिन हो गई है।इंटेकवेल में नदी से आने वाले कचरे को रोकने के लिए तीन चरणों में सफाई की व्यवस्था की गई है। सबसे पहले मैनुअल स्क्रीन के माध्यम से बड़े कचरे को जाली लगाकर रोका जाता है, जिसे कर्मचारी हाथों से निकालते हैं। इसके बाद मैकेनिकल कोर्स स्क्रीन स्वतः बड़े ठोस अपशिष्टों को हटाती है।
अंत में मैकेनिकल फाइन स्क्रीन एसटीपी के इनलेट प्वाइंट पर बचा हुआ सूक्ष्म कचरा अलग करती है।इसके बावजूद लगातार बहकर आ रहे प्लास्टिक और अन्य अपशिष्टों के कारण मशीनों की क्षमता पर भी असर पड़ रहा है और पूरी तरह कचरा हटाना संभव नहीं हो पा रहा है।जानकारों की माने तो केवल जल शोधन संयंत्र में क्लोरीन बढ़ाकर समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है। इसके लिए शहर के नालों पर कचरा अवरोधक व्यवस्था मजबूत करना, ठोस अपशिष्ट का प्रबंधन, नालों के गंदे पानी के प्रभावी व्यवस्था तथा नदी में कचरा फेंकने वालों पर सख्त कार्रवाई आवश्यक है। अन्यथा हर बारिश में केलो नदी इसी तरह प्रदूषण की मार झेलती रहेगी और स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराना प्रशासन के लिए और अधिक चुनौतीपूर्ण होता जाएगा।
जल शोधन संयंत्र के अधिकारियों के अनुसार, सामान्य दिनों में पानी को शुद्ध करने के लिए हर आठ घंटे में लगभग 50 किलो क्लोरीन का उपयोग किया जाता था, यानी प्रतिदिन करीब 150 किलो क्लोरीन पर्याप्त होती थी। लेकिन बारिश के मौसम में पानी की गुणवत्ता लगातार खराब होने के कारण अब लगभग 250 किलो क्लोरीन प्रतिदिन खर्च करनी पड़ रही है। इसके बावजूद मटमैले पानी को पूरी तरह साफ करना बड़ी चुनौती बना हुआ है। इंटेकवेल के पास जहां पानी का रंग गहरे मटमैले स्वरूप में दिखाई दे रहा है तथा सतह पर तैरता कचरा नजर आता है। यह स्थिति बताती है कि बरसाती बहाव के साथ प्रदूषण सीधे जल स्रोत तक पहुंच रहा है, जिससे जल शोधन संयंत्र पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि शहर के नालों से बिना उपचार के गंदा पानी और ठोस कचरा सीधे केलो नदी में गिरता रहा तो भविष्य में जल गुणवत्ता और अधिक प्रभावित होगी। इससे न केवल पेयजल शोधन की लागत बढ़ेगी बल्कि नदी के जलीय जीवों, पर्यावरण और आम नागरिकों के स्वास्थ्य पर भी गंभीर खतरा उत्पन्न हो सकता है।
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हिन्दुस्थान समाचार / रघुवीर प्रधान