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- प्रो. मनीषा शर्मा
सीजेपी आंदोलन खत्म हो गया, शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा भी हो गया लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में मुझे सबसे ज्यादा चिंता हुई इस युवा पीढ़ी की जो वहाँ उपस्थित थी। उनके आचरण, व्यवहार और प्रयोग की जा रही भाषा सबने एक पालक और शिक्षक होने के नाते मुझे झकझोर कर रख दिया। क्या यह पीढ़ी हमारे देश का भविष्य है? उनकी शिक्षा के विषय में क्या ही बात की जाए। कोई आईएएस की तैयारी कर रहा है, कोई मेडिकल की, कई उच्च शिक्षित थे, कई विद्यार्थी प्रसिद्ध और नामी विवि के थे।
मतलब हम इन्हें उच्च शिक्षित कह सकते हैं लेकिन जब सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो, रील, मीम्स देखते हैं तो दिमाग जवाब दे जाता है। क्या यह वाकई शिक्षित है? यदि हां तो हम कैसी शिक्षा व्यवस्था चला रहे जो इस पीढ़ी को यह तक ना सिखा पाई कि एक शिक्षित और सभ्य इंसान की भाषा का स्तर क्या होता है। हमारे यहां कहा जाता है कि जब आप बोलते हो तो सिर्फ आप नहीं बोलते बल्कि आपका पूरा खानदान बोलता है। अर्थात आपके मुंह खोलते ही आपकी परवरिश सामने आ जाती है जो बताती है आपके घर का माहौल कैसा है। लेकिन यह बात सो कूल कहलाने वाली जेनरेशन नहीं जानती। एक पालक और शिक्षक होने के नाते में पूरी जिम्मेदारी से बोल रही हूं कि बच्चों को शिक्षा के साथ संस्कारित करने की बहुत ज्यादा आवश्यकता है।
यह भाषा जो जंतर-मंतर पर बोली जा रही थी गालियों और नारों के रूप में उस व्यक्ति के लिए जो आपके पिता या दादा की उम्र का है, ये किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं है। मैं जो सुन भी नहीं पा रही थी वो 18- 19 साल की लड़कियां बोल रही थी। ये युवा वो है जिनके कंधों पर देश की जिम्मेदारी है। मैं ही क्यों मेरे जैसे अनेक लोग जो आज भी भाषा की मर्यादा और संयम जानते हैं वह भी यही मान रहे हैं।
सीजेपी आंदोलन के दौरान कुछ युवाओं द्वारा किए गए प्रदर्शन में अभद्र भाषा, गाली-गलौज और अराजक व्यवहार की घटनाओं ने पूरी युवा पीढ़ी और समाज के सामने एक गंभीर प्रश्न खड़ा किया है। भारत एक लोकतांत्रिक देश है और किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिकों का शीर्ष नेतृत्व से प्रश्न पूछने का अधिकार है। लेकिन उस अधिकार के साथ कर्तव्य और जिम्मेदारी भी जुड़ी है। अधिकार का प्रयोग पूर्ण मर्यादा और जिम्मेदारी के साथ होना चाहिए। यदि कोई भी विरोध अपनी गरिमा और संयम और अनुशासन खो देता है तो उसका उद्देश्य कमजोर हो जाता है। इस सीजेपी आंदोलन में पूरे समय शालीनता के स्थान पर अपशब्द, अभद्रता तथा हिंसक प्रवृत्ति हावी दिखी।
यह घटना इस बात पर विचार करने के लिए प्रेरित करती है कि युवा का केवल उच्च शिक्षा प्राप्त कर लेना पर्याप्त नहीं है। विद्या ददाति विनयम अर्थात विद्या विनम्रता प्रदान करती है। शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य व्यक्ति को विवेकशील, संवेदनशील और अनुशासित बनाना है। यदि शिक्षित होने के बावजूद किसी व्यक्ति के आचरण और व्यवहार में संयम, सम्मान, विनम्रता और नैतिकता का अभाव दिखता है तो यह बताता है कि शिक्षा के साथ संस्कार प्रदान नहीं किए गए। संस्कारों का समुचित विकास नहीं हो पाया।
संस्कार देना किसी एक व्यक्ति का काम नहीं। यह परिवार, समाज और विद्यालय तीनों के संयुक्त प्रयासों से ही विकसित होते हैं। यही संस्कार हमें सिखाते हैं कि किसी बात को कैसे रखा जाए। किसी से यदि मतभेद हो तब भी संवाद की भाषा सभ्य होनी चाहिए। असहमति को तर्क से व्यक्त किया जाना चाहिए। लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान करना हमारा प्रथम कर्तव्य होना चाहिए। अपशब्दों और अराजकता से न तो कभी विचारों को मजबूती मिली है और न ही समाज को।
हालाँकि मैं यह भी समझती हूं कि एक आंदोलन में शामिल कुछ युवाओं के व्यवहार के आधार देश के सभी युवाओं को कठघरे में खड़ा करना उचित नहीं होगा। इससे पूर्व कई आंदोलन हुए जहां शांतिपूर्ण तरीके से लोगों ने अपनी बात रखी हैं। लेकिन चिंता की बात तो यह है कि सो कूल कहलाने के लिए, बनने के लिए युवा पीढ़ी किस स्तर पर आ रही है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षा के साथ युवा के चरित्र निर्माण और नैतिक मूल्यों के विकास पर भी समान रूप से बल दिया जाए। यहां माता-पिता की भूमिका भी अति महत्वपूर्ण हो जाती है। ज्ञान के साथ संस्कार अति आवश्यक है। संस्कार, अनुशासन और संयम से ही समाज और देश को जिम्मेदार नागरिक मिलते हैं। सभ्य भाषा, अनुशासित आचरण और लोकतांत्रिक मर्यादाओं का पालन ही किसी भी मांग को, आंदोलन को प्रभावी और सम्मानजनक बनाता है। बात कहने का सलीका हो हो हर बात सुनी जाती है।
आज आवश्यकता है कि युवाओं को सो कूल के नाम पर अमर्यादित और असभ्य और असंयमित होने से बचाने के लिए माता-पिता को घर में, शिक्षक को स्कूल और विश्वविद्यालयों में आगे आना होगा। युवा से संवाद कर उन्हें आचरण की शिक्षा भी देनी होगी। शिक्षा किसी भी मनुष्य को योग्य बनाती है लेकिन संस्कार ही उसे श्रेष्ठ बनाते हैं। इसलिए एक सशक्त और सभ्य समाज के निर्माण के लिए शिक्षा और संस्कार, दोनों का संतुलित और समन्वय आवश्यक है।(लेखिका शिक्षाविद हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी