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-डॉ. उमेश चन्द्र शर्मा
सद्गुरु पूजनीय, वंदनीय और पथ प्रदर्शक हैं, वह शिष्य के अज्ञान अंधकार को दूर कर ज्ञान रुपी दीपक जलाने वाला और परमात्म प्राप्ति हेतु साधन का दिग्दर्शन कराने वाला महापुरुष है। वह केवल गुरु ही है, जो अपने शिष्य में पिंड से लेकर ब्रह्मांड तक दर्शन की क्षमता विकसित करता है, गुरु ही अपने शिष्य को कर्म ज्ञान और भक्ति का यथार्थ दर्शन कराता है, जिसके सहारे शिष्य अध्यात्म के उस शिखर पर पहुंच सकता है, जहां जाने के बाद सांसारिक सुख-समृद्धि और वैभव तुच्छ दिखाई देने लगते हैं किंतु वह साध्य नहीं है और न ही ध्येय हो सकता है। ध्येय है, सर्वव्यापी, निर्विकार, निराकार और नियंता, परब्रह्म परमात्मा।
गुरु का महत्व समझाते हुए अक्सर इन पंक्तियों को भी उद्धृत किया जाता है। संत कबीरदास का यह प्रसिद्ध दोहा गुरु की महिमा का बखान करता है-
गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पायँ।
बलिहारी गुरु आपनो, गोविंद दियो बतायँ।।
(गुरु और ईश्वर दोनों एक साथ खड़े हों तो पहले किसे प्रणाम करना चाहिए? ऐसे में गुरु के चरण पहले छूने चाहिए क्योंकि गुरु ने ही हमें ईश्वर तक पहुँचने का सही मार्ग और ज्ञान दिया है।)
यह सद्गुरु की महिमा है किंतु इस उक्ति का अभिप्राय ऐसा नहीं लिया जाना चाहिए कि गुरू ने गोविंद का पथ बतलाया है इसलिए उन्हें ही पकड़ कर बस वहीं ठहर जाना चाहिए बल्कि इसको इस रूप में लिया जाना चाहिए कि हम उस गुरु को पहले वंदन करें जो गोविन्द को बताकर परे हट गए कि देख यह सीधा सरल रास्ता गोविन्द की ओर ही जा रहा है, तू इसे पकड़ ले. तो हम उस गुरु को प्रथम प्रणिपात करें, जिन्होंने गोविन्द को पा लेने का मार्ग बताया ओर अलग हट गए, कि देख गोविन्द तुझे ऐसे मिलेंगे। सद्गुगुरु कहता है कि अब मेरी आवश्यकता रह ही नहीं जाती है। मेरे द्वारा जो पथ बताया गया है, उस पथ पर ही चलते चलते चले जाना है। सद्गुरू कहता है कि अब तू चलता चला जा उस पथ पर, जो मैंने तुझे बताया है। वास्तविकताओं में भी पथ का दिग्दर्शन कराने के बाद पथ प्रदर्शक की भूमिका आखिर क्या रह जाती है? सद्गुरु ने हमें जो रास्ता बता दिया उसके अनुसार हम अपनी यात्रा शुरू कर दें, यही उचित है। किंतु यदि हम चले नहीं और उस पथ प्रदर्शक या गुरु के पास रुके रह जाएं तो क्या हम अपनी मंज़िल पर पहुंच सकेंगे? उत्तर होगा नहीं।
इन पंक्तियों का सार तत्व यही है कि हमें अपने गुरु ने जो रास्ता बताया है, उस पर चलना शुरू कर दें तो परमात्मा रूपी मंजिल मिलेगी। यही है गुरू पूजा और दक्षिणा भी यही है कि उनके बताए मार्ग का अनुसरण करते हुए गुरु आज्ञानुसार परमात्मतत्व कीर्तन, जप, ध्यान ओर स्मरणरत हों। पथ प्रदर्शक सत्गुरु के बताए अनुसार साधन के माध्यम से ही साध्य परमात्मा को पाने की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है। सारभूत तत्व यही है कि उस गुरु का बड़ा आभार जो कि गोविन्द का पथ बताकर रास्ते से परे हट गए।
गुरू मनुष्य की अंधकार से प्रकाश की आध्यात्मिक यात्रा का प्रेरक तत्व है। गुरु एक सीढ़ी है, जिसके सहारे ऊपर जाया जा सकता है, किंतु वह मंजिल नहीं है जहां जाकर सब यात्राएं विराम पा लेती है। गुरु तैरना सिखा देता है ताकि दरिया को पार किया जा सके, किंतु यदि कोई व्यक्ति जरूरत के वक्त भी गुरु के उस ज्ञान को अंगीकार नहीं करे तो वह डूबने से आखिर कैसे बचेगा? वस्तुत: गुरु एक सीढ़ी है, सीढ़ी के सहारे ऊपर तो चढ़ा जा सकता है किन्तु उसे ही थामे रखकर वास्तविक उद्देश्य की प्राप्ति नहीं की जा सकती। आचार्य रजनीश कहते हैं, गुरु एक सीढ़ी या निसेनी है, जिसपर चढ़कर ऊपर पहुंच जाओ और उसे गिरा दो किंतु यदि तुम उस निसेनी को थाम कर ही बैठे रह गए तो जिस उद्देश्य के लिए निसेनी पर चढ़ कर ऊपर पहुंचे हो तो उसे कभी पूरा नहीं कर पाओगे।
यह प्रश्न भी किया जा सकता है कि निसेनी यदि गिरा दोगे तो फिर नीचे कैसे आओगे? कहा जाना चाहिए कि उस अनंत की यात्रा उच्च सोपान की यात्रा है, उस परम पुरुष तक पहुंचने की यात्रा जो कि अध्यात्म का चरम लक्ष्य है, हमारे ऋषियों-महर्षियों ने वैदादिकों में इसका गुणगान किया है और महात्मा पुरूषों ने इसकी बहुभांति विवेचना भी की है।
गुरू एक माध्यम है, जिसके द्वारा गोविन्द का ज्ञान होता है इसलिए गुरु ने गोविन्द की प्राप्ति के लिए जो साधन बताए हैं, हम वह साधन करें तो उस परमात्म तत्व की प्राप्ति की ओर बढ़ा जा सकता है। किंतु यदि हम गुरु द्वारा बताए गए साधन नहीं करें और गुरु के नाम का ही जाप करते रहें तो हमें क्या प्राप्त होगा? इसलिए निसेनी गिरा देने का अर्थ इतना ही है कि गुरू को नहीं पकड़ते हुए गुरू ने जो उपदेश दिया है उस पर अमल कर आत्मसात करें। साथ ही उन्होंने जो कुछ कहा है अथवा उनके द्वारा जो साधन बताया गया है, उसे पूरी श्रद्धा से अंगीकार करें।
शास्त्र कहते हैं कि शिक्षा गुरु तो अनेक हो सकते हैं किंतु दीक्षा गुरु केवल एक होना चाहिए, किंतु प्रश्न पैदा होता है कि वह कैसा हो? हमारे शास्त्रों में उल्लेख किया गया है कि वह अपने शिष्यों के लिए निरपेक्ष भाव से भावित और ब्रह साक्षात्कार का मार्ग प्रशस्त करने वाला हो, न कि गुरु दक्षिणा के नाम पर धन की अपेक्षा रखने वाला हो। आज देखा जाता है कि ज्यादातर महात्मा अपने अनुयायियों को अपने पंथ से जोड़े रखने ओर स्वयं के प्रति पूज्यता के भाव को बनाए रखने के लिए गुरु की महत्ता को अतिशयोक्तिपूर्ण ढंग से बखान करते हुए शिष्यों को बांधे रखते है, ऐसा व्यक्ति संत कहला सकता है किंतु वह सद्गुरु नहीं हो सकता। सद्गुरु तो पथ प्रदर्शक है, शिष्य के अज्ञान अंधकार को दूर कर ज्ञान रुपी दीपक जलाने वाला। ऐसा वह गुरु वंदनीय और प्रथम प्रणाम करने योग्य है, वह ब्रह्म स्वरूप है।
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. उमेश चंद्र शर्मा