मनुष्य के चित्त का भटकाव रोकता है योग
अरुण कुमार दीक्षित योग का अर्थ जोड़ होता है। योग व्यक्ति के अन्तस का रसायन शास्त्र परिवर्तित कर देता है। योग से व्यक्ति के अंदर प्रेम रस के स्रोत आने लगते हैं। नई चेतना आने लगती है। ऊर्जा से मनुष्य भर जाता है। व्यक्ति अप्रेम से प्रेम की ओर उन्मुख ह
अरुण कुमार दीक्षित


अरुण कुमार दीक्षित

योग का अर्थ जोड़ होता है। योग व्यक्ति के अन्तस का रसायन शास्त्र परिवर्तित कर देता है। योग से व्यक्ति के अंदर प्रेम रस के स्रोत आने लगते हैं। नई चेतना आने लगती है। ऊर्जा से मनुष्य भर जाता है। व्यक्ति अप्रेम से प्रेम की ओर उन्मुख हो जाता है। व्यक्ति द्वैत से अद्वैत की यात्रा में आ जाता है। ऐसा योगी जन कहते आए हैं। हमारे जैसों ने हमने योग किया। अमुक ने योग किया। कुछ घटित नहीं हुआ। फलित नहीं हुआ। हम तत्काल निष्कर्ष पर जाते हैं। हमें वह नहीं हो रहा जो शास्त्रों में बताया गया है।

श्रीकृष्ण कहते हैं कर्म तुम्हें करना है। तुम फल क्या आएगा इस निष्कर्ष में न पड़ो। श्रीकृष्ण कहते हैं कर्मण्येवाधिकारस्ते मां फलेषु कदाचनः तुम्हारा अधिकार कर्म करने का ही है। परिणाम पर तुम्हारा अधिकार नहीं है। परिणाम में तुमसे संबंध नहीं है। तुम फल से असंबद्ध ही रहो। वे आगे कहते हैं मा कर्मफलहेतुर्भ तुम स्वयं को अपने कर्मों फलों का कारण मत जानो। वह निष्काम कर्म की बात कर रहे हैं। वे कह रहे हैं फल की ओर ध्यान न देकर पूरी शक्ति कर्म पर लगा दो। यहां यह भी लगता है कि जब पूरी शक्ति किसी कर्म में लगेगी तो बहुत संम्भव है परिणाम अच्छा आएगा। गीता में योग के विषय में कहा गया है कि जीव का परमात्मा के साथ जो सम्बंध है वह योग है। वस्तु व्यक्ति क्रिया, पदार्थ, घटनाओं वस्तुओं आदि के सम्बंध भोग है। योग नित्य और भोग अनित्य है।

पतंजलि श्रीकृष्ण के बाद हुए। पतंजलि योगाश्चितवृत्ति निरोध की देशना में है। पतंजलि कहते हैं योग से मनुष्य के चित् की वृत्तियों का निरोध हो जाता है। चित्त का भटकाव रुक जाता है। चित्त का व्यापार रुक सकता है। मगर पतंजलि का यह वक्तव्य बड़ा कठिन मालूम पड़ता है। योग में कैसे उतरा जाए। कोई योग का विद्यार्थी पहली सीढ़ी में क्या करे। यहाँ ध्यान रहे की बात चित्त वृत्ति के निरोध की हो रही है। रोकने की हो रही है। और हम जीवन व्यापार में लगातार उठते बैठते लगे रहते हैं। हम आँख बंद कर योग के लिए बैठते हैं हमको सब दृश्य लाभ-हानि के दिखाई देने लगते हैं। तभी संपत्ति भी दिखाई देने लगती है। यहाँ फिर वही बात है कि माया पीछा करती है। बड़ी कठिनाई है? योग से यह कठिनाई चली जाती है। और योग में उतरने के पहले ही यह कठिनाइयां योग में जाने नहीं देती हैं। जीवन के अनेक नए पुराने दृश्य दिखाई देने लगते हैं। जैसे ही आँख बंद कर बैठे वैसे जगत सामने नृत्य करता है। ज्ञानी जनो ने इसे माया कहा। कबीर ने कहा कि माया महाठगिनी हम जानी।

लोग गुरुओं के पास जाते हैं वह व्यायाम को योग बताने लगते हैं। यह और झंझट है। योग में व्यायाम आ गया। व्यायाम और कसरत योग से भिन्न है। हाँ व्यायाम से शरीर हष्ट-पुष्ट बलिष्ठ बनता है। व्यायाम और आहार की शुद्धता आलस्य नही आने देते हैं। आहार ठीक नहीं तो शरीर खराब होगा। आहार उत्तेजक है या अधिक है तो शरीर मन दोनों उत्तेजना में रहेंगे। इसलिए शुद्ध आहार से शुद्ध विचार आते हैं। मगर चेतना का स्तर ऊर्ध्व नहीं होता है। योग बिलकुल अलग बात है।

पतंजलि योग की पहली सीढ़ी में कहते हैं। यम। यम के पांच अर्थ बताए गए हैं। पहला है अहिंसा। मन और वचन शब्दों से किसी को कष्ट न होने पाए। कोई आपसे दुखी न होने पाए। दूसरा है सत्य। अब यह और कठिन है। सत्य का व्यवहार करना है। दिन-रात झूठ के व्यवहार हैं। व्यापार भी हैं। राजनीति में दिनभर असत्य बोलने की कार्यवाही है। ईशावास्योपनिषद की एक ऋचा में कहा गया है, कि परम सत्य का मुँह हिरण्यमय स्वर्ण पात्र से ढंका है। उपनिषदों में सत्य (ब्रह्म) को निराकार अजन्मा कहा गया है। उपनिषद दार्शनिक और खोज पर जोर देते हैं। गीता में ज्ञान के साथ कर्म कर्तव्य पर जोर है। सत्य को ही बोला जाए सत्य को पहले ही जान लिया जाए। यहाँ फिर तब योग की आवश्यकता पर प्रश्न है। तीसरा है अस्तेय। चोरी न करना। किसी वस्तु की चोरी न करना। यहां चोरी न करना सनातन में निंदित रहा है। भारतीय संस्कृति में बुद्ध, महावीर, श्री अरविंद भी चोरी नहीं करने और अहिंसा पर जोर देते हैं। गांधी ने भी अहिंसा पर जोर दिया। यहाँ पतंजलि चोरी न करने की बात को भी योग से जोड़ते हैं। चित्त से जोड़ते हैं। चोरी न करना योग में उतरने में सहायक बता रहे हैं। अहिंसा को सत्य को चित्त की वृत्ति से जोड़कर योग में जाने का मार्ग वे प्रशस्त करते दिखाई देते हैं। फिर कहते हैं ब्रह्मचर्य। अपनी इंद्रियों को संयम में रखना। अपनी ऊर्जा को बचाकर रखना। इसके बाद है अपरिग्रह। अर्थात वस्तुओं को एकत्रित न करना। संग्रह न करना।

यहाँ निर्मल चित्त योग की नदी पार करने की यात्रा में सहायक होगा। गीता में ही कृष्ण कह रहे हैं योग शारीरिक अभ्यास नहीं है। आत्मा और परमात्मा के मिलन के समभाव में रहकर अपना कर्तव्य निर्वाह ही योग है। गीता अध्याय 2 में श्लोक 48 में उन्होंने समत्वं योग उच्चते कहा है। कृष्ण कहते हैं कि सफलता या असफलता की चिंता किए बिना समभाव में रहकर अपना कर्तव्य निर्वाह ही योग है। फिर वह कर्म योग की बात करते हैं। निष्काम कर्म को श्रेष्ठ कह रहें हैं। गीता में योग के तीन प्रमुख मार्ग बताए गए हैं। पहला कर्म योग निष्काम भाव से अपने कर्तव्यों का पालन करना। दूसरा भक्ति योग पूर्ण श्रद्धा और प्रेम के साथ ईश्वर की शरण में जाना। तीसरा है ज्ञान योग। विवेक और ज्ञान योग के माध्यम से सत्य को जानना। योग व्यायाम नहीं है आत्मा का परमात्मा से मिलन और जीवन जीने की उत्कृष्ट कला है योग। गीता में योग कर्मसु कौशलम् अर्थात कर्म में कुशलता। श्रीकृष्ण कहते हैं कर्मों की पूरी कुशलता और संतुलन के साथ करना ही योग है। यहां कुशलता का अर्थ चतुराई नहीं है बल्कि अनासक्त फल की इच्छा के बिना कर्तव्य पालन है।

वहीं, पतंजलि ने दुख के पांच कारण बताए हैं, जिन्हें योग द्वारा समाप्त किया जा सकता है। इनमें पहला है अविद्या या असत्य को सत्य मान लेना। दूसरा है अस्मिता अहंकार या स्वयं को शरीर और मन समझ लेना। तीसरे को पतंजलि ने राग कहा है। सुख के प्रति अत्यधिक मोह राग है। और चौथा है अप्रिय के प्रति और अनुभवों के प्रति गुस्सा किया जाना। सफलता के दो स्तम्भ बताएं हैं। मन को स्थिर करने और योग में सफलता के दो उपाय हैं। इसके लिए अभ्यास प्राथमिक है। मन को शांत रखने के लिए लंबे समय तक नियंत्रण का प्रयास करना। दूसरा है वैराग्य अर्थात बाहरी दुनिया की क्षणिक और भौतिक वस्तुओं के प्रति इच्छा का त्याग करना। योग वह अवस्था है जो मनुष्य को संसार के दुखों के बंधनों से मुक्त कर देती है।

(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश