यमुना बची तो दिल्ली भी बच जाएगी
मनोज कुमार मिश्र विकास के नाम देश की राजधानी के विनाश के एक प्रयास पर उच्चतम न्यायालय ने अपने ही फैसले को पलटकर रोक लगा दी। इस फैसले से अब दिल्ली को कुछ हरा-भरा रखने में अपनी भूमिका निभाने वाली अरावली पर्वतमाला के खनन पर पूरी तरह से रोक लगी रहेगी
मनोज कुमार मिश्र


मनोज कुमार मिश्र

विकास के नाम देश की राजधानी के विनाश के एक प्रयास पर उच्चतम न्यायालय ने अपने ही फैसले को पलटकर रोक लगा दी। इस फैसले से अब दिल्ली को कुछ हरा-भरा रखने में अपनी भूमिका निभाने वाली अरावली पर्वतमाला के खनन पर पूरी तरह से रोक लगी रहेगी। दिल्ली के पास अपना कुछ भी नहीं है। पहाड़ों पर ठंडी बढ़ती है तो दिल्ली ठिठुरने लगती है और राजस्थान के रेगिस्तान तपते हैं तो दिल्ली तपती है। दिल्ली और एनसीआर (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र) की आबादी भी अपनी नहीं है। देश भर से लोग रोजगार और कारोबार आदि के लिए दिल्ली आकर बसते रहे हैं। दिल्ली को प्रकृति ने तीन अनमोल तोहफे दिए, जिससे दिल्ली बार-बार राजधानी बनती रही। उसमें यमुना नदी और दिल्ली के असंख्य तालाब, नहर और बावड़ी इत्यादि को तो विकास के विनाशकारी मॉडल ने बर्बाद कर दिया।

अगर भविष्य में भी अरावली पर्वतमाला न बच पाई को दिल्ली में प्रदूषण और जल संकट ही नहीं दिल्ली को उजड़ने से कोई रोक नहीं पाएगा। मौजूदा केन्द्र और दिल्ली की सरकार यमुना बचाने का संकल्प दुहराती रही है। इस दिशा में प्रयास तो दिख रहे हैं, सभी को नतीजों का इंतजार है। प्रसिद्ध पर्यावरणविद अनुपम मिश्र ने अपनी चर्चित पुस्तक-आज भी खरे हैं तालाब, के संदर्भ ग्रंथों के हवाले से बताया है कि दिल्ली के 1930 के दुर्लभ नक्शे में उस समय तालाब और कुओं की गिनती करीब 350 की संख्या छूती थी। उससे भी पहले यह संख्या हजार में थी। आज दिल्ली में गिनती के तालाब बचे हैं। दिल्ली में राज करने वाली सरकारें पुराने तालाबों, झीलों, बावड़ियों और नहरों इत्यादि को पुनर्जीवित करने का दिखावा सा करती है। यह इसलिए भी आसान नहीं लगता क्योंकि ज्यादातर तालाब, झील आदि पर अवैध कालोनियां बस चुकी हैं।

यह सार्वजनिक तथ्य है कि दिल्ली महानगर अपनी जरूरत का केवल 15 फीसदी पानी अपने श्रोत से नहीं जुटा पाता। पानी के लिए पूरी तरह से गंगा और यमुना नदी पर दिल्ली निर्भर है। दिल्ली में 1993 में विधानसभा बनने के बाद बनी पहली भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री मदन लाल खुराना ने अनशन करके यमुना के पानी में राज्यों की तरह हिस्सा लिया था। गंगा नदी से तय पानी आ ही रहा है। यमुना जल समझौता होने के समय दिल्ली में पानी की मांग छह सौ एमजीडी (मिलियन गैलन रोजाना) थी। आज यह मांग करीब 1300 एमजीडी है। पानी की उपलब्धता करीब 800 एमजीडी है। यह भी तब जब काफी इलाकों में पानी की लाइन नहीं है और लोग टैंकरो से बड़ी कठिनाई से पानी ले पाते हैं। यमुना साफ करके दिल्ली का अपना जलाशय बनाना तो सपना है। यमुना को साफ करने के शुरुआती प्रयास में बड़े नालों को साफ करना और इंटरसेप्टर प्लान से जोड़ने का प्रयास हुआ। अब दिल्ली में खेती की जमीन केवल बाहरी दिल्ली यानी हरियाणा के सीमा से लगे गांवों में है। उन इलाकों में भी तेजी से अतिक्रमण हो रहा है। कांग्रेस सरकार में 56 किलोमीटर नजफगढ़ नाले को ढांसा से ककरौला तक तीस किलोमीटर ज्यादा गहरा करके उसमें बरसाती पानी इकट्ठा करने का प्रयास किया गया। यह नाला ढांसा से शुरू होकर वजीराबाद में यमुना में गिरता है।

शुरुआती प्रयास से ढांसा के आसपास के आठ किलोमीटर इलाके में धान की फसल अच्छी हुई। इससे जुड़ने वाली तीन नहरें- पालम, मूंगेशपुर और छुटानी-भूपानी में पानी छोड़ने से 60 से70 गांवों को पानी दिया दया। अगर इसकी 10 फीट गहरी खुदाई हो जाए तो पूरे नजफगढ़ इलाके के सारे गांवों को पानी मिलने लगेगा। दिल्ली में सिंचाई के लिए शेरशाह सूरी ने अपने समय में पश्चिमी यमुना नहर बनवाई थी। उसी ने कृषि में राजस्व प्रणाली की शुरुआत की। उस नहर से दो उप नहर निकाली गई, जिनसे उत्तर पश्चिम दिल्ली में अलीपुर और कंझावला विकास खंड के 125 गांवों में सिंचाई होती थी। राजधानी का शहरीकरण होने के बाद सिंचाई का रकबा घटता गया। अब अलीपुर और कंझावला में ही करीब बीस गांवों में खेती होती है।

