बंदी प्रत्यक्षीकरण मामले में 10 कार्यकर्ता रिहा, हाई कोर्ट ने दिल्ली पुलिस से मांगा स्पष्टीकरण
नई दिल्ली, 15 मार्च (हि.स.)। दिल्ली उच्च न्यायालय में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर करने के बाद दिल्ली पुलिस ने अवैध हिरासत में रखे गए सामाजिक कार्यकर्ताओं को रिहा कर दिया है। रविवार काे दिल्ली पुलिस ने विशेष सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय को यह सू
दिल्ली उच्च न्यायालय


नई दिल्ली, 15 मार्च (हि.स.)। दिल्ली उच्च न्यायालय में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर करने के बाद दिल्ली पुलिस ने अवैध हिरासत में रखे गए सामाजिक कार्यकर्ताओं को रिहा कर दिया है। रविवार काे दिल्ली पुलिस ने विशेष सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय को यह सूचना दी। जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंद्र डूडेजा की विशेष पीठ ने दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी करते हुए पूछा है कि उन्होंने किस आधार पर और किन परिस्थितियों में इन कार्यकर्ताओं को हिरासत में रखा। कोर्ट ने दिल्ली पुलिस के संबंधित इलाके का सीसीटीवी फुटेज संरक्षित करने का आदेश दिया। मामले की अगली सुनवाई 27 मार्च को होगी।

सुनवाई के दौरान रविवार काे याचिकाकर्ता एहसानुल हक की ओर से वकील कॉलिन गोंजाल्वेस, राजबीर की ओर से वकील शाहरुख आलम और सागरिका राजौरा की ओर से वकील जसदीप ढिल्लो पेश हुए।

गोंजाल्वेस ने कहा कि एक कार्यकर्ता के अलावा दिल्ली पुलिस ने सभी कार्यकर्ताओं को तब छोड़ा जब ये मामला मीडिया में प्रचारित हो गया। ये काफी दयनीय स्थिति है कि पुलिस पूरे तरीके से नियंत्रण से बाहर हो गयी है।

सुनवाई के दौरान दिल्ली पुलिस के वकील संजीव भंडारी ने कहा कि एफआईआर दर्ज करने के बाद सभी लोगों को छोड़ दिया गया है और ये मामला उतना सामान्य नहीं है जितना याचिकाकर्ताओं की ओर से बताया जा रहा है। उन्होंने याचिकाकर्ताओं की ओर से एफआईआर की प्रति देने की मांग का विरोध करते हुए कहा कि ये काफी गोपनीय है और वे इसे कोर्ट में ही दाखिल करेंगे।

राजौरा के वकील ने कहा कि रुद्र नामक एक कार्यकर्ता को अभी भी नहीं छोड़ा गया है। रुद्र को दूसरे स्थान पर ले जाया गया है जहां दूसरे लोग हिरासत में हैं। वहां उन्हें प्रताड़ित किया जा रहा है और जान से मारने की धमकी दी जा रही है। तब कोर्ट ने दिल्ली पुलिस से कहा कि वे रुद्र का पता लगाएं और कल तक बताएं कि वो कहां है। रुद्र के बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर उच्च न्यायालय 16 मार्च को सुनवाई करेगा।

सुनवाई के दौरान वकील शाहरुख आलम ने कहा कि सादी वर्दी में आए लोगों ने इन कार्यकर्ताओं को उठाया। उन्हें पुलिस थाने नहीं ले जाया गया बल्कि किसी अनजान जगह पर ले जाया गया और उन्हें मजिस्ट्रेट के सामने पेश भी नहीं किया गया। इन सामाजिक कार्यकर्तां के साथ ये दूसरी घटना है।

वकील शाहरुख आलम ने 14 मार्च को चीफ जस्टिस डीके उपाध्याय की अध्यक्षता वाली बेंच के समक्ष मेंशन करते हुए इन याचिकाओं पर जल्द सुनवाई की मांग की थी। जिसके बाद कोर्ट ने 15 मार्च को सुनवाई करने का आदेश दिया था। तीन याचिकाकर्ताओं ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की है। सागरिका राजोरा ने अपनी बहन लक्षिता राजोरा को कोर्ट के समक्ष पेश करने की मांग थी। याचिका में दावा किया गया था कि लक्षिता राजोरा 13 मार्च की शाम से दिल्ली यूनिवर्सिटी के पास विजय नगर इलाके से लापता थीं और उसका फोन भी बंद था। याचिका में कहा गया था कि वो विजय नगर इलाके में एक छात्र संगठन के दफ्तर गई। 13 मार्च के शाम आठ बजे के बाद से लक्षिता राजोरा का मोबाइल फोन बंद था।

याचिका में कहा गया था कि लक्षिता राजोरा छात्र संगठन के जिस दफ्तर में गई थी उस दफ्तर में मौजूद कई लोगों का शाम आठ बजे से कोई अता-पता नहीं है। याचिका में आशंका जताई गई थी कि लक्षिता राजोरा को दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल ने उठा लिया है। याचिका में कहा गया था कि करीब आठ महीने पहले लक्षिता राजोरा और उसके साथियों को अवैध रुप से हिरासत में रखा गया था। उस दौरान उन्हें करीब एक हफ्ते तक अवैध रुप से हिरासत में प्रताड़ित किया गया था और एक हफ्ते बाद मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया गया था।

हिन्दुस्थान समाचार/संजय

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हिन्दुस्थान समाचार / अमरेश द्विवेदी