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कोलकाता, 07 जनवरी (हि.स.)।
महानगर में पारे की लगातार गिरावट के साथ घनी धुंध ने लोगों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। ठंड और धुंध के इस मेल से हवा में प्रदूषण खतरनाक स्तर तक पहुंच गया है। हालात ऐसे हैं कि बुजुर्गों और बच्चों में सांस से जुड़ी दिक्कतें बढ़ रही हैं, जबकि दमा के मरीजों की परेशानी और ज्यादा गंभीर हो गई है।
जानकारी के मुताबिक, नए साल की रात से ही हालात बिगड़ने शुरू हो गए थे। आतिशबाजी के धुएं के साथ हवा में जहर घुल गया और उसके बाद से लगातार तापमान में गिरावट दर्ज की गई। पारा गिरते ही शहर धुंध की चादर में लिपट गया। आमतौर पर सर्दियों में हवा भारी हो जाती है और जब उसके साथ धुंध जुड़ जाती है, तो सूक्ष्म और अति सूक्ष्म प्रदूषण कण हवा की निचली परत में ही फंस जाते हैं। बीते कुछ दिनों से सुबह ही नहीं, बल्कि दोपहर तक शहर धुंध के घेरे में रह रहा है।
इसका सीधा असर शहर के प्रदूषण हॉटस्पॉट इलाकों में दिख रहा है। बुधवार को कोलकाता और हावड़ा के कई हिस्सों में अति सूक्ष्म प्रदूषण कण पीएम 2.5 का स्तर प्रति घन मीटर हवा में 300 माइक्रोग्राम से ऊपर चला गया। पर्यावरण से जुड़े लोग सर्दियों में आग जलाने के दौरान लकड़ी और प्लास्टिक जलाए जाने को लेकर भी चिंता जता रहे हैं।
पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि सर्दियों के मौसम और स्थिर हवा के कारण शहर की औसत वायु गुणवत्ता सूचकांक तेजी से खराब की ओर जा रहा है। बीते कुछ दिनों में जादवपुर इलाके में वायु गुणवत्ता सूचकांक 275 से 305 के बीच दर्ज किया गया। रवींद्रभारती विश्वविद्यालय क्षेत्र में कई दिनों तक यह आंकड़ा 316 तक पहुंच गया, जो जनस्वास्थ्य के लिहाज से बेहद चिंताजनक है। बालीगंज इलाके में भी वायु गुणवत्ता सूचकांक करीब 275 से 300 के पार रहा।
कोलकाता नगर निगम की ओर से अत्यधिक प्रदूषित इलाकों में पानी का छिड़काव कर धूल कणों को कम करने की कोशिश की जा रही है, लेकिन इसका खास असर नजर नहीं आ रहा। पर्यावरण से जुड़े लोगों का कहना है कि जब तक खुले में आग जलाने पर सख्ती नहीं होगी, तब तक हालात सुधरना मुश्किल है।
हिन्दुस्थान समाचार / ओम पराशर