Enter your Email Address to subscribe to our newsletters

डॉ. अनिल कुमार निगम
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की हालिया इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड की यात्राएं केवल औपचारिक राजनयिक कार्यक्रम नहीं बल्कि भारत की बदलती विदेश नीति की दिशा और प्राथमिकताओं का स्पष्ट संकेत भी है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र आज वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था और सामरिक प्रतिस्पर्धा का केंद्र बन चुका है। ऐसे समय में भारत का इस क्षेत्र के तीन महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक देशों के साथ अपने संबंधों को नया आयाम देना स्वाभाविक रूप से अंतरराष्ट्रीय महत्व का विषय है।
इन यात्राओं के दौरान रक्षा सहयोग, समुद्री सुरक्षा, व्यापार, निवेश, महत्वपूर्ण खनिज, शिक्षा, डिजिटल प्रौद्योगिकी तथा आपूर्ति शृंखला जैसे अनेक क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर सहमति बनी। इससे यह संदेश गया कि भारत अब केवल दक्षिण एशिया तक सीमित शक्ति नहीं बल्कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक जिम्मेदार और प्रभावशाली भागीदार के रूप में अपनी भूमिका को विस्तार देना चाहता है। लेकिन इन यात्राओं के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण प्रश्न भी उठता है। क्या केवल दूरवर्ती देशों के साथ संबंध मजबूत करने से भारत की विदेश नीति सफल मानी जाएगी, जबकि उसके पड़ोस में चीन, पाकिस्तान, नेपाल और बांग्लादेश जैसी जटिल चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं? यही प्रश्न भारत की वर्तमान विदेश नीति के वास्तविक मूल्यांकन का आधार बनता है।
भारत की विदेश नीति आज रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) के सिद्धांत पर आधारित है। शीतयुद्ध के दौर की गुटनिरपेक्षता अब एक नए स्वरूप में विकसित हो चुकी है। भारत, अमेरिका के साथ रक्षा और तकनीकी सहयोग बढ़ाता है, रूस से रक्षा संबंध बनाए रखता है, फ्रांस और जापान के साथ सामरिक साझेदारी करता है तथा वैश्विक दक्षिण के देशों की आवाज़ भी बनता है। यही संतुलन उसकी सबसे बड़ी कूटनीतिक शक्ति है।
इंडोनेशिया की यात्रा इस दृष्टि से विशेष महत्व रखती है क्योंकि यह देश मलक्का जलडमरूमध्य के निकट स्थित है। विश्व के बड़े हिस्से का समुद्री व्यापार इसी मार्ग से होकर गुजरता है। भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा और समुद्री व्यापार की दृष्टि से इंडोनेशिया अत्यंत महत्वपूर्ण साझेदार है। समुद्री सुरक्षा और ब्लू इकोनॉमी पर बढ़ता सहयोग भारत की सागर नीति को मजबूती देता है।
ऑस्ट्रेलिया के साथ संबंध पिछले कुछ वर्षों में अभूतपूर्व रूप से मजबूत हुए हैं। दोनों देश क्वाड (Quad) के सदस्य हैं और मुक्त तथा नियम-आधारित हिंद-प्रशांत व्यवस्था के समर्थक हैं। महत्वपूर्ण खनिजों की उपलब्धता, रक्षा सहयोग, साइबर सुरक्षा और स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में ऑस्ट्रेलिया भारत के लिए दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदार बनकर उभरा है। यह सहयोग केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं है बल्कि भारत की औद्योगिक और तकनीकी आत्मनिर्भरता से भी जुड़ा हुआ है।
न्यूज़ीलैंड की यात्रा प्रतीकात्मक से कहीं अधिक महत्वपूर्ण रही। लंबे समय बाद दोनों देशों के बीच उच्चस्तरीय राजनीतिक संवाद ने शिक्षा, कृषि, डेयरी, पर्यटन और डिजिटल अर्थव्यवस्था में सहयोग की नई संभावनाएं खोली हैं। वहां का भारतीय मूल का समुदाय भी दोनों देशों के संबंधों को सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
निःस्संदेह, इन तीनों यात्राओं ने भारत की वैश्विक कूटनीतिक उपस्थिति को मजबूत किया है। अंतरराष्ट्रीय मंच पर यह संदेश गया कि भारत हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता, नियम-आधारित व्यवस्था और बहुपक्षीय सहयोग का समर्थक है। लेकिन भारत की सबसे बड़ी चुनौती उसका अपना पड़ोस है। पाकिस्तान के साथ सीमा पार आतंकवाद, चीन के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर तनाव, नेपाल के साथ समय-समय पर उत्पन्न होने वाले राजनीतिक मतभेद तथा बांग्लादेश के साथ सीमा प्रबंधन, अवैध घुसपैठ और जल बंटवारे जैसे मुद्दे आज भी भारत की विदेश नीति की वास्तविक परीक्षा लेते हैं।
किसी भी उभरती वैश्विक शक्ति के लिए आवश्यक है कि वह विश्व के प्रमुख देशों के साथ संबंध मजबूत करे। किंतु यह भी उतना ही सत्य है कि यदि पड़ोस अस्थिर रहेगा तो वैश्विक प्रभाव भी सीमित हो सकता है। विदेश नीति का पहला दायित्व अपने सामरिक परिवेश को सुरक्षित और स्थिर बनाना होता है। यहीं पर भारत की विदेश नीति के सामने सबसे बड़ी चुनौती दिखाई देती है।
भारत ने पड़ोसी प्रथम की नीति अवश्य अपनाई है लेकिन इसका प्रभाव सभी पड़ोसी देशों में समान रूप से दिखाई नहीं देता। चीन की बढ़ती आर्थिक और सामरिक सक्रियता दक्षिण एशिया में भारत के लिए प्रतिस्पर्धा की स्थिति उत्पन्न करती है। नेपाल, श्रीलंका और बांग्लादेश जैसे देशों में भी चीन का निवेश लगातार बढ़ा है। इसलिए केवल वैश्विक साझेदारियां पर्याप्त नहीं होंगी बल्कि पड़ोसी देशों के साथ विश्वास और सहयोग को भी उतनी ही प्राथमिकता देनी होगी।
हालाँकि यह कहना भी उचित नहीं होगा कि दूरवर्ती देशों के साथ भारत की सक्रियता पड़ोस की उपेक्षा का संकेत है। वास्तव में आधुनिक विदेश नीति बहुआयामी होती है। एक ओर पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को मजबूत करना आवश्यक है, वहीं वैश्विक शक्तियों और रणनीतिक साझेदारों के साथ सहयोग भी उतना ही महत्वपूर्ण है। भारत आज इसी संतुलन को साधने का प्रयास कर रहा है।
प्रधानमंत्री मोदी की इन यात्राओं का सबसे बड़ा संदेश यह है कि भारत अब केवल प्रतिक्रियात्मक (Reactive) विदेश नीति नहीं अपना रहा बल्कि सक्रिय (Proactive) कूटनीति के माध्यम से अपने हितों को वैश्विक स्तर पर आगे बढ़ा रहा है। रक्षा सहयोग, आर्थिक साझेदारी, डिजिटल प्रौद्योगिकी, समुद्री सुरक्षा और आपूर्ति शृंखला जैसे क्षेत्रों में नई पहल भविष्य में भारत की रणनीतिक क्षमता को और मजबूत कर सकती है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड यात्राएं भारत की विदेश नीति को नई ऊर्जा देने वाली महत्वपूर्ण पहल हैं। इन्होंने भारत की कूटनीतिक पहुंच, रणनीतिक विश्वसनीयता और वैश्विक साझेदारी को मजबूत किया है। किंतु भारत की विदेश नीति की वास्तविक सफलता तभी मानी जाएगी, जब वह दूर के मित्रों के साथ बढ़ते संबंधों के साथ-साथ अपने पड़ोस को भी शांत, स्थिर और सहयोगपूर्ण बनाने में समान रूप से सफल होगी।
(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार है।)
---------------
हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश