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- गिरीश जोशी
महाराष्ट्र की वारकरी परंपरा में संत ज्ञानेश्वर, नामदेव, एकनाथ और तुकाराम आदि के साथ-साथ संत चोखामेला का स्थान बहुत बढ़ा है। उन्होंने अपने जीवनानुभवों के माध्यम से भेदभाव की पीड़ा को शब्द दिए और भक्ति मार्ग से समरसता का संदेश दिया।
मराठी संत साहित्य में संत चोखामेला को अत्यंत तेजस्वी, करुणामय और क्रांतिकारी व्यक्तित्व का कलमकार माना जाता है। वारकरी संप्रदाय के वे ऐसे संत थे जिन्होंने भक्ति के माध्यम से सामाजिक समानता का संदेश दिया। उनके अभंगों में ईश्वरभक्ति, मानवीय पीड़ा, भेदभाव का विरोध और भगवान विठ्ठल के प्रति अखंड प्रेम दिखाई देता है। संत चोखामेला केवल संतकवि ही नहीं थे, बल्कि वे अनुसूचित जाति समाज की चेतना को आवाज देने वाले आद्य प्रवर्तक भी माने जाते हैं। संत चोखामेला मराठी के पहले अनुसूचित जाति समाज के संतकवि माने जाते हैं। उनके अभंगों में व्यक्त सामाजिक वेदना केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामूहिक इतिहास की साक्षी है। उन्होंने ईश्वरभक्ति के माध्यम से समाज सुधार का मार्ग दिखाया।
संत चोखामेला का जन्मकाल लगभग 13वीं–14वीं शताब्दी माना जाता है। उनका जन्म महार समाज में हुआ था। उनकी पत्नी का नाम सोयराबाई था, जो स्वयं भी भक्त कवयित्री थीं। उनके पुत्र कर्मामेला का भी संत परंपरा में उल्लेख मिलता है।
ये काल महाराष्ट्र में भक्ति आंदोलन के विस्तार का समय था। तत्कालीन समय में अनुसूचित जाति को सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक स्तर पर अनेक प्रतिबंधों का सामना करना पड़ता था। मंदिर प्रवेश, शिक्षा और सार्वजनिक जीवन में उन्हें स्थान नहीं था। ऐसी विषम सामाजिक परिस्थितियों में संत चोखामेला का उदय हुआ। उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से यह संदेश दिया कि ईश्वर सबका है। उनके हृदय में विठ्ठलभक्ति की अखंड धारा प्रवाहित होती थी। वे पंढरपुर के भगवान विठ्ठल (भगवान श्री कृष्ण) के अनन्य भक्त थे।
संत नामदेव का सत्संग
संत चोखामेला को संत नामदेव का सान्निध्य प्राप्त हुआ। नामदेव की संगति में उनकी भक्ति को अधिक परिपक्व दिशा मिली। वारकरी परंपरा के समानता, प्रेम, नामस्मरण और ईश्वर से सीधे संबंध जैसे विचारों का उनके जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा। संत नामदेव और वारकारी संप्रदाय की परंपरा के संतो ने भक्ति को जातिभेद से परे सार्वभौमिक साधना माना। यही विचार चोखामेला के अभंगों में स्पष्ट दिखाई देता है। संत नामदेव की संगति में उनकी भक्ति और दृढ़ हुई तथा उन्होंने विठ्ठल भक्ति अपने भावों को स्वर देने के लिए अभंग रचकर समाज के अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाई और समरसता स्थापित करने की पहल की।
पंढरपुर से संबंध
चोखामेला आगे चलकर पंढरपुर आए और विठ्ठलभक्ति में लीन हो गए। मंदिर में प्रवेश निषिद्ध होने पर भी वे मंदिर के बाहर खड़े होकर भगवान विठ्ठल का नामस्मरण और संकीर्तन करते थे। लोकश्रुति है कि स्वयं भगवान विठ्ठल मंदिर के गर्भगृह से बाहर आकर उन्हें दर्शन देते थे।
प्रमुख उपलब्धियाँ
1. भेदभाव के विरुद्ध आवाज - उनके अभंगों में समाज की विषमता और भेदभाव पर प्रखर प्रहार दिखाई देता है। उन्होंने विद्रोह किया, परंतु कटुता से नहीं बल्कि करुणा और भक्ति के मार्ग से।
2. वारकरी संप्रदाय का प्रसार - वारी, नामस्मरण और अभंग लेखन तथा गायन के माध्यम से उन्होंने सामान्य जन तक भक्ति का संदेश पहुँचाया।
3. आत्मसम्मान की प्रेरणा - उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व से अनुसूचित और वंचित समाज को आत्मबोध और स्वाभिमान की प्रेरणा मिली।
अभंगों की विशेषताएँ
संत चोखामेला ने भगवान विठ्ठल कि भक्ति में अनेक अभंगों (मराठी भजनों) की रचना की । आपकी भाषा अत्यंत सरल, सहज और लोकभाषा की शैली मे होती थी। आपने अपने अभंगों से सामाजिक चेतना जगाने का काम किया। आपके अभंगों में भक्ति और विद्रोह का अनूठा संगम दिखाई देता था। आपके अभंगों में आत्मानुभव प्रमुख रूप से प्रगट हुआ है। आपने अपनी भक्तिमय रचनाओं से समरसता का सार्वकालिक संदेश दिया। आपके संदेश में सामाजिक क्रांति का प्रखर तेज झलकता रहा।
प्रसिद्ध अभंग
संत चोखामेला ने अनेक अभंग लिखे है । उनका लिखा एक अभंग अत्यंत लोकप्रिय है।
“ऊस डोंगा परी रस नव्हे डोंगा ।काय भुललासी वरलिया रंगा ॥1॥
कमान डोंगी परी तीर नोहे डोंगा ।काय भुललासी वरलिया रंगा ॥2॥
नदी डोंगी परी जळ नव्हे डोंगें । काय भुललासी वरलिया रंगा ॥3॥
चोखा डोंगा परी भाव नव्हे डोंगा ।काय भुललासी वरलिया रंगा ॥4॥“
अर्थ : किसी के बाहरी स्वरूप देखकर भ्रमित नहीं होना चाहिए। गन्ना टेढ़ा होता है, पर उसका रस मीठा होता है। । धनुष की कमान टेढ़ी होती है लेकिन तीर टेढ़ा नहीं होता । नदी टेढ़ी - मेढ़ी होती है लेकिन जल टेढ़ा-मेढ़ा नहीं होता। चोखामेला का रंग रूप जो कुछ भी हो लेकिन उसका भक्ति भाव टेढ़ा नहीं है। इस अभंग का भाव ये है कि मनुष्य का मूल्य जाति या रूप से नहीं, बल्कि गुणों से होता है । हमारा बाहरी रंग-रूप, हमारी पहचान जो कुछ भी हो लेकिन भीतर जो है उसका बाहरी पहचान से कोई संबंध नहीं है, वह तो सबके भीतर एक समान, शुद्ध, निर्मल और आनंद मय स्वरूप है।
संत चोखामेला मन में किसी प्रकार का पूर्वाग्रह या दुराग्रह रख कर प्रतिकार करने में विश्वास नहीं रखते थे, बल्कि उन्होंने अपनी विठ्ठल भक्ति को ही प्रतिरोध का साधन बना लिया था । मंदिर के बाहर खड़ा यह संत वास्तव में संपूर्ण व्यवस्था से प्रश्न करता है, जो मन से निर्मल है, शुद्ध है, वह ईश्वरदर्शन से वंचित क्यों रहे ?
साहित्य में महत्व
अनुसूचित समाज के साहित्य के उदय से पहले ही चोखामेला ने अनुसूचित समाज के अनुभव को स्वर दिया। इसलिए अनेक विद्वान उन्हें अनुसूचित समाज के साहित्य का आद्य स्वर मानते हैं। उनके काव्य की पीड़ा व्यक्तिगत नहीं, सामूहिक है। संत चोखामेला केवल भक्तकवि नहीं थे, बल्कि सामाजिक आत्मजागरण के विचारक संतथे। उन्होंने भेदभाव की वेदना को भक्ति की भाषा दी। उनके अभंग केवल भक्तिगीत नहीं, बल्कि समाज जागरण के दस्तावेज हैं। उन्होंने सिखाया कि ईश्वर सबका है, मनुष्य की श्रेष्ठता जात- पात में नहीं, भक्ति और मानवता में है।
वारकरी संप्रदाय में स्थान
वारकरी परंपरा में संत चोखामेला समरसता के प्रतीक माने जाते हैं। पंढरपुर मंदिर के सामने उनकी समाधि है। वारकरी आज भी पहले चोखोबा को प्रणाम करते है फिर भगवान विठ्ठल के दर्शन के लिए मंदिर में जाते हैं। ये परंपरा लोकमानस में उनके प्रति सर्वोच्च सम्मान और श्रद्धा का प्रमाण है। संत चोखामेला उस धारा के प्रवर्तक हैं जिन्होंने अनेक प्रकार के भेदभाव को सहन करके भी अपने भीतर की सकारात्मकता, अनन्य भक्ति –भाव और ईश्वर के प्रति श्रद्धा को नहीं छोड़ा। इसीलिए उनको पंढरपुर में संतों की मालिका में वह स्थान मिला जो बिरलों को ही मिलता है। आज भी उनके द्वारा भगवान विट्ठल की भक्ति में रचे गए अभंग सभी समाज के लोग उतनी ही श्रद्धा से और भक्ति भाव से गाते हैं।
वास्तव में संत चोखामेला जैसी महान विभूतियों ने ये संदेश दिया है कि किसी काल - परिस्थिति में समाज में विभेद खड़े हुए, कोई एक समाज मुख्य धारा से वंचित रहा, उपेक्षित रहा लेकिन ये दायित्व पूरे समाज का है कि वह किसी प्रकार की श्रेष्ठ अथवा हीनता की भावना का बोध आगे लेकर ना चले, अन्यथा समाज के भीतर व्याप्त भेदभाव मिट नहीं पाएगा । वे इस विचार के प्रबल समर्थक थे कि भेदभाव को कटुता से नहीं मिटाया जा सकता वरन आपस में प्रेम - समन्वय और संवाद से ही इसे दूर करके मिटाया जा सकता है।
ऐसा कहा जाता है कि जब पंढरपुर मंदिर के परकोटे का निर्माण कार्य चल रहा था तब उनके ऊपर एक दीवार गिरने से उनका निधन हुआ। लोककथा है कि अंतिम संस्कार के बाद भी उनकी अस्थियों से भी “विठ्ठल, विठ्ठल” की ध्वनि सुनाई देती रही । यह उनकी अखंड भक्ति, जिजीविषा और समर्पण का प्रतीक है।
(लेखक, भारतीय ज्ञान परंपरा एवं संस्कृति के अध्येता एवं स्तंभकार हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी