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परिचय दास
गोस्वामी तुलसीदास की निम्न चार पंक्तियां पहली दृष्टि में एक धार्मिक विस्मय-वर्णन जैसी लगती हैं लेकिन गंभीर दार्शनिक दृष्टि से पढ़ने पर इनमें शरीर, चेतना, भाषा, अनुभव और परम सत्ता के संबंध पर अत्यंत सूक्ष्म चिंतन दिखाई देता है। इनका महत्व केवल इतना नहीं है कि ईश्वर चमत्कार कर सकता है। असली प्रश्न यह है कि क्या चेतना अपने भौतिक उपकरणों से स्वतंत्र हो सकती है? तुलसी इसी प्रश्न को काव्यात्मक विरोधाभासों के माध्यम से उठाते हैं।
बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना।
कर बिनु करम करइ बिधि नाना॥
आनन रहित सकल रस भोगी।
बिनु बानी बकता बड़ जोगी॥
यह कविता एक प्रकार की सत्ता-मीमांसीय प्रतिपत्ति बन जाती है। तुलसी मनुष्य के अनुभव की सामान्य संरचना को उलट देते हैं। मनुष्य चलता है क्योंकि उसके पैर हैं, सुनता है क्योंकि उसके कान हैं, कर्म करता है क्योंकि उसके हाथ हैं, रस का अनुभव करता है क्योंकि उसके पास मुख और इंद्रियां हैं और बोलता है क्योंकि उसके पास वाणी का शारीरिक तंत्र है। तुलसी कहते हैं कि परम सत्ता के संदर्भ में इन सभी कारण-संबंधों को स्थगित कर दो।
यहीं से इन पंक्तियों का दार्शनिक तनाव पैदा होता है।
“बिनु पद चलइ” केवल यह नहीं कहता कि ईश्वर बिना पैरों के चल सकता है। इसका गहरा अर्थ यह है कि गति के लिए भौतिक अंग अनिवार्य नहीं हैं। मनुष्य की गति स्थान से बंधी है। हम एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाते हैं। इसलिए हमारे लिए गति शरीर और स्थान दोनों की शर्तों के अधीन है। लेकिन परम सत्ता यदि सर्वव्यापी है, तो उसके लिए “एक स्थान से दूसरे स्थान जाना” मनुष्य की तरह अर्थपूर्ण नहीं रह जाता। जो सत्ता पहले से सर्वत्र उपस्थित है, उसके लिए गति किसी भौतिक विस्थापन का नाम नहीं हो सकती।
यहां तुलसी की कल्पना उस प्रश्न के निकट पहुंचती है जिसमें स्थान और सत्ता का संबंध विचाराधीन रहा है। अरस्तू से लेकर आधुनिक दर्शन तक यह प्रश्न रहा है कि किसी वस्तु का अस्तित्व क्या अनिवार्यतः उसके स्थान और भौतिक विस्तार से निर्धारित होता है। तुलसी का उत्तर लगभग नकारात्मक है। परम सत्ता का अस्तित्व स्थानगत नहीं, अस्तित्वगत है।
इसलिए “बिनु पद चलइ” का अर्थ चमत्कार से अधिक गहरा है। यह कहता है कि जिसे हम गति कहते हैं, वह परम सत्ता की अंतिम परिभाषा नहीं हो सकती।
फिर आता है:
“सुनइ बिनु काना।”
यहां तुलसी इंद्रिय और ज्ञान के संबंध को चुनौती देते हैं। मनुष्य सुनता है क्योंकि ध्वनि कान तक पहुंचती है और कान से तंत्रिका-तंत्र के माध्यम से चेतना तक जाती है। आधुनिक विज्ञान इस प्रक्रिया को भौतिक कारण- शृंखला के रूप में समझाता है। लेकिन तुलसी उस पूरी संरचना को परम सत्ता पर लागू करने से इनकार करते हैं।
ईश्वर का “सुनना” किसी ध्वनि-तरंग को ग्रहण करना नहीं है। वह सर्वज्ञता का काव्यात्मक रूपक है।
यहां एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है: क्या ज्ञान अनिवार्यतः इंद्रिय-बोध पर निर्भर करता है? अनुभववादी दर्शन, विशेषकर लॉक और ह्यूम की परंपरा, ज्ञान की उत्पत्ति में इंद्रिय-अनुभव को अत्यंत महत्त्व देती है। दूसरी ओर डेसकार्त जैसे तर्कवादी दार्शनिक ज्ञान के ऐसे आयामों की तलाश करते हैं जिन्हें केवल इंद्रिय-अनुभव से नहीं समझाया जा सकता।
तुलसी का परमात्मा इन दोनों सीमाओं के बाहर है। वह इंद्रिय-निर्भर चेतना नहीं है। वह ऐसी चेतना है जिसके लिए जानना किसी इंद्रिय-माध्यम का परिणाम नहीं।
दूसरी पंक्ति और भी रोचक है:
“कर बिनु करम करइ बिधि नाना।”
यहां प्रश्न केवल कर्म का नहीं, कर्तृत्व का है। मनुष्य किसी काम को करने के लिए शरीर का उपयोग करता है। हाथ उसके कर्म का उपकरण है। तुलसी कहते हैं, परम सत्ता “कर” के बिना भी “करम” करती है।
दार्शनिक भाषा में कहें तो यहां कर्तृत्व को देह से अलग किया जा रहा है।
यह आधुनिक दर्शन के लिए अत्यंत गंभीर समस्या है, क्योंकि आधुनिक पश्चिमी विचार में “मैं” और “मेरी देह” का संबंध बहुत जटिल रहा है। डेसकार्त ने मन और शरीर के बीच प्रसिद्ध द्वैत स्थापित किया। बाद में स्पिनोजा, कांट, हेगेल, हुसर्ल, हाइडेगर और मर्लो-पोंती आदि ने अलग-अलग तरीकों से इस समस्या को पुनर्विचारित किया।
तुलसी का दृष्टिकोण डेसकार्तीय द्वैत से पूरी तरह समान नहीं है, लेकिन एक दिलचस्प समानता दिखाई देती है: मानवीय चेतना को केवल भौतिक अंगों में सीमित नहीं किया जा सकता।
लेकिन तुलसी यहां रुकते नहीं। वे कहते हैं:
“बिधि नाना”, अर्थात् वह अनेक प्रकार के कर्म करता है।
इसका अर्थ यह भी है कि परम सत्ता केवल निष्क्रिय, निर्विकार उपस्थिति नहीं है। वह सर्जनात्मक कर्तृत्व है। संसार में जो कुछ घटित होता है, उसकी अंतिम सत्ता-मीमांसीय पृष्ठभूमि वही है।
यहां स्वयंकृत कारण, प्रथम कारण और सत्ता के आधार का विमर्श याद आता है। विशेषकर मध्ययुगीन दर्शन में ईश्वर को उस अंतिम कारण के रूप में देखा गया जिसके लिए स्वयं किसी बाहरी कारण की आवश्यकता नहीं होती। तुलसी का ईश्वर भी ऐसा ही है, लेकिन भारतीय दार्शनिक संदर्भ में उसकी प्रकृति और भी अधिक व्यापक है। वह केवल प्रथम कारण नहीं, संपूर्ण अस्तित्व का आधार है।
तीसरी पंक्ति:
“आनन रहित सकल रस भोगी।”
शायद इन चारों में सबसे अधिक सौंदर्यात्मक और दार्शनिक पंक्ति यही है।
“आनन” अर्थात् मुख। मनुष्य स्वाद का अनुभव मुख और जिह्वा के माध्यम से करता है। लेकिन तुलसी कहते हैं कि परम सत्ता “आनन रहित” होकर भी “सकल रस भोगी” है।
यहां “रस” को केवल स्वाद मानना इस पंक्ति को बहुत छोटा कर देना होगा। भारतीय काव्यशास्त्र में रस की अवधारणा अत्यंत व्यापक है। आनंद, अनुभूति, सौंदर्य, प्रेम, करुणा, वीरता, शांति, विस्मय, भक्ति, सभी को व्यापक अर्थ में रसात्मक अनुभव के रूप में देखा जा सकता है। इसलिए “सकल रस भोगी” का अर्थ हो सकता है कि परम सत्ता समस्त अनुभवात्मक संभावनाओं की अंतिम आधारभूमि है।
यहीं तुलसी की कविता पश्चिमी सौंदर्य-दर्शन के एक बड़े प्रश्न के निकट आती है: अनुभव संभव कैसे होता है?
मनुष्य सुंदरता का अनुभव करता है, संगीत सुनता है, प्रेम करता है, करुणा महसूस करता है, भय और आनंद का अनुभव करता है। लेकिन इन अनुभवों के पीछे चेतना की जो मूल क्षमता है, उसका अंतिम आधार क्या है?
तुलसी का उत्तर है: वह परम चेतना स्वयं किसी एक अनुभव की वस्तु नहीं है; वह सभी अनुभवों की संभावना का आधार है।
इसलिए “रस भोगी” को ईश्वर के लिए किसी मनुष्य की तरह भोजन करने या स्वाद लेने की कल्पना समझना दार्शनिक रूप से बहुत सीमित व्याख्या होगी। यहाँ “भोग” का अर्थ अनुभव और “रस” का अर्थ समस्त अनुभवात्मक मूल्य तक फैल जाता है।
चौथी पंक्ति अचानक इस पूरे चिंतन को भाषा के क्षेत्र में ले आती है:
“बिनु बानी बकता बड़ जोगी।”
यहां तुलसी एक अत्यंत गहरी समस्या उठाते हैं: क्या बोलने के लिए भाषा आवश्यक है?
मानव वक्ता के लिए उत्तर स्पष्ट है। उसे शब्द चाहिए, ध्वनि चाहिए, मुख चाहिए। लेकिन परम सत्ता का “वक्तृत्व” भाषिक उच्चारण पर निर्भर नहीं।
इसका अर्थ यह नहीं कि ईश्वर कोई अदृश्य व्यक्ति है जो बिना मुंह के हमारे कान में भाषण देता है। इसका अर्थ कहीं अधिक सूक्ष्म है।
सृष्टि स्वयं उसकी वाणी है।
प्रकृति उसका कथन है। जीवन उसका संकेत है। नैतिक विवेक उसका संकेत है। अस्तित्व की संरचना स्वयं उसकी “भाषा” है।
यहां भाषा और अर्थ का प्रश्न सामने आता है। आधुनिक दर्शन में भाषा केवल सूचना देने का माध्यम नहीं रही। विट्गेंश्टाइन के बाद भाषा को अर्थ-निर्माण की पूरी संरचना से जोड़कर देखा गया। लेकिन तुलसी इससे भी पहले एक ऐसी स्थिति की कल्पना करते हैं जिसमें अर्थ शब्द से पहले है।
परम सत्ता बोलती नहीं, फिर भी उसका “कथन” सर्वत्र है।
इसीलिए “बड़ जोगी” शब्द विशेष ध्यान देने योग्य है। योगी वह है जो बाहरी साधनों पर निर्भरता से ऊपर उठकर चेतना को उसके मूल स्वरूप में प्रतिष्ठित करता है। अतः यहां “योगी” केवल तपस्वी नहीं, बल्कि उस सत्ता का संकेत है जो माध्यम और लक्ष्य के बीच की सामान्य दूरी को पार कर चुकी है।
चारों पंक्तियों को एक साथ देखें तो उनकी संरचना अत्यंत सुंदर है:
पैर- गति
कान- श्रवण
हाथ -कर्म
मुख -रस
वाणी -अभिव्यक्ति
तुलसी हर बार पहले अंग को निष्कासित करते हैं और फिर उससे संबंधित क्रिया को बचा लेते हैं।
यही इस अंश की सबसे महत्वपूर्ण काव्य-दार्शनिक तकनीक है।
वे यह नहीं कहते कि ईश्वर के पास असाधारण पैर हैं, असाधारण कान हैं या असाधारण मुख है। वे इससे अधिक क्रांतिकारी बात कहते हैं:
उसे इनकी आवश्यकता ही नहीं।
इसलिए इन पंक्तियों को “चमत्कारों की सूची” समझना तुलसी के दर्शन को बहुत साधारण बना देना होगा। यह वास्तव में देहधारित मानवीय अस्तित्व की सीमा के पार जाने का काव्यात्मक प्रयास है।
मनुष्य के लिए शरीर माध्यम है। परम सत्ता के लिए माध्यम की आवश्यकता नहीं।
लेकिन यहां एक गंभीर दार्शनिक कठिनाई भी पैदा होती है। यदि हम ईश्वर को “चलने वाला”, “सुनने वाला”, “कर्म करने वाला”, “रस भोगने वाला” और “वक्ता” कहते हैं, तो हम उसे मनुष्य की भाषा में ही व्यक्त कर रहे हैं। फिर हम कैसे कह सकते हैं कि वह भाषा और इंद्रियों से परे है?
यही निषेधात्मक दार्शनिक विरोधाभास, अर्थात् निषेध के माध्यम से परम सत्ता को व्यक्त करने की समस्या, है।
हम कहते हैं:
वह चलता है, लेकिन बिना पैरों के।
वह सुनता है, लेकिन बिना कानों के।
वह करता है, लेकिन बिना हाथों के।
वह भोगता है, लेकिन बिना मुख के।
वह बोलता है, लेकिन बिना वाणी के।
अर्थात् तुलसी पहले एक मानवीय क्रिया लेते हैं और फिर उसके भौतिक आधार को नकार देते हैं।
यह नकार के द्वारा संकेत है।
पश्चिमी धर्म-दर्शन में ईश्वर के बारे में ऐसी ही समस्या को निषेध के मार्ग से परम सत्ता की व्याख्या करना कहा गया है। अर्थात् परम सत्ता के बारे में हम यह अधिक आसानी से बता सकते हैं कि वह क्या नहीं है, बजाय इसके कि वह क्या है। तुलसी की इन पंक्तियों में इसी प्रकार का एक भारतीय काव्यात्मक रूप दिखाई देता है।
लेकिन तुलसी केवल निषेध नहीं करते। वे हर निषेध के बाद एक सकारात्मक क्रिया रखते हैं।
यही उनकी शक्ति है।
बिनु पद → चलइ
बिनु काना → सुनइ
कर बिनु → करम
आनन रहित → रस भोगी
बिनु बानी → बकता
अर्थात् शरीर हटता जाता है, चेतना बची रहती है।
यही इन चार पंक्तियों का सबसे गहरा दार्शनिक केंद्र है।
इसे आधुनिक शब्दों में कहें तो तुलसी पूछ रहे हैं:
क्या चेतना अपने उपकरणों में ही सीमित है?
क्या चेतना केवल मस्तिष्क, इंद्रियों और शरीर की गतिविधियों का दूसरा नाम है?
तुलसी का उत्तर स्पष्टतः नहीं है।
उनके लिए शरीर चेतना का अंतिम स्रोत नहीं, बल्कि उसकी अभिव्यक्ति का एक माध्यम है। परम सत्ता की चेतना किसी भौतिक माध्यम में सीमित नहीं है।
इस दृष्टि से यह चार पंक्तियाँ केवल भक्तिपरक काव्य नहीं हैं। वे भारतीय धार्मिक काव्य के भीतर छिपा हुआ एक गंभीर चेतना-दर्शन प्रस्तुत करती हैं।
और शायद इन पंक्तियों का सबसे सुंदर निष्कर्ष यही है कि तुलसी ईश्वर को मनुष्य से बड़ा बनाने के लिए उसके अंगों को बड़ा नहीं करते, बल्कि अंगों की आवश्यकता ही समाप्त कर देते हैं।
मनुष्य की शक्ति साधनों पर निर्भर है।
परम सत्ता की शक्ति स्वतःसिद्ध है।
मनुष्य पहले देखता है, फिर जानता है।
पहले सुनता है, फिर समझता है।
पहले हाथ बढ़ाता है, फिर करता है।
पहले बोलता है, फिर अर्थ प्रकट करता है।
तुलसी का परमात्मा इसके उलट है:
वह जानता है, इसलिए देखने की आवश्यकता नहीं।
वह सर्वश्रुत है, इसलिए सुनने की आवश्यकता नहीं।
वह कर्ता है, इसलिए हाथ की आवश्यकता नहीं।
वह आनंदस्वरूप है, इसलिए मुख की आवश्यकता नहीं।
वह स्वयं अर्थ है, इसलिए वाणी की आवश्यकता नहीं।
यहीं ये चार पंक्तियां धार्मिक विस्मय से उठकर सत्ता और चेतना के दर्शन में प्रवेश करती हैं। और तुलसी की महानता यह है कि इतना कठिन विचार वे किसी दार्शनिक ग्रंथ की गद्यात्मक भाषा में नहीं, बल्कि चार सहज, गेय और स्मरणीय पंक्तियों में रख देते हैं।
(लेखक, रवींद्र श्रीवास्तव 'परिचय दास' नव नालंदा महाविहार विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं।
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हिन्दुस्थान समाचार / मुकुंद