हाशिए पर वन्देमातरम्, धिक्कार है ऐसी लाचारी, पहले केरलम् और अब कर्नाटक!
डॉ. मयंक चतुर्वेदी
क्या कोई संप्रभु राष्ट्र अपनी ही राष्ट्रीय चेतना के सबसे प्रखर उद्घोष को राजनीतिक सौदेबाजी, सरकारी निर्णयों और वोटबैंक की संकीर्ण गणनाओं के बीच दम तोड़ने के लिए छोड़ सकता है? यह प्रश्न आज इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि वन्देमातरम्
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