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योगेश कुमार सोनी
बीते दो वर्ष में बांग्लादेश ने राजनीतिक भूचाल देखा है। पहली बार ऐसा हुआ कि किसी एशियाई प्रधानमंत्री को देश से भागना पड़ा। अब बांग्लादेश की नई गाथा के बाद एक नया कूटनीतिक अध्याय शुरू होगा । आम चुनाव में ऐतिहासिक जीत दर्ज करने वाली बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी ने कड़े स्वर में कहा कि सत्ता संभालते ही उसका पहला बड़ा एजेंडा पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना का प्रत्यर्पण होगा। अब सवाल सिर्फ कानूनी नहीं बल्कि भारत-बांग्लादेश संबंधों की दिशा तय करने वाला भी है चूंकि बीते लंबे समय से हसीना को लेकर भारत-बांग्लादेश के अलावा पूरी दुनिया की निगाह है कि आखिर शेख हसीना को लेकर अगला अध्याय क्या होगा । बीएनपी की स्थायी समिति के सदस्य सलाहुद्दीन अहमद ने शुक्रवार को स्पष्ट कहा कि उनकी पार्टी भारत से औपचारिक रूप से शेख हसीना को ट्रायल के लिए बांग्लादेश प्रत्यर्पित करने का आग्रह करेगी। उनका कहना है कि यह मामला दोनों देशों के संबंधित मंत्रालयों के बीच तय कानूनी प्रक्रिया के तहत सुलझाया जाना चाहिए।
बीएनपी का तर्क है कि हसीना के कार्यकाल में हुए कथित दमन और भ्रष्टाचार के मामलों की निष्पक्ष सुनवाई जरूरी है। पार्टी ने भारत से सहयोग की उम्मीद जताई है लेकिन यह भी स्पष्ट कर दिया है कि न्यायिक प्रक्रिया से पीछे हटने का सवाल नहीं उठता। बांग्लादेश चुनाव में बीएनपी की बड़ी जीत के बाद पार्टी नेता तारिक रहमान देश की कमान संभालने के लिए तैयार हैं। इसके साथ ही दो दशक बाद बांग्लादेश की सत्ता में बीएनपी की वापसी हो रही है। इसका असर भारत पर भी होगा। बांग्लादेश के 13वें राष्ट्रीय चुनाव में बीएनपी ने 300 में से 212 सीटों पर रिकॉर्ड जीत हासिल कर बहुमत हासिल किया है। जमात-ए-इस्लामी गठबंधन को मात्र 77 सीटें हासिल हुई हैं।अन्य दलों का प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा। र्व सत्ताधारी अवामी लीग को इस चुनाव में हिस्सा लेने की अनुमति नहीं दी गई।
अगस्त 2024 में छात्र आंदोलन के बाद शेख हसीना की 15 साल पुरानी सरकार गिर गई थी जिसके बाद से देश राजनीतिक अस्थिरता और हिंसा के दौर से गुजरा। अब बांग्लादेश सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वहां बदहाली व गुंडागर्दी को कैसे नियंत्रित करेगी। दुनिया ने खुली आंखों से देखा कि किस तरह देश के प्रधानमंत्री की भी जान सुरक्षित नही है। गुंडागर्दी का तांडव ऐसा हुआ कि हसीना के निजी अंगवस्त्रों के साथ फोटो सोशल मीडिया पर डाले गए। मोहम्मद यूनुस ब्रांड के रूप में जाने जाते हैं। उनकी वैश्विक पहचान एक सामाजिक उद्यमी और नागरिक समाज के नेता के रूप में रही है। उनकी यह घोषणा कि थी वह चुनाव के बाद सत्ता में नहीं रहेंगे लेकिन आज बांग्लादेश की सरकार को यूनुस की कितनी आवश्यकता है और क्या वह उनके किरदार व अनुभव का इस्तेमाल करके अपने आप को सशक्त करने का प्रयास करेगी। यह अहम सवाल है। सरकार को यूनुस का फायदा यह मिल सकता है कि उनकी साख सभी नेताओं से बहुत मजबूत मानी जाती है।
संभावना जताई जा रही है कि चुनाव के बाद यूनुस फिर से सामाजिक विकास, गरीबी उन्मूलन और फिनटेक आधारित वित्तीय समावेशन जैसे क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं। इस तरह उनका भविष्य प्रत्यक्ष राजनीति से दूर, लेकिन राष्ट्रीय पुनर्निर्माण से जुड़ा रह सकता है। टाइम मैगजीन ने बुधवार को वर्ष 2025 के 100 सबसे प्रभावशाली लोगों की लिस्ट जारी की थी, जिसमें मोहम्मद यूनुस को जगह मिली है। पूर्व अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने पहली बार लिखा था कि यूनुस बांग्लादेश को मुश्किलों से बाहर निकाल रहे हैं और मानवाधिकारों को बहाल कर रहे हैं। बहरहाल, अब बांग्लादेश को स्वयं को लेकर अपनी सकारात्मक शक्ति का प्रदर्शन करते हुए अपनी उपस्थिति दर्ज करानी होगी। चूंकि जितना नुकसान बीते कुछ समय में हुआ है उसकी भरपाई करना बेहद मुश्किल है। सरकार का नया स्वरूप ऐसा होना चाहिए कि वह अपनी छवि को सुधारते हुए सभी के साथ चले और देश की जनता में अपना विश्वास बनाए रखे।
(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / मुकुंद