राजस्थान हाईकोर्ट : बारह साल की बेटी से दुष्कर्म करने वाले पिता को जीवनभर जेल की सजा बरकरार
कोर्ट ने कहा- यह भरोसे का कत्ल, नारी गरिमा से समझौता नहीं जोधपुर, 09 जनवरी (हि.स.)। राजस्थान हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने 12 साल की नाबालिग बेटी से रेप करने वाले पिता के खिलाफ अहम फैसला सुनाया। हाईकोर्ट ने अपील खारिज करते हुए निचली अदालत द्वारा सुना
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कोर्ट ने कहा- यह भरोसे का कत्ल, नारी गरिमा से समझौता नहीं

जोधपुर, 09 जनवरी (हि.स.)। राजस्थान हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने 12 साल की नाबालिग बेटी से रेप करने वाले पिता के खिलाफ अहम फैसला सुनाया। हाईकोर्ट ने अपील खारिज करते हुए निचली अदालत द्वारा सुनाई गई मृत्यु तक आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखा है। जस्टिस विनीत कुमार माथुर और जस्टिस चंद्रशेखर शर्मा की खंडपीठ ने सुनवाई करते हुए आदेश दिया कि सरकार पीडि़ता को 7 लाख रुपये का मुआवजा दे।

हाईकोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि बाप-बेटी के पवित्र रिश्ते को कलंकित करने वाले ऐसे अपराध में किसी भी तरह की नरमी नहीं बरती जा सकती। कोर्ट ने आगे कहा कि ऐसी नैतिक गिरावट के प्रति दिखाई गई कोई भी नरमी न केवल न्याय प्रशासन को कमजोर करेगी, बल्कि बच्चों को यौन शोषण से बचाने के संवैधानिक और वैधानिक दायित्व से गंभीर पल्ला झाडऩे के बराबर होगी।

घटना 12 अगस्त 2022 की है। पीडि़ता की मां रक्षाबंधन के त्योहार पर अपने भाइयों को राखी बांधने के लिए पीहर गई थी और घर पर उसके तीन बेटे, तीन बेटियां और पति मौजूद थे।

जब मां वापस लौटी तो उसकी 12 साल बड़ी बेटी रोने लगी। मां के पूछने पर पीडि़ता ने बताया कि 12 अगस्त की रात को उसके पिता ने उसके साथ रेप किया। पीडि़ता ने यह भी बताया कि इससे पहले जब मां ऑपरेशन के लिए अस्पताल में थी, तब भी पिता ने उसके साथ दो बार गलत काम किया था और किसी को बताने पर जान से मारने की धमकी दी थी।

इसके बाद मां ने डूंगरपुर के वरदा पुलिस थाने में एफआईआर दर्ज करवाई। डूंगरपुर की पॉक्सो कोर्ट ने 14 नवंबर 2022 को आरोपित पिता को दोषी मानते हुए मृत्यु तक आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। ट्रायल कोर्ट के इसी फैसले को आरोपित की ओर से चुनौती दी गई। आरोपित के वकील ने तर्क दिया कि शिकायतकर्ता पत्नी का अपने पति के साथ वैवाहिक विवाद चल रहा था और वह तलाक लेना चाहती थी, इसलिए उसने झूठा मुकदमा दर्ज करवाया है। वकील ने यह भी दलील दी कि एफएसएल और डीएनए रिपोर्ट में आरोपित के सैंपल से कोई मेल नहीं मिला है और रिपोर्ट नेगेटिव आई है, जिसे ट्रायल कोर्ट ने नजरअंदाज किया।

कोर्ट ने बचाव पक्ष की दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि पीडि़ता की गवाही पूरी तरह से विश्वसनीय और स्वाभाविक है। कोर्ट ने माना कि मां के घर से बाहर रहने की रात, पहले के दो घटनाक्रम, दी गई धमकियां और देर से रिपोर्ट की वजह सब कुछ पीडि़ता के बयान में स्पष्ट और तार्किक रूप से सामने आया है। केवल डीएनए रिपोर्ट नेगेटिव आने या देरी से एफआईआर दर्ज होने से आरोपित को बरी नहीं किया जा सकता। फैसले में कोर्ट ने संस्कृत श्लोक- यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता। यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला क्रिया।। (अर्थात जहां नारियों का सम्मान होता है, वहां देवता निवास करते हैं। जहां उनका अपमान होता है, वहां सभी कार्य निष्फल हो जाते हैं।) का उद्धरण देते हुए कहा कि महिलाओं और बच्चों की गरिमा के साथ कोई समझौता नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने डॉक्टर की मेडिकल रिपोर्ट का उल्लेख करते हुए कहा कि मेडिकल राय यह दर्शाती है कि पीडि़ता के साथ संबंध बनाए गए, जो उसके कथन के अनुरूप है। कोर्ट ने कहा कि पीडि़ता 12 साल से कम उम्र की नाबालिग है, इसलिए सहमति का सवाल ही नहीं उठता। कोर्ट ने कहा कि वैवाहिक कलह और तलाक की इच्छा का हवाला महज आरोप है। समर्थन में कोई ठोस साक्ष्य रिकॉर्ड पर नहीं है, इसलिए इसे झूठे फंसाने का आधार नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने विक्टिम कंपनसेशन स्कीम-2018 के तहत राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह पीडि़ता को 7 लाख रुपये का मुआवजा प्रदान करे। इसी के साथ कोर्ट ने विशेष पॉक्सो कोर्ट के फैसले की पुष्टि की और आरोपित की अपील को पूरी तरह खारिज कर दिया।

हिन्दुस्थान समाचार / सतीश