अमेरिका से भारतीय मीडिया के लिए सबक : अभिव्यक्ति नहीं, राष्ट्रहित सर्वोपरि
- डॉ. मयंक चतुर्वेदी वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी के बाद अमेरिका की सैन्य कार्रवाई एक बार फिर वैश्विक चर्चा में है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अंजाम दिए गए इस गुप्त अभियान ‘ऑपरेशन एब्सोल्यूट-रिजॉल्व (ओएआर)’ ने न
अमेरिका से भारतीय मीडिया के लिए सबक


डाॅ. मयंक चतुर्वेदी


- डॉ. मयंक चतुर्वेदी

वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी के बाद अमेरिका की सैन्य कार्रवाई एक बार फिर वैश्विक चर्चा में है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अंजाम दिए गए इस गुप्त अभियान ‘ऑपरेशन एब्सोल्यूट-रिजॉल्व (ओएआर)’ ने न सिर्फ अंतरराष्ट्रीय राजनीति को झकझोरा, बल्कि मीडिया की भूमिका पर भी एक नई बहस छेड़ दी है। अमेरिकी सेना, डेल्टा फोर्स, सीआईए, नेवी और एफबीआई के संयुक्त अभियान में वेनेजुएला में व्यापक सैन्य कार्रवाई हुई और अंततः मादुरो तथा उनकी पत्नी की गिरफ्तारी कर उन्हें न्यूयॉर्क लाया गया। किंतु इस पूरे घटनाक्रम से भी अधिक महत्वपूर्ण वह तथ्य है, जो बाद में सामने आया कि अमेरिकी मीडिया को इस ऑपरेशन की जानकारी पहले से थी, फिर भी उसने जानबूझकर इसे सार्वजनिक नहीं किया। यही वह बिंदु है, जिसने आज भारतीय मीडिया के लिए आत्ममंथन का अवसर दिया है।

अमेरिकी मीडिया का संयम और राष्ट्रहित

यह अब स्पष्ट हो चुका है कि ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ और ‘द वॉशिंगटन पोस्ट’ जैसे प्रतिष्ठित अमेरिकी अखबारों के वरिष्ठ संपादकों को इस गुप्त सैन्य कार्रवाई की संवेदनशील जानकारी उनके सूत्रों द्वारा पहले ही दे दी गई थी। इसके बावजूद उन्होंने इसे प्रकाशित नहीं किया। कारण सीधा और स्पष्ट था- अमेरिकी सैनिकों की सुरक्षा और राष्ट्रीय हित। यह निर्णय ऐसे समय में लिया गया, जब राष्ट्रपति ट्रंप और अमेरिकी मीडिया के बीच टकराव जगजाहिर रहा है। वैचारिक विरोध, राजनीतिक असहमति और तीखी आलोचना के बावजूद जब बात देश और सैनिकों की जान की आई तो अमेरिकी मीडिया ने एकजुटता दिखाई।

यह अमेरिकी पत्रकारिता की उस पुरानी परंपरा को दर्शाता है जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में संयम और जिम्मेदारी को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से ऊपर रखा जाता है। यहां यह समझना जरूरी है कि अमेरिका में भी प्रेस स्वतंत्र है, आलोचनात्मक है और सत्ता से सवाल पूछता है लेकिन वह यह भी जानता है कि हर सत्य को हर समय उजागर करना पत्रकारिता नहीं है। कभी-कभी मौन भी देशभक्ति का एक रूप होता है।

भारतीय मीडिया की तुलना में स्थिति

इसके उलट यदि भारतीय मीडिया के व्यवहार पर नजर डालें तो तस्वीर कुछ अलग दिखाई देती है। यहां कई बार ऐसी होड़ देखी गई है कि जो नहीं दिखाना चाहिए, वही सबसे पहले दिखाने की कोशिश होती है। राष्ट्रीय सुरक्षा, सैन्य अभियान और आतंकवाद से जुड़े मामलों में भी “एक्सक्लूसिव” और “ब्रेकिंग न्यूज” की प्रतिस्पर्धा अक्सर विवेक पर भारी पड़ जाती है या कहा जाए कि आज भी पड़ रही है।

इस संदर्भ में उल्‍लेखित है कि हाल ही में आई फिल्म ‘धुरंधर’ ने 26/11 मुंबई आतंकी हमलों के दौरान मीडिया की भूमिका को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है। 26 नवंबर 2008 की रात से 29 नवंबर तक कई टीवी चैनलों ने होटल ताज, ओबेरॉय और अन्य ठिकानों के लाइव दृश्य लगातार दिखाए। इन प्रसारणों के कारण आतंकवादी अलर्ट हो गए और सुरक्षा बलों की रणनीति को नुकसान पहुंचा। इसका परिणाम यह हुआ कि कई जवानों को अपना सर्वोच्च बलिदान देना पड़ा। बाद में इस पर गंभीर सवाल उठे, किंतु तब तक बहुत देर हो चुकी थी। हमने एक देश भारत के रूप में जो नहीं खोना चाहिए था, वह हम अपने सैनिकों एवं जनमानस के रूप में खो चुके थे।

यह कोई अकेला उदाहरण नहीं है। कारगिल युद्ध हो, कश्मीर में चल रहे ऑपरेशन हों या अन्य संवेदनशील सुरक्षा मुद्दे ही क्‍यों न रहे हों, भारतीय मीडिया पर बार-बार आरोप लगते रहे हैं कि उसने तत्काल अभिव्यक्ति के नाम पर दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों की अनदेखी की।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम राष्ट्रहित

यहां मूल प्रश्न यह नहीं है कि मीडिया स्वतंत्र हो या नहीं, निःस्संदेह उसे स्वतंत्र होना चाहिए और वो है भी। प्रश्न यह है कि स्वतंत्रता की सीमा क्या होनी चाहिए? क्या अभिव्यक्ति का अधिकार देशहित से ऊपर हो सकता है? अमेरिकी उदाहरण स्पष्ट करता है कि उत्तर ‘नहीं’ है। वहां मीडिया ने यह नहीं कहा कि “जनता को जानने का अधिकार है” बल्कि यह माना कि यदि इस जानकारी से अमेरिकी सैनिकों की जान को खतरा है तो उसे रोका जाना चाहिए।

भारतीय संदर्भ में अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि मीडिया का काम केवल सूचना देना है, परिणामों की जिम्मेदारी उसकी नहीं। लेकिन यह सोच आज के संदर्भ में गैर-जिम्मेदाराना है और बहुत खतरनाक भी है। किसी को नहीं भूलना चाहिए कि मीडिया समाज का आईना ही नहीं, दिशा-निर्देशक भी होता है। उसके पास शब्दों और चित्रों की ताकत होती है जोकि किसी भी युद्ध को जितवा सकती है और हार भी दिला सकती है।

हमारे लिए अमेरिका से मिलने वाला सबक

अमेरिका की इस घटना से भारतीय मीडिया के लिए सबसे बड़ा सबक यह है कि आपसी वैचारिक मतभेद, राजनीतिक झुकाव और टीआरपी की प्रतिस्पर्धा से ऊपर उठकर राष्ट्रहित को प्राथमिकता दी जाए। यदि अमेरिकी मीडिया जो ट्रंप का कटु आलोचक रहा है और है, वह देश के हित में एक स्वर में खड़ा हो सकता है तब क्या भारतीय मीडिया ऐसा नहीं कर सकता?

अत: यह समय है जब भारतीय मीडिया को आत्मावलोकन करना चाहिए। उसे तय करना चाहिए कि वह सनसनी फैलाने वाला मंच बना रहना चाहता है या राष्ट्र निर्माण में जिम्मेदार साझेदार। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र की आवाज है और जिम्‍मेदारी भी, किंतु जब वही अभिव्यक्ति देश को नुकसान पहुंचाने लगे तो उस पर आत्मसंयम आवश्यक हो जाता है।

वेनेजुएला प्रकरण केवल अंतरराष्ट्रीय सैन्य कार्रवाई से अधिक हमारे लिए यह मीडिया के चरित्र की भी परीक्षा रही है। अमेरिका में इस परीक्षा में मीडिया ने राष्ट्रहित को प्राथमिकता दी। भारत के लिए यह एक स्पष्ट संदेश है कि देशहित के सामने कोई भी अभिव्यक्ति सर्वोपरि नहीं हो सकती। यदि हम सचमुच एक मजबूत, सुरक्षित और आत्मनिर्भर राष्ट्र बने रहना चाहते हैं, तो मीडिया को भी अपनी भूमिका नए सिरे से परिभाषित करनी होगी। सीखने के लिए इस तरह के अनेक उदाहरण आज हमारे सामने है, सवाल सिर्फ इतना है कि क्या हम सीखना चाहते हैं?

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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी