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-मेजर (डॉ.) मीनू महरोत्रा
“सिया” भारतीय मानस में केवल एक नाम नहीं है। सिया अर्थात् सीता- त्याग, मर्यादा, धैर्य, समर्पण और चरित्र की सर्वोच्च प्रतिमूर्ति। भारतीय स्त्री के आदर्श स्वरूप का सबसे उज्ज्वल नाम यदि कोई है, तो वह सिया है। माता सीता को आदर्श स्त्री और नारी शक्ति सबसे बड़ा उदाहरण है। उनका जीवन धैर्य, समर्पण, सत्य और धर्म के पालन का संदेश देता है। सीता माता मर्यादा और धार्मिक आस्था की भी प्रतीक है। धैर्य, शांति और धर्म की जहां भी बात होगी वहां सबसे पहले माता सीता का ही नाम आएगा। उनके जीवन से हम सभी को सत्संग, त्याग और भक्ति की प्रेरणा मिलती है।
लंका में रावण की कैद में रहने के दौरान भी देवी सीता ने अपनी गरिमा और आत्मसम्मान को कभी आंच नहीं आने दी। उनका चरित्र यह सिखाता है कि असली शक्ति बाहरी शस्त्रों में नहीं, बल्कि मन की शुद्धता और इरादों की मजबूती में होती है। समाज में रहकर अपनी जिम्मेदारियों को पूरी निष्ठा से निभाना और किसी भी परिस्थिति में अपने कर्तव्यों से समझौता न करना ही मां सीता की सच्ची सेवा है। उनके जीवन का हर अध्याय हमें यह अहसास कराता है कि सत्य के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति कभी हारता नहीं है, बल्कि वह सबके लिए प्रेरणा बन जाता है। जनकनंदिनी सिया ने विपरीत परिस्थितियों में भी मर्यादा, सत्य और धर्म का साथ नहीं छोड़ा। उन्होंने अपने जीवन से यह सिद्ध किया कि नारी की वास्तविक शक्ति उसके चरित्र और धैर्य में निहित है।
किन्तु जब आज के समय में कुछ घटनाएँ समाज के सामने आती हैं, जहाँ संबंधों में छल, विश्वासघात, हिंसा अथवा स्वार्थ दिखाई देता है, तब अनायास ही मन से एक प्रश्न निकल पड़ता है- “हे कलयुगी सिया! यह तूने क्या किया?” यह प्रश्न किसी एक महिला, किसी एक घटना अथवा संपूर्ण नारी समाज पर आरोप नहीं है। यह प्रश्न उस बदलते सामाजिक वातावरण से है, जहाँ कभी-कभी संबंधों की पवित्रता, त्याग और उत्तरदायित्व के स्थान पर स्वार्थ, आवेग और असंवेदनशीलता दिखाई देने लगती है।
भारत की नारी ने सदियों से अपने चरित्र की ऊँचाइयों से समाज को दिशा दी है। माता सीता, सावित्री, अनुसूया, अहिल्याबाई, जीजाबाई और रानी लक्ष्मीबाई जैसी विभूतियों ने यह बताया कि नारी केवल परिवार की धुरी नहीं बल्कि संस्कृति और राष्ट्र की वाहक है। आज भी करोड़ों भारतीय महिलाएँ परिवार, समाज और राष्ट्र के लिए अपना सर्वस्व समर्पित कर रही हैं।
फिर भी कुछ घटनाएँ हमें यह सोचने पर विवश करती हैं कि कहीं आधुनिकता की दौड़ में मूल्य, मर्यादा और उत्तरदायित्व पीछे तो नहीं छूट रहे? क्या संबंध अब त्याग और विश्वास की जगह तात्कालिक आकर्षण और स्वार्थ पर आधारित होते जा रहे हैं? क्या सोशल मीडिया, उपभोक्तावाद और त्वरित सुख की संस्कृति ने युवाओं की सोच को प्रभावित किया है?
नारी की सबसे बड़ी शक्ति उसकी करुणा, संवेदना और सृजनशीलता रही है। वही माँ बनकर पीढ़ियों का निर्माण करती है, वही बेटी बनकर संस्कार लाती है, वही पत्नी बनकर परिवार को जोड़ती है और वही समाज को दिशा देती है। इसलिए जब कोई महिला अपराध अथवा अमानवीय कृत्य में संलिप्त पाई जाती है, तो समाज केवल अपराध से नहीं, बल्कि उस आदर्श के टूटने से भी आहत होता है जिसे उसने नारी के साथ जोड़ा है।
लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि कुछ घटनाओं के आधार पर संपूर्ण नारी समाज का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता। भारत की असंख्य महिलाएँ आज भी त्याग, सेवा, मातृत्व, राष्ट्रभक्ति और सामाजिक उत्तरदायित्व की मिसाल हैं। अतः आवश्यकता किसी वर्ग विशेष को दोष देने की नहीं, बल्कि आत्ममंथन की है।
आज आवश्यकता है कि हमारी बेटियाँ और महिलाएँ शिक्षा के साथ संस्कार, स्वतंत्रता के साथ उत्तरदायित्व, अधिकारों के साथ कर्तव्य और आधुनिकता के साथ मर्यादा को भी जीवन का आधार बनाएँ। परिवारों को संवाद बढ़ाना होगा, समाज को मूल्य आधारित वातावरण देना होगा और महिलाओं को अपनी उस सांस्कृतिक शक्ति को पुनः पहचानना होगा जिसने भारत को सभ्यता और संस्कार दिए।
हे कलयुगी सिया! यह तूने क्या किया?- यह प्रश्न नारी के विरुद्ध नहीं बल्कि नारी के भीतर विद्यमान उस दिव्य चेतना को जगाने का प्रयास है, जो सदियों से इस राष्ट्र की आत्मा रही है। जब नारी अपने मूल स्वरूप- संस्कार, संवेदना, चरित्र और कर्तव्य- को पुनः स्मरण करती है, तब केवल परिवार ही नहीं, पूरा समाज जागृत होता है और राष्ट्र सशक्त बनता है। सिया का नाम केवल धारण करने से नहीं बल्कि सिया के आदर्शों को जीवन में उतारने से उसकी गरिमा सुरक्षित रहती है।
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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश