विपक्ष की भूमिका पर उठते सवाल
-डॉ. मयंक चतुर्वेदी भारतीय लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण संस्था संसद है। यही वह मंच है जहाँ जनता के प्रतिनिधि देश के ज्वलंत मुद्दों पर चर्चा करते हैं, सरकार से जवाबदेही मांगते हैं और राष्ट्रीय हित में नीतियों का निर्माण करते हैं। लोकतंत्र में संसद
डाॅ. मयंक चतुर्वेदी


-डॉ. मयंक चतुर्वेदी

भारतीय लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण संस्था संसद है। यही वह मंच है जहाँ जनता के प्रतिनिधि देश के ज्वलंत मुद्दों पर चर्चा करते हैं, सरकार से जवाबदेही मांगते हैं और राष्ट्रीय हित में नीतियों का निर्माण करते हैं। लोकतंत्र में संसद देश की सामूहिक चेतना का प्रतीक भी होती है, यहाँ होने वाली बहसें सरकार की नीतियों को दिशा देती हैं और जनता की आकांक्षाओं और समस्याओं को भी राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनाती हैं। यही कारण है कि संसद से यह अपेक्षा की जाती है कि यहाँ होने वाली हर बहस का केंद्र भारत और उसके नागरिकों की समस्याएँ हों।

वस्तुत: हाल ही में संसद के बजट सत्र के दूसरे चरण के पहले दिन जो दृश्य सामने आया, उसने अवश्य आज लोकतांत्रिक प्रक्रिया को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। विपक्ष, विशेषकर कांग्रेस ने अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच चल रहे संघर्ष तथा पश्चिम एशिया की स्थिति पर संसद में चर्चा की मांग को लेकर इतना हंगामा कर दिया कि लोकसभा की कार्यवाही चल ही नहीं सकी। यह स्थिति तब पैदा हुई जब सरकार की ओर से विदेश मंत्री पहले ही इस विषय पर संसद में विस्तृत जानकारी दे चुके थे। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या यह वास्तव में जनहित का मुद्दा था या फिर राजनीतिक विरोध के लिए संसद को बाधित करने की रणनीति?

विदेश मंत्री ने राज्यसभा और लोकसभा दोनों में पश्चिम एशिया की स्थिति पर विस्तार से सरकार का पक्ष रखा। उन्होंने स्पष्ट किया कि मौजूदा संघर्ष भारत के लिए चिंता का विषय है, क्योंकि खाड़ी देशों में लगभग एक करोड़ भारतीय काम करते हैं। इसके अलावा भारत की ऊर्जा सुरक्षा भी काफी हद तक इसी क्षेत्र पर निर्भर है। भारत सरकार अपने नागरिकों की सुरक्षा को लेकर पूरी तरह सतर्क है और अब तक हजारों भारतीयों को सुरक्षित स्थानों तक पहुँचाया जा चुका है। संबंधित मंत्रालयों और विदेशों में स्थित भारतीय दूतावासों के साथ लगातार समन्वय बनाए रखा जा रहा है।

सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि संघर्ष के कारण वैश्विक सप्लाई चेन और ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हो सकती है इसलिए भारत स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है। विदेश मंत्री ने यह भी स्वीकार किया कि ईरान की मौजूदा परिस्थितियों में नेतृत्व स्तर पर संपर्क करना कठिन हो गया है, किंतु भारत हमेशा शांति, संवाद और कूटनीतिक समाधान का पक्षधर रहा है।

जब सरकार इस विषय पर संसद को जानकारी दे चुकी थी, तब भी विपक्ष का लगातार “वी वांट डिस्कशन” के नारे लगाना और सदन की कार्यवाही बाधित करना कई प्रश्नों को जन्म देता है। क्या विपक्ष को यह ज्ञात नहीं कि भारत एक विशाल और जटिल देश है, जहाँ 140 करोड़ से अधिक लोगों की आकांक्षाएँ और समस्याएँ हैं? रोजगार, कृषि संकट, शिक्षा और स्वास्थ्य की गुणवत्ता, बुनियादी ढाँचे का विकास, राष्ट्रीय सुरक्षा, पर्यावरण और जल संकट जैसे अनेक विषय हैं, जिन पर संसद में गहन और गंभीर चर्चा की आवश्यकता है।

यह एक गहन तथ्य है कि भारत की अर्थव्यवस्था आज लगभग 3.5 ट्रिलियन डॉलर के आकार तक पहुँच चुकी है और सरकार इसे आने वाले वर्षों में 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने का लक्ष्य लेकर चल रही है। यह लक्ष्य तभी हासिल किया जा सकता है जब उद्योगों में निवेश बढ़े, रोजगार सृजन की गति तेज हो और युवाओं को व्यापक अवसर मिलें। हर वर्ष लगभग एक से सवा करोड़ युवा श्रम बाजार में प्रवेश करते हैं। यदि इतने बड़े पैमाने पर रोजगार उपलब्ध नहीं हुए तो बेरोजगारी और सामाजिक असंतोष दोनों बढ़ सकते हैं।

इसका एक कारण यह भी है कि वर्तमान में देश की लगभग 65 प्रतिशत जनसंख्या 35 वर्ष से कम आयु की है। यह स्थिति भारत को एक बड़ा जनसांख्यिकीय लाभ प्रदान करती है, जिसे “डेमोग्राफिक डिविडेंड” कहा जाता है, किंतु इसका लाभ तभी लिया जा सकता है जब युवाओं को पर्याप्त शिक्षा, कौशल और रोजगार के अवसर उपलब्ध हों। यदि ऐसा नहीं हुआ तो यही जनसांख्यिकीय लाभ भविष्य में चुनौती भी बन सकता है।

इसी तरह किसानों की आय, ग्रामीण विकास, शिक्षा व्यवस्था का सुधार, स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार और बुनियादी ढाँचे का विकास जैसे विषय सीधे भारत के भविष्य से जुड़े हुए हैं। संसद में इन मुद्दों पर व्यापक और गंभीर चर्चा की आवश्यकता है। यदि संसद का बहुमूल्य समय विदेशी संघर्षों पर राजनीतिक हंगामे में खर्च हो जाए, तो यह लोकतंत्र की भावना के अनुरूप कैसे माना जा सकता है?

यह स्पष्ट है कि विदेश नीति और वैश्विक घटनाएँ भी महत्वपूर्ण होती हैं। पश्चिम एशिया की स्थिति का भारत की ऊर्जा सुरक्षा और प्रवासी भारतीयों से गहरा संबंध है। इसलिए इस विषय पर सरकार का सतर्क रहना और संसद को जानकारी देना आवश्यक है। लेकिन इसका यह अर्थ बिल्कुल नहीं हो सकता कि इन मुद्दों को संसद की कार्यवाही बाधित करने का साधन बना दिया जाए।

हालांकि इसमें दो मत नहीं कि लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। वह सरकार की नीतियों की आलोचना करता है, उसकी गलतियों की ओर ध्यान दिलाता है और वैकल्पिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। परन्तु यह भूमिका तभी सार्थक होती है जब वह जिम्मेदार और रचनात्मक हो। संसद को बार-बार बाधित करना, नारेबाजी करना और बहस के बजाय हंगामा करना लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कमजोर करता है।

विडंबना यह भी रही कि जब विदेश मंत्री राज्यसभा में इस विषय पर बोल रहे थे, तब विपक्ष ने वॉकआउट कर दिया। यदि वास्तव में चर्चा की इच्छा होती तो विपक्ष उस समय सदन में रहकर सवाल पूछ सकता था, अपनी चिंताएँ व्यक्त कर सकता था और सरकार को जवाब देने के लिए बाध्य कर सकता था। लेकिन वॉकआउट और हंगामा यह संकेत देते हैं कि उद्देश्य शायद चर्चा से अधिक राजनीतिक संदेश देना था।

वस्तुत: आज भारत विश्व मंच पर तेजी से उभरती हुई शक्ति है। आर्थिक, सामरिक और कूटनीतिक दृष्टि से भारत की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो चुकी है। ऐसे समय में संसद का हर निर्णय और हर बहस वैश्विक स्तर पर भी एक संदेश देती है। यदि संसद में बार-बार अव्यवस्था और हंगामा होता है, तो यह लोकतांत्रिक परिपक्वता की छवि को भी प्रभावित करता है। इसलिए आज आवश्यकता इस बात की है कि सभी राजनीतिक दल संसद की गरिमा और उसकी जिम्मेदारी को समझें। भले असहमति लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा है, किंतु उसका तरीका रचनात्मक और तथ्य आधारित होना चाहिए।

लोकतंत्र में संसद राष्ट्रीय जिम्मेदारी का प्रतीक है। यहाँ होने वाली बहसें देश की दिशा और भविष्य तय करती हैं। रोजगार, कृषि, शिक्षा-स्वास्थ्य, राष्ट्रीय सुरक्षा और पर्यावरण जैसे मुद्दे करोड़ों भारतीयों के जीवन से जुड़े प्रश्न हैं। इन पर गंभीर, तथ्य आधारित और दूरदर्शी चर्चा ही भारत को समावेशी और टिकाऊ विकास की राह पर आगे बढ़ा सकती है। सभी सांसदों से यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि वे संसद में राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्रहित को प्राथमिकता दें। यदि सभी दल इस भावना के साथ काम करें तो संसद वास्तव में उस उद्देश्य को पूरा करती दिखती है जिसके लिए उसे लोकतंत्र की सर्वोच्च संस्था कहा जाता है।

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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी