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कोलकाता, 20 जुलाई (हि. स.)। पश्चिम बंगाल विधानसभा में सोमवार को मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने वर्ष 1993 के चर्चित पुलिस गोलीकांड की जांच करने वाले न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) सुशांत चटर्जी आयोग की रिपोर्ट सदन के पटल पर रखी। मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि पिछली तृणमूल कांग्रेस सरकार ने इस घटना का वर्षों तक राजनीतिक लाभ उठाया, लेकिन आयोग की महत्वपूर्ण सिफारिशों को लागू नहीं किया।
मुख्यमंत्री ने बताया कि आयोग ने अपनी रिपोर्ट में वर्ष 1993 की पुलिस गोलीबारी में मारे गए 13 युवक कांग्रेस समर्थकों के प्रत्येक परिवार को 25 लाख रुपये तथा घायलों को पांच लाख रुपये मुआवजा देने की सिफारिश की थी। उनका आरोप है कि वर्ष 2024 में रिपोर्ट मिलने के बावजूद तत्कालीन सरकार ने न तो मुआवजा दिया और न ही अन्य सिफारिशों पर अमल किया। उन्होंने दावा किया कि मरने वालों के परिवारों को केवल दो-दो लाख रुपये और घायलों को केवल 15-15 हजार रुपये दिए गए।
शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि आयोग ने अपनी जांच में पाया कि उस समय ऐसी कोई परिस्थिति नहीं थी, जिसमें पुलिस को गोली चलानी पड़ती। उन्होंने कहा कि ममता बनर्जी और तृणमूल की ओर से वर्षों तक इस घटना का राजनीतिक इस्तेमाल किया गया और कई लोगों ने इससे राजनीतिक तथा व्यक्तिगत लाभ उठाया।
मुख्यमंत्री ने आयोग के समक्ष दर्ज गवाही का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि पूर्व विपक्ष के नेता पंकज बनर्जी आयोग के सामने उपस्थित नहीं हुए, लेकिन उन्होंने तत्कालीन गृह सचिव मनीष गुप्ता को घटना के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार बताया था। मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि बाद में मनीष गुप्ता तृणमूल कांग्रेस सरकार में बिजली मंत्री बने। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि इस घटना की प्रमुख प्रत्यक्षदर्शी मानी जाने वाली ममता बनर्जी को आयोग ने गवाही के लिए नहीं बुलाया।
गौरतलब है कि 21 जुलाई 1993 को तत्कालीन वाम मोर्चा सरकार के दौरान ममता बनर्जी के नेतृत्व में युवा कांग्रेस का एक प्रदर्शन राइटर्स बिल्डिंग की ओर बढ़ रहा था। इसी दौरान पुलिस की गोलीबारी में 13 कार्यकर्ताओं की मौत हो गई थी और ममता बनर्जी भी घायल हुई थीं। बाद में कांग्रेस ने इस दिन को शहीद दिवस घोषित किया। तृणमूल कांग्रेस के गठन के बाद से पार्टी हर वर्ष 21 जुलाई को कोलकाता के धर्मतल्ला में शहीद दिवस रैली आयोजित करती है।
वर्ष 2011 में ममता बनर्जी सरकार ने इस घटना की जांच के लिए न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) सुशांत चटर्जी आयोग का गठन किया था। आयोग ने 300 से अधिक गवाहों के बयान दर्ज करने के बाद वर्ष 2024 में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी थी। रिपोर्ट में तत्कालीन वाम शासनकाल के कई भारतीय पुलिस सेवा अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की भी सिफारिश की गई है। हालांकि, तृणमूल कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में इस रिपोर्ट को विधानसभा में पेश नहीं किया गया और इसकी सिफारिशों के क्रियान्वयन को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा भी नहीं की गई।
हिन्दुस्थान समाचार / ओम पराशर