दिल्ली 1911 में देश की राजधानी बनी। तब दिल्ली में 365 गांव थे। ढाका धीरपुर में जार्ज पंचम का दरबार लगा। वहीं दिल्ली को राजधानी बनाने की घोषणा हुई। 1912 में पुराना सचिवालय बना तो चंद्रावल गांव खत्म हो गया। सरकारी कर्मचारियों के लिए तीमारपुर गांव की जमीन पर कालोनी बनी। 1947 में देश का बंटवारा हुआ और शाहजहानाबाद (दिल्ली का पुराना नाम जो चारदीवारी से घिरा हुआ था) ने देहात को निगलना शुरू किया। सरकार ने तो एक योजना बनाकर लोगों को बसाया लेकिन उससे ज्यादा को भू-माफिया और पुलिस- प्रशासन की मिलीभगत से अवैध कालोनियां बसी। वोट की राजनीति में ऐसे लोगों को विभिन्न राजनीतिक दल के नेताओं का संरक्षण मिलता रहा। इन अवैध निर्माण से उन्हें वोट और नोट दोनों ही मिलते रहे हैं। कई भू -माफिया तो सरकारी जमीन कौन कहे ऐतिहासिक धरोहरों पर कब्जा करके उसपर कालोनी बसा दी। कई माफिया को पैसे के बल पर विभिन्न दलों से टिकट पाकर लोकसभा और विधानसभा में पहुंच गए। अब कहने भर के 200 गांव बचे हैं, लेकिन तालाब गायब हो गए। 1993 में ग्राम पंचायतों के आखिरी चुनाव के समय 199 पंचायतें थी। अस्सी के दशक तक दिल्ली में छह हजार निजी और 250 सरकारी ट्यूबवैल थे। नजफगढ़ और महरौली इलाके में रहट ( कुओं से ऊंट, बैल आदि के माध्यम से पानी निकालना), चरस (आदमी खींचते थे।) और कच्चे कुएं से भी सिंचाई की जाती थी।

दिल्ली को भौगोलिक हिसाब से तीन क्षेत्रों में बांटा जाता है। मेहरौली यानी दक्षिणी दिल्ली में पहाड़ी इलाकों को पहाड़, नजफगढ़ यानी पश्चिमी दिल्ली को डाबर और यमुना दी तलहटी यानी उत्तर पश्चिम दिल्ली को बांगड़। नजफगढ़ इलाके का आकार झील जैसा था इसलिए इसके मूल स्वरूप को बचाने के लिए नजफगढ़ नाला बनाया गया। उसके साथ हरियाणा से लगे गांवों में सिंचाई के लिए छुटानी -भूपानी नाला, बवाना इलाके के लिए मूंगेशपुर नाला और पालम इलाके के लिए पालम नाला बनाया गया। इसमें बस्ती का गंदा पानी नहीं जाता था केवल बाढ़ का पानी जाता था। बाद में सारी व्यवस्था अतिक्रमण के सिरे चढ़ती गई।

दिल्ली में कांग्रेस की सरकार में विकास मंत्री रहे डॉक्टर योगानंद शास्त्री ने तब 70 बड़े तालाबों के स्थान को चिह्नित करके उसे विकसित करने का प्रयास किया था। तभी भलस्वा झील और संजय झील से अतिक्रमण हटाने के प्रयास हुए। उसके बाद भी बरसाती पानी बेकार न चला जाए इसके लिए प्रयास तो किए गए लेकिन न तो अतिक्रमण हटाए गए और न ही नए स्थानों पर होने वाले अतिक्रमण को रोका गया। परिणाम यही हुआ कि दिल्ली के पानी के स्रोत समाप्त होते गए। आबादी बढ़ने से पानी की जरूरत बढ़ती गई और दिल्ली अपने संसाधन से प्रयाप्त पानी नहीं जुटा पाती है। इसलिए दिल्ली पानी के लिए भी पड़ोसी राज्यों पर पूरी तरह से निर्भर हो गई है। सभी को पता है कि पानी का संकट उन राज्यों में भी उतना ही है जिनसे दिल्ली को पानी मिल रहा है। भले ही यह इतिहास में दर्ज हो गया लेकिन यह तो सत्य है कि चांदनी चौक की मुख्य सड़क मुगल काल में नहर थी और उसके एक सिरे पर बने लाल किला की दीवार से लग कर यमुना नदी बहती थी। यमुना नदी बची तो दिल्ली पानी और पर्यावरण दोनों मामलों में काफी बच जाएगी लेकिन अगर युद्धस्तर से दिल्ली अपना जल स्रोत नहीं विकसित कर पाई तो उसका संकट बढ़ता ही जाएगा। उच्चतम न्यायालय ने एक संकट से फिलहाल दिल्ली को उबारा लेकिन पानी के मोर्चे पर सरकारों की कठिन परीक्षा होनी है। उन्हें अपनी प्राथमिकता और विकास की परिभाषा तय करनी होगी।

(लेखक, वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / मुकुंद