शोक सभाओं की भव्यता का दुर्भाग्यपूर्ण चलन
- डॉ. प्रियंका सौरभ किसी भी सभ्य समाज की पहचान उसके उत्सवों से नहीं बल्कि उसके शोक से होती है। समाज दुःख को किस तरह ग्रहण करता है, उसे किस गरिमा और संवेदनशीलता के साथ व्यक्त करता है- यही उसकी मानवीय परिपक्वता का पैमाना है। दुर्भाग्यवश, आज हमारा सम

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