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- डॉ. मयंक चतुर्वेदी
बांग्लादेश एक बार फिर खून से लाल है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार मारा गया व्यक्ति कोई राजनेता नहीं, कोई उग्रवादी नहीं, बल्कि एक साधारण हिन्दू युवक था; चंचल चंद्र भौमिक। उसे किसी न्यायालय ने सजा नहीं दी थी, किसी युद्ध में वह दुश्मन नहीं था, फिर भी उसे जिंदा जला दिया गया। उसका अपराध सिर्फ इतना था कि वह हिन्दू था और बांग्लादेश में जी रहा था। यह हत्या कोई नई बात नहीं न कोई अपवाद है, यह तो उस निरंतर चल रहे हिन्दू संहार की एक और कड़ी है, जिसे बांग्लादेश सरकार या तो देख नहीं पा रही या जानबूझकर अनदेखा कर रही है।
23 जनवरी की आधी रात नरसिंगदी जिले के एक गैरेज में जो हुआ वह बांग्लादेशी राज्य में चंचल चंद्र भौमिक के जरिए फिर एक सार्वजनिक चेतावनी है कि हिन्दू होना अब इस देश में मौत को न्योता देना है। यदि यह अपराध किसी व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा होता, तब ही माना जा सकता था कि आपसी विवाद का ये परिणाम है, किंतु ऐसा बिल्कुल भी सामने नहीं आया है। बार-बार हिन्दुओं को जिंदा जलाना प्रतीक होता है जैसे बांग्लादेश में गैर मुसलमानों के लिए इस्लामिक जिहादी ताकतें भय का, आतंक का और वर्चस्व स्थापित करने का एक ऐसा वातावरण तैयार कर रही हैं, जिसमें सिर्फ इस्लाम को माननेवाले ही रह सकते हैं!
चंचल से पहले गाजीपुर के कालीगंज में लिटन चंद्र घोष को बेलचे से सिर कुचलकर मार दिया गया। उसके बाद राजबाड़ी में पेट्रोल पंप पर काम करने वाले रिपन साहा को एक बीएनपी नेता ने गाड़ी से रौंद डाला। इन घटनाओं में समानता साफ है, पीड़ित हिन्दू हैं और अपराधियों को सत्ता-संरक्षण का भरोसा है। कभी देवी-देवताओं की तस्वीरें बहाना बनती हैं, कभी पैसे का विवाद। असल वजह हमेशा एक ही रहती है मजहबी (धार्मिक) घृणा।
मानवाधिकार संगठनों के अनुसार केवल छह महीनों में 116 से अधिक अल्पसंख्यकों की हत्या हुई, जिनमें अधिकांश हिन्दू थे। दिसंबर 2025 में ही 51 सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएं दर्ज की गईं। ये आंकड़े किसी आंतरिक अशांति के नहीं, बल्कि सुनियोजित हिंसा के हैं। यह एक पैटर्न है; लक्षित हत्या, मॉब लिंचिंग, झूठे ईशनिंदा आरोप और प्रशासनिक चुप्पी के।
आज इस्लामिक साम्राज्यवाद के नजरिए से देखें तो दिख यही रहा है कि 1906 में मुस्लिम लीग की स्थापना के साथ जिस मजहबी राजनीति ने जन्म लिया, वही आज बांग्लादेश में हिंसा का मूल है। भूमि की स्वाभाविक पहचान को मिटाकर एक आरोपित पहचान थोपने का प्रयास हो रहा है। बांग्लादेश में हिन्दुओं पर हो रहा अत्याचार इसी ऐतिहासिक संघर्ष का परिणाम है। किंतु इस्लामिक जिहादी ये भूल जाते हैं कि नाम बदल देने से इतिहास नहीं बदलता। सिंधु देश भारत था, है और रहेगा, चाहे उसके कितने ही टुकड़े क्यों न कर दिए जाएं।
आप देखेंगे कि हर हिन्दू हत्या के बाद बांग्लादेश पुलिस का एक तयशुदा बयान आता है, “जांच जारी है”, “सभी एंगल देखे जा रहे हैं”। लेकिन नतीजा शून्य रहता है। न त्वरित न्याय, न कठोर सजा। कई मामलों में एफआईआर तक दर्ज नहीं होती। जब राज्य अपराधियों को दंडित नहीं करता, तब समझलें कि वह अप्रत्यक्ष रूप से उन्हें जिहादियों को, हिंसक इस्लामवादियों को लाइसेंस दे देता है। कहना होगा कि मोहम्मद यूनुस के शासनकाल में जिस तरह अल्पसंख्यकों पर हमले बढ़े हैं, वह सिर्फ प्रशासनिक विफलता नहीं कही जा सकती है, यह तो राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव का प्रमाण और सीधे तौर पर हिन्दू हत्या करवाना है।
यह देखकर ओर आश्चर्य एवं दुख होता है कि एक तरफ आज का वैश्विक उदार वर्ग गाजा पर आंसू बहाता है, जिसमें कि भारत में भी ऐसे लोगों की एक बड़ी संख्या है, किंतु बांग्लादेश में जिंदा जलाए जा रहे हिन्दुओं पर उसकी आवाज गुम हो जाती है। भारत में कुछ तथाकथित बुद्धिजीवियों को उमर खालिद की जेल ज्यादा बड़ी मानवाधिकार समस्या लगी, पर बांग्लादेश में हिन्दू महिलाओं के बलात्कार, मंदिरों की आगजनी और लक्षित हत्याएं उन्हें विचलित नहीं करतीं। निश्चित ही ये भारत में इस प्रकार की सोच रखनेवालों के लिए और वैश्विक स्तर पर यह संवेदनशीलता नहीं है, यह सीधे तौर पर वैचारिक पाखंड है, जो हिंसा और अत्याचार पर दोहरे मापदण्ड निर्धारित करता है।
क्या बांग्लादेश के हिन्दू भारत का विषय नहीं?
यह कहना कि बांग्लादेश के हिन्दू भारत का विषय नहीं हैं, ऐतिहासिक अज्ञानता है। बंग भूमि की चेतना ढाकेश्वरी देवी से जुड़ी है। सीमाएं बदली हैं, सभ्यता नहीं। जो हिन्दू आज बांग्लादेश में मारे जा रहे हैं, वे उसी सांस्कृतिक धारा के वाहक हैं जिसकी जड़ें भारत में हैं। जब किसी सभ्यतागत समुदाय को उसकी पहचान के कारण मिटाने का प्रयास होता है, तो उस सभ्यता के माननेवालों का यह दायित्व है कि वे उसके हित संरक्षण में खुलकर बोलें, साथ खड़ें हों, लिख सकें तो लिखें, जहां प्रतिकार कर सकते हैं, वहां उसके समर्थन में वो भ करें। ऐसे में स्वभाविक तौर पर आज भारत का मौन कूटनीतिक से अधिक नैतिक अपराध बनता हुआ दिख रहा है। समझ नहीं आता कि कभी भारत से अलग हुए बांग्लादेश के लिए बहुसंख्यक हिन्दू जनसंख्या वाले भारत की क्या मजबूरियां हैं जो वो यूनिस सरकार को सख्त संदेश नहीं दे पा रहा है!
बेशक; भारत सरकार ने चिंता जताई है, रिपोर्टें मंगाई हैं, कूटनीतिक भाषा में बयान दिए हैं। लेकिन इतिहास बताता है कि कट्टरपंथ बयान नहीं समझता, वह केवल दबाव समझता है। यदि भारत इस मुद्दे पर निर्णायक, आक्रामक और निरंतर अंतरराष्ट्रीय दबाव नहीं बनाएगा तो यह हिंसा सीमा पार अस्थिरता का रूप ले सकती है। संसदीय समितियां पहले ही चेतावनी दे चुकी हैं कि बांग्लादेश की स्थिति 1971 के बाद सबसे बड़ी रणनीतिक चुनौती है, किंतु अंतत: अंतिम निर्णय तो भारत सरकार को ही इसमे लेना है।
आज चंचल चंद्र भौमिक की हत्या फिर बता रही है कि बांग्लादेश में हिन्दुओं के लिए भविष्य और भी अंधकारमय होता जा रहा है। दूसरी ओर भारत को भी यह समझना होगा कि जब इतिहास पुकार रहा हो, तब मौन साधना नहीं, हस्तक्षेप करना ही धर्म होता है। क्योंकि अन्याय पर चुप्पी अंततः स्वयं काल बन जाती है।
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी