सुदर्शन का हिंदी स्वप्न: ज्ञान की भाषा को व्यवस्था की चुनौती
- डॉ. मयंक चतुर्वेदी
भारतीय चेतना को उसकी भाषाओं से अलग करके नहीं समझा जा सकता। जिस देश ने हजारों वर्षों से अपनी ज्ञान परंपरा संस्कृत, प्राकृत, पालि और देशज भाषाओं में विकसित की, वहां आधुनिक भारत में ज्ञान-विज्ञान, चिकित्सा, तकनीक और उच्च शिक्षा क
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