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- सम्राट विक्रमादित्य विवि में “भारतीय गणतंत्र की उद्घोषक उज्जयिनी” विषय पर हुई राष्ट्रीय संगोष्ठी
उज्जैन, 22 जनवरी (हि.स.)। उज्जयिनी केवल एक प्राचीन नगर या धार्मिक केंद्र नहीं, बल्कि यह भारतीय गणतंत्र की उद्घोषक और संवाहक भूमि रही है। भारत में गणतंत्र की अवधारणा किसी एक काल या व्यक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हजारों वर्षों की सांस्कृतिक और वैचारिक यात्रा का परिणाम है।
यह विचार पद्मश्री डॉ. भगवतीलाल राजपुरोहित ने शुक्रवार को मप्र के उज्जैन में सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय में “भारतीय गणतंत्र की उद्घोषक उज्जयिनी” विषय पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए व्यक्त किए। प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व अध्ययनशाला तथा महाराजा विक्रमादित्य शोधपीठ के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस संगोष्ठी का उद्देश्य यह स्पष्ट करना था कि भारतीय गणतंत्र की अवधारणा आधुनिक नहीं, बल्कि उसकी जड़ें प्राचीन भारत में, विशेष रूप से उज्जयिनी में निहित हैं।
संगोष्ठी में इतिहास, पुरातत्व और संस्कृति के विद्वानों ने गणतांत्रिक चेतना की निरंतरता पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम के विशेष अतिथि के रूप में उज्जैन कलेक्टर रोशन कुमार सिंह एवं जिला पंचायत सीईओ श्रेयांस कुमट उपस्थित रहे। समारोह की अध्यक्षता कुलगुरु प्रो. अर्पण भारद्वाज ने की, जबकि कुलसचिव डॉ. अनिल कुमार शर्मा, जी.डी.सी. के प्राचार्य डॉ. प्रशान्त पुराणिक, कुलानुशासक प्रो. शैलेंद्र कुमार शर्मा, पुरातत्वविद डॉ. रमण सोलंकी, आर.सी. ठाकुर, वरिष्ठ कार्यपरिषद सदस्य रूप पमनानी, महर्षि सांदीपनि वेद विद्या प्रतिष्ठान के सचिव प्रो. विरूपाक्ष वि. जड्डीपाल एवं अन्य गणमान्य अतिथिगण भी मंचासीन रहे।
पद्मश्री डॉ. राजपुरोहित ने अपने संबोधन में कहा कि भारतीय परंपरा में “गण” की अवधारणा अत्यंत प्राचीन है। गणपति को गणनायक कहा जाना इस बात का प्रतीक है कि भारत में सामूहिक निर्णय, सहभागिता और सहमति को सर्वोच्च स्थान दिया गया। महाभारत के शांति पर्व में गणतंत्र की विशेषताओं पर विस्तृत चर्चा मिलती है, जहाँ भीष्म पितामह युधिष्ठिर को जनकल्याणकारी शासन के सिद्धांत समझाते हैं।
उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण का उदाहरण देते हुए कहा कि श्रीकृष्ण स्वयं कभी राजा नहीं बने, बल्कि उन्होंने लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करते हुए योग्य शासकों को मार्गदर्शन दिया। यह भारतीय राजनीतिक चिंतन की पराकाष्ठा है, जहाँ सत्ता से अधिक महत्व लोकहित और नैतिकता को दिया गया। बुद्धकालीन गणराज्यों के समय भी गणतंत्र की रक्षा और स्थायित्व पर गंभीर विमर्श होता था।
पद्मश्री डॉ. राजपुरोहित ने विशेष रूप से सम्राट विक्रमादित्य के काल पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उनके शासन में गणतंत्र को व्यावहारिक और संगठित स्वरूप प्राप्त हुआ। विक्रमादित्य ने स्वयं को जनता से ऊपर नहीं, बल्कि जनता का प्रतिनिधि और सेवक माना। उनके काल में विद्वानों की सभाएँ, पंचायत प्रणाली और जनसहभागिता शासन की रीढ़ थीं।
उन्होंने कहा कि उज्जयिनी इसीलिए विशिष्ट है क्योंकि यहाँ गणतंत्र केवल विचार नहीं, बल्कि जीवन पद्धति था। यह नगरी राजनीतिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक चेतना का केंद्र रही है। आपने युवाओं से आह्वान किया कि वे इस गौरवशाली विरासत को समझें, उस पर गर्व करें और शोध व अध्ययन के माध्यम से इसे विश्व पटल पर स्थापित करें।
जिस गणतंत्र पर हम गर्व करते हैं, उसकी जड़ें हजारों वर्ष पुरानी: कुलगुरु प्रो. भारद्वाज
सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. अर्पण भारद्वाज ने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि उज्जैन की भूमि गणतांत्रिक चेतना की प्राचीन और सशक्त प्रतीक रही है। यहाँ की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक परंपराएँ पूरे भारत में गणतंत्र की भावना को स्पंदित करती रही है। उन्होंने कहा कि आज के युवाओं के लिए यह जानना अत्यंत आवश्यक है कि जिस गणतंत्र पर हम गर्व करते हैं, उसकी जड़ें हजारों वर्ष पुरानी हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री द्वारा इस विषय को राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठा दिलाने के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि विश्वविद्यालय का दायित्व है कि वह इस गौरवशाली विरासत को शोध और अध्ययन के माध्यम से नई पीढ़ी तक पहुँचाए।
संगोष्ठी के विशेष अतिथि कलेक्टर रौशन कुमार सिंह ने कहा कि, गणतंत्र दिवस समारोह इस वर्ष कार्तिक मेला ग्राउंड, शिप्रा नदी तट पर आयोजित किया जा रहा है। इस स्थल का चयन शहर के सभी क्षेत्रों पुराने और नए के नागरिकों की अधिकतम सहभागिता को ध्यान में रखकर किया गया है। यह आयोजन पूरे शहर का सामूहिक उत्सव है, जिसमें सामाजिक संस्थाओं और नागरिकों की भागीदारी सुनिश्चित की जा रही है। उन्होंने कम समय में संगोष्ठी आयोजित करने के लिए विश्वविद्यालय प्रशासन का आभार व्यक्त किया तथा गणतंत्र दिवस समारोह में विश्वविद्यालय की सहभागिता का भी आह्वान किया।
प्रो. जड्डीपाल ने कहा कि प्राचीन भारत में राजतंत्र और गणतंत्र दोनों व्यवस्थाएँ समानांतर रूप से विद्यमान थीं। डॉ. प्रशांत पौराणिक ने वैदिक साहित्य, कौटिल्य के अर्थशास्त्र और महाजनपद काल का उल्लेख करते हुए कहा कि जनता की सहभागिता शासन का मूल आधार थी।उन्होंने 16 महाजनपदों, विशेष रूप से अवंती जनपद की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उज्जयिनी ने भारतीय गणतंत्र की वैचारिक भूमि तैयार की। वक्ताओं ने कहा कि आधुनिक लोकतंत्र जिन मूल्यों पर आधारित है, उनके बीज प्राचीन भारतीय समाज में पहले से मौजूद थे।
मुद्राशास्त्री डॉ. आर. सी. ठाकुर ने अपने वक्तव्य में पुरातात्त्विक और मुद्राशास्त्रीय प्रमाण प्रस्तुत करते हुए कहा कि सम्राट विक्रमादित्य के सिक्कों पर अंकित “गणस्य विजय” जैसे वाक्य इस बात का प्रमाण हैं कि शासन की विजय राजा की नहीं, बल्कि गण यानी जनता की मानी जाती थी। उन्होंने बताया कि मालव गणों, मानव गणों और अवंती क्षेत्र की गणतांत्रिक परंपरा ने विदेशी आक्रमणों के समय भी अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रखी। उज्जैन का यह इतिहास विश्व के लिए अद्वितीय उदाहरण है।
प्राचीन भारतीय इतिहास अध्ययनशाला के विभागाध्यक्ष विश्वजीत परमार ने कविता के माध्यम से इतिहास को सतत प्रवाहमान सरिता बताया। उन्होंने कहा कि गणतंत्र की चेतना केवल अतीत की बात नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य का मार्गदर्शन भी है।
वरिष्ठ कार्यपरिषद सदस्य रूप पमनानी ने कहा कि एक अच्छा वक्ता वही होता है जो अच्छा श्रोता भी बन सके। उन्होंने 26 जनवरी के गणतंत्र दिवस पर शिप्रा तट पर प्रस्तावित आयोजन का उल्लेख करते हुए कहा कि यह कार्यक्रम उज्जैन की आत्मा और गणतंत्र की भावना को जोड़ने वाला होगा। कार्यक्रम के अंत में कुलसचिव डॉ. अनिल कुमार शर्मा ने मुख्य अतिथि, विशेष अतिथियों, वक्ताओं, प्राध्यापकों, विद्यार्थियों एवं जिला प्रशासन के प्रति आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम का संचालन राष्ट्रीय कवि दिनेश दिग्गज द्वारा किया गया।
हिन्दुस्थान समाचार / मुकेश तोमर