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-प्रहलाद सबनानी
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूर्ण कर लिए हैं। यदि हम इन सौ वर्षों की यात्रा पर दृष्टि डालें तो स्पष्ट दिखाई देता है कि संघ के स्वयंसेवकों ने समाज के लगभग प्रत्येक क्षेत्र में सक्रिय योगदान दिया है। विचार, संगठन और कार्य के स्तर पर संघ ने निरंतर समाज जीवन को सकारात्मक दिशा देने का प्रयास किया है। प्रारम्भ में सीमित दायरे में प्रारंभ हुआ संघ का कार्य समय के साथ व्यापक और बहुआयामी होता गया। समाज की बदलती आवश्यकताओं को समझते हुए स्वयंसेवक विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय हुए और समाज परिवर्तन के वाहक बने।
संघ के मूल उद्देश्य के अनुरूप देश में हिंदुत्व के जागरण की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। इस जागरण का प्रभाव समाज के विभिन्न वर्गों में दिखाई देने लगा है। जाति, वर्ग, भाषा या क्षेत्र के आधार पर जो भेदभाव लंबे समय से समाज में मौजूद थे, उनमें धीरे-धीरे कमी आ रही है। अनेक राष्ट्रीय और सांस्कृतिक अवसरों पर हिंदू समाज की एकता और संगठन की भावना स्पष्ट रूप से सामने आई है। श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन, अयोध्या में श्रीरामलला की प्राण प्रतिष्ठा तथा कुंभ जैसे विशाल आयोजनों ने समाज की एकता और आस्था को नई ऊर्जा दी है। इन अवसरों पर पूरे देश से आए लोगों की सहभागिता ने यह सिद्ध किया है कि भारतीय समाज में संगठन और आत्मविश्वास की शक्ति कितनी प्रबल है।
संघ की 100 वर्षों की यात्रा केवल इतिहास की उपलब्धियों का वर्णन नहीं है बल्कि यह भविष्य के लिए एक प्रेरक संकल्प भी है। आज समाज में जो सकारात्मक परिवर्तन दिखाई दे रहे हैं, वे लंबे समय से किए जा रहे सतत प्रयासों का परिणाम हैं। हिंदुत्व और भारतीय परम्पराओं के प्रति लोगों का विश्वास बढ़ रहा है। एक समय ऐसा भी था जब सार्वजनिक जीवन में हिंदू समाज की कमियों को ही अधिक उजागर किया जाता था, जिससे समाज के अनेक लोग अपनी परंपराओं और मूल्यों को सही रूप में समझ नहीं पाए। परंतु अब परिस्थितियाँ बदल रही हैं। लोग अपने धर्म, संस्कृति और परंपराओं पर गर्व अनुभव करने लगे हैं।
आज अनेक परिवारों में अपने बच्चों के नामकरण से लेकर विवाह संस्कार तक भारतीय परंपराओं का पुनः सम्मानपूर्वक पालन किया जा रहा है। घर-परिवार में धार्मिक और सांस्कृतिक परम्पराओं को महत्व दिया जाने लगा है। इस परिवर्तन का उद्देश्य केवल परंपराओं का पालन करना नहीं है, बल्कि एक सच्चरित्र, संस्कारित और जिम्मेदार पीढ़ी का निर्माण करना है। ऐसी पीढ़ी ही समाज में सकारात्मक वातावरण का निर्माण कर सकती है और परिवार तथा समाज में सुख-शांति की स्थापना कर सकती है।
इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने शताब्दी वर्ष में एक विशेष पहल की है, जिसे “पंच परिवर्तन” कार्यक्रम कहा गया है। इस कार्यक्रम का आह्वान संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत द्वारा किया गया है। इसका उद्देश्य समाज में ऐसे पाँच महत्वपूर्ण क्षेत्रों में जागरूकता और व्यवहारिक परिवर्तन लाना है, जिनसे राष्ट्र जीवन को नई दिशा मिल सके।
पंच परिवर्तन कार्यक्रम के पाँच प्रमुख आयाम हैं- नागरिक कर्तव्यों के प्रति सजगता, पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता, स्वदेशी भावना और स्वावलंबन का विकास, कुटुंब प्रबोधन के माध्यम से पारिवारिक मूल्यों का सुदृढ़ीकरण, सामाजिक समरसता की स्थापना।इन पाँचों आयामों का उद्देश्य केवल विचार प्रस्तुत करना नहीं है बल्कि इन्हें जीवन में व्यवहार के रूप में अपनाना है। जब समाज का प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक होगा, तभी राष्ट्र सशक्त बन सकेगा। नागरिकों को कानून व्यवस्था का पालन करते हुए समाज में सद्भाव और सहयोग की भावना को बढ़ावा देना होगा।
कुटुंब प्रबोधन इस कार्यक्रम का अत्यंत महत्वपूर्ण भाग है। परिवार समाज की सबसे छोटी लेकिन सबसे महत्वपूर्ण इकाई है। यदि परिवार में संस्कार, संवाद और संवेदनशीलता का वातावरण होगा तो समाज स्वतः स्वस्थ और सुदृढ़ बनेगा। इसके लिए यह आवश्यक है कि परिवार के सदस्य समय निकाल कर एक साथ बैठें, संवाद करें और अपने बच्चों को महापुरुषों के जीवन से प्रेरणा दें। सप्ताह में कम से कम एक बार परिवार में धार्मिक या सांस्कृतिक आयोजन तथा बच्चों के साथ महापुरुषों के जीवन पर चर्चा जैसी छोटी-छोटी पहलें समाज में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं।
इसी प्रकार सामाजिक समरसता भी पंच परिवर्तन का प्रमुख लक्ष्य है। समाज में किसी भी प्रकार का भेदभाव राष्ट्र की एकता को कमजोर करता है। मंदिर, पानी और श्मशान जैसे विषयों में यदि कहीं भी भेदभाव की भावना शेष है, तो उसे समाप्त करना समाज का दायित्व है। सभी वर्गों के लोगों के साथ आत्मीयता और सम्मान का व्यवहार करना ही समरस समाज की आधारशिला है। त्यौहारों और सामाजिक अवसरों पर विभिन्न समुदायों के लोग एक-दूसरे के घर जाएँ, एक साथ बैठें और परस्पर सम्मान का भाव रखें, यही सामाजिक एकता का वास्तविक स्वरूप है।
पर्यावरण संरक्षण भी आज के समय की अत्यंत महत्वपूर्ण आवश्यकता है। प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखना मानव जीवन के लिए अनिवार्य है। जल संरक्षण, हरियाली बढ़ाना और प्लास्टिक के उपयोग को कम करना जैसे छोटे-छोटे कदम पर्यावरण की रक्षा में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं। यदि प्रत्येक परिवार यह संकल्प ले कि पानी का अपव्यय नहीं होगा, घर-आंगन में वृक्ष लगाए जाएंगे और सिंगल-यूज़ प्लास्टिक का उपयोग कम किया जाएगा, तो पर्यावरण संरक्षण की दिशा में बड़ा परिवर्तन संभव है।
स्वदेशी भावना का विकास भी राष्ट्र निर्माण का महत्वपूर्ण आधार है। स्वदेशी का अर्थ केवल देश में बने उत्पादों का उपयोग करना ही नहीं है बल्कि आत्मनिर्भरता और स्वाभिमान की भावना को मजबूत करना भी है। जब देश का नागरिक स्वदेशी वस्तुओं को प्राथमिकता देता है, तब देश की अर्थव्यवस्था मजबूत होती है और रोजगार के अवसर बढ़ते हैं। इसलिए स्वदेशी का आचरण घर से ही प्रारंभ होना चाहिए।
इसके साथ-साथ समाज में व्याप्त कुरीतियों को समाप्त करने के लिए भी सामूहिक प्रयास आवश्यक हैं। दहेज प्रथा, मृत्यु भोज जैसी परंपराएँ तथा युवाओं में बढ़ती नशे की प्रवृत्ति जैसी समस्याएँ समाज के लिए गंभीर चुनौती हैं। इन कुरीतियों के उन्मूलन के लिए समाज के प्रत्येक वर्ग को मिलकर प्रयास करना होगा। जब समाज की एकता, सजगता और निःस्वार्थ सेवा की भावना एक साथ कार्य करती है, तभी राष्ट्र सशक्त और वैभवशाली बनता है। भारत की सनातन संस्कृति “वसुधैव कुटुम्बकम्” का संदेश देती है, जिसमें सम्पूर्ण विश्व को एक परिवार माना गया है। यही संस्कृति मानवता को अंधकार से प्रकाश की ओर, असत्य से सत्य की ओर और निराशा से आशा की ओर ले जाने की प्रेरणा देती है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मानना है कि भारत की पहचान उसकी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक जीवन दृष्टि से है, जिसे दुनिया हिंदुत्व के नाम से जानती है। इसी जीवन दृष्टि के आधार पर समाज को एक सूत्र में जोड़कर सशक्त और संस्कारित राष्ट्र का निर्माण करना संघ का मूल उद्देश्य रहा है। वर्ष 1925 में प्रारम्भ हुआ यह कार्य आज भी निरंतर आगे बढ़ रहा है और भविष्य में भी समाज परिवर्तन की दिशा में इसी प्रकार जारी रहेगा।
(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी