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जम्मू, 30 अगस्त (हि.स.)। भाद्रपद माह शुक्लपक्ष की अष्टमी तिथि को श्रीराधाष्टमी का पर्व मनाया जाता है। इस अवसर पर श्री कैलख ज्योतिष एवं वैदिक संस्थान ट्रस्ट (पंजी.) रायपुर (ठठर), जम्मू–कश्मीर के अध्यक्ष, ज्योतिषाचार्य महंत रोहित शास्त्री ने जानकारी देते हुए बताया कि धर्मग्रंथों के अनुसार श्रीराधाष्टमी व्रत एवं पूजन भाद्रपद शुक्ल अष्टमी तिथि के मध्याह्न काल में करने का विधान है।
इस वर्ष 2025 में भाद्रपद शुक्ल अष्टमी तिथि का प्रारम्भ शनिवार, 30 अगस्त की रात 10 बजकर 47 मिनट पर होगा और इसका समापन रविवार, 31 अगस्त की रात 12 बजकर 58 मिनट पर होगा। चूँकि अष्टमी तिथि का सूर्योदय एवं मध्याह्न व्यापिनी रविवार, 31 अगस्त को ही है, अतः शास्त्रसम्मत विधान के अनुसार श्रीराधाष्टमी व्रत एवं पूजन इसी दिन सम्पन्न किया जाएगा। रविवार, 31 अगस्त को प्रातः 11 बजकर 50 मिनट से लेकर दोपहर 01 बजकर 20 मिनट तक रहेगा।
श्री राधा जी द्वापर युग में प्रकट हुईं। उनका प्राकट्य मथुरा के समीप रावल ग्राम में वृषभानु जी की यज्ञस्थली के पास हुआ था। राजा वृषभानु एवं उनकी धर्मपत्नी कीर्ति जी ने इस कन्या को अपनी पुत्री मानकर पालन–पोषण किया। इस दिन श्री राधा रानी, भगवान श्रीकृष्ण एवं भगवान विष्णु की पूजा–अर्चना करनी चाहिए। शास्त्रों में वर्णित है कि श्रीराधाष्टमी व्रत करने से अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है, घर में सुख–समृद्धि, शांति एवं संतान–सुख मिलता है तथा सदा लक्ष्मी का वास रहता है। धार्मिक मान्यता यह भी है कि जो श्रद्धालु श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का व्रत रखते हैं, उन्हें राधाष्टमी का व्रत भी अवश्य करना चाहिए। ऐसा करने से जन्माष्टमी व्रत का भी संपूर्ण फल प्राप्त होता है।
हिन्दुस्थान समाचार / राहुल शर्मा