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- विकास सक्सेना
मतदाता सूचियों के शुद्धिकरण के लिए देश के 12 राज्यों में चलाए जा रहे विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान का प्रथम चरण पूर्ण हो गया है। मसौदा सूची जारी होने के बाद 20 प्रतिशत तक मतदाताओं के वोट कटने की संभावना से राजनैतिक दलों के नेताओं और उनके समर्थकों की नींद उड़ी हुई है। सभी राज्यों में पार्टी के बड़े नेता लगातार अपने बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं को इसके लिए चेता रहे हैं और पार्टी समर्थकों के वोट न कटने देने के लिए प्रयास करने को कह रहे हैं। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने तो बीते दिनों जनप्रतिनिधियों और संगठन के पदाधिकारियों की बैठक बुलाकर चेतावनी दी थी कि जिन मतदाताओं के नाम कट रहे हैं उनमें 90 प्रतिशत भाजपा के समर्थक हैं। इतना ही नहीं एसआईआर को लेकर पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और गुजराज आदि राज्यों में भी भारी हलचल है। मतदाता सूचियों के शुद्धिकरण का राजनैतिक दलों पर क्या प्रभाव पड़ने वाला है इसका आकलन करने से पहले इस अभियान के तहत हटाए जाने वाले मतदाताओं का विश्लेषण आवश्यक है।
गहन पुनरीक्षण अभियान के दौरान बड़ी संख्या में अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत और दोहरे (डुप्लीकेट) मतदाताओं के वोट काटे जा रहे हैं। अनुपस्थित की श्रेणी में उन मतदाताओं को रखा गया है जो गहन पुनरीक्षण के दौरान बूथ लेबल अधिकारी (बीएलओ) को मिले ही नहीं। इनमें स्थानांतरित और दोहरे मतदाता भी शामिल हो सकते हैं। स्थानांतरित मतदाताओं में उनको शामिल किया गया है जो अपना निवास स्थान छोड़ कर कहीं और चले गए हैं। जिन मतदाताओं की मृत्यु हो चुकी है उनका नाम भी मसौदा सूची से हटा दिया गया है इसके अलावा जिन मतदाताओं के एक से अधिक स्थान पर वोट थे उनके नाम भी इस सूची से हटाए जा चुके हैं। इसके बाद एक बड़ी संख्या उन मतदाताओं की है जिनके नाम साल 2025 की मतदाता सूची में तो दर्ज है लेकिन गहन मतदाता सूची में उनका नाम नहीं है और न ही उनके माता, पिता, दादी या दादा का नाम उसमें मिला है। ऐसे मतदाताओं के लिए नोटिस जारी किए जा रहे हैं। उन्हें अन्तिम मतदाता सूची में अपना नाम जुड़वाने के लिए चुनाव आयोग द्वारा तय किए गए 12 दस्तावेजों में से कोई एक दस्तावेज प्रस्तुत करना होगा। लेकिन सबसे बड़ी चिंता की बात पश्चिम बंगाल में मिले लगभग एक करोड़ 36 लाख तार्किक विसंगतियों वाले संदिग्ध मतदाताओं को लेकर है। इन मतदाताओं द्वारा भरे गए गणना प्रपत्रों में जिस प्रकार की विसंगतियां मिली हैं उन पर सहज रूप से विश्वास करना मुश्किल है। अनेक मतदाताओं की आयु और उनके माता-पिता की आयु में दस वर्ष या दादा-दादी की आयु से 40 वर्ष से कम का अन्तर है। चुनाव आयोग की तरफ से इस प्रकार के मतदाताओं की विशेष जांच की तैयारी की जा रही है।
मतदाता सूचियों के प्रगाढ़ पुनरीक्षण के प्रथम चरण पूरा होने के बाद उत्तर प्रदेश में दो करोड़ 89 लाख मतदाताओं के नाम अन्तिम मतदाता सूची से हटाए जा सकते हैं। इस आंकड़े के सामने आने के बाद विपक्षी दल समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ही नहीं बल्कि सत्ताधारी भाजपा के नेताओं के चेहरे पर भी चिंता की लकीरें साफ नजर आ रही हैं। सपा मुखिया अखिलेश यादव दावा कर रहे हैं कि आगामी चुनाव में भाजपा की सीटें इकाई के अंकों में सिमट कर रह जाएंगी तो भाजपा के नेता सपा नेताओं पर आरोप लगा रहे हैं कि अवैध मतदाताओं के वोट कटने से वे बौखलाए हुए हैं। इसी तरह पश्चिम बंगाल में भी 58.20 लाख मतदाताओं के नाम कटने के अलावा एक करोड़ 67 लाख मतदाताओं का नाम अन्तिम सूची में शामिल करने से पहले गहन परीक्षण किया जा रहा है जिसने ममता दीदी के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता दीदी तो इस प्रक्रिया को रुकवाने के लिए उच्चतम न्यायालय तक पहुंच गई हैं लेकिन उन्हें किसी भी प्रकार की राहत मिलने की उम्मीद कम ही है।
बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम कटने के बाद सबसे ज्यादा हलचल पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश में ही दिखाई दे रही है। राजनैतिक दलों के नेताओं के अलावा बुद्धिजीवियों का एक बड़ा वर्ग भी इस पर दिमागी कसरत करता दिख रहा है कि हर विधानसभा क्षेत्र से औसतन 50 हजार वोट कटने का चुनावी नतीजों पर क्या असर होगा? जबकि अधिकांश सीटों पर जीत हार का अंतर 20 हजार से कम रहता है। पिछले विधानसभा चुनावों में तो 49सीटों पर जीत हार का अंतर पांच हजार से भी कम था।
उत्तर प्रदेश के आंकड़ों पर नजर डालें तो साफ है कि सबसे ज्यादा मतदाता शहरी क्षेत्रों से कटे हैं। चूंकि शहरी क्षेत्र में भाजपा को अधिक प्रभावशाली माना जाता है इसलिए अनुमान लगाया जा रहा है कि इसका नुकसान भाजपा को हो सकता है लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है, शहरी क्षेत्र से जिन मतदाताओं के वोट कटे हैं उनमें से अधिकांश के गांव में वोट थे जो पंचायत चुनाव में तो गांव जाकर वोट देते थे लेकिन लोकसभा और विधानसभा चुनावों में शहरों में ही मतदान करते थे। ऐसे में अगर ये मतदाता अब लोकसभा और विधानसभा चुनावों में भी गांव जाकर अपने मताधिकार का प्रयोग करते हैं तो वे ग्रामीण सीटों पर इसका लाभ भाजपा को मिल सकता है। जिन अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत और दोहरे मतदाताओं के नामों को हटाया गया है उनका लाभ सिर्फ उन राजनैतिक दलों को मिलता था जो फर्जी मतदान करा पाते थे। इन नामों के कटने का नुकसान चुनावी हिंसा के लिए कुख्यात राज्यों में तो सत्ताधारी दल को हो सकता है लेकिन उप्र में इसका कोई खास प्रभाव पड़ने की उम्मीद नहीं है। हालांकि इससे मतदान प्रतिशत के आंकड़े बेहतर दिखेंगे जिसका लाभ देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को होगा।
गैर भाजपा विपक्षी को सबसे ज्यादा चिंता पिछले विशेष पुनरीक्षण अभियान 2003 से मेल न होने के कारण हटाए गए मतदाताओं को लेकर है।
उत्तर प्रदेश में ऐसे मतदाताओं की संख्या एक करोड़ चार लाख है और पश्चिम बंगाल में ये आंकड़ा 31 लाख है। मतदाता सूचियों का विशेष पुनरीक्षण अभियान प्रारम्भ होने के बाद देश के अलग-अलग राज्यों में रह रहे अवैध घुसपैठियों हड़कम्प मच गया। संभावित कार्रवाई के डर से इन अवैध घुसपैठियों की रातों रात पूरी-पूरी बस्तियां उजड़ गईं। अपने देश वापस लौटने के लिए बांग्लादेश सीमा पर अवैध घुसपैठियों की भीड़ को खबरिया टीवी चैनलों पर खूब दिखाया गया। अवैध तरीके से दशकों से भारत में रह रहे ये लोग बताते दिखाई दिए कि किस तरह उनको यहां का मतदाता भी बना दिया गया और उन्होंने चुनावों के दौरान वोट भी डाले। पश्चिम बंगाल के एक करोड़ 36 लाख तार्किक विसंगति वाले मतदाताओं को भी इसी श्रेणी में रखा जा सकता है। इन मतदाताओं के बारे में माना जाता है कि ये गैर भाजपा दलों के प्रतिबद्ध मतदाता थे। इनके वोट कटने से विपक्षी दल सबसे ज्यादा बौखलाए हुए हैं, इसीलिए मतदाता सूचियों के शुद्धिकरण के इस अभियान को इनके नेता एसआईआर की आड़ में एनआरसी (राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर) बता रहे हैं। मतदाता सूचियों की विसंगतियों को आधार बनाकर चुनाव आयोग पर वोट चोरी के गंभीर आरोप लगाने वाले कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और दूसरे विपक्षी नेताओं को मतदाता सूचियों के शुद्धिकरण की कवायद रास नहीं आ रही क्यों इससे उनका राजनैतिक गणित बिगड़ सकता है।
(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश