ओटीटी की अनियंत्रित अश्लीलता : साहित्य परिषद् और न्यायपालिका की साझा चिंता
-डॉ. प्रवीण दाताराम गुगनानी नवम्बर माह में देश के सांस्कृतिक परिदृश्य में दो ऐसी घटनाएँ सामने आईं, जिन्होंने भारतीय समाज के नैतिक स्वास्थ्य, सांस्कृतिक संरचना और युवा पीढ़ी के मानसिक भविष्य पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। एक ओर अखिल भारतीय साहित
डॉ. प्रवीण दाताराम गुगनानी


-डॉ. प्रवीण दाताराम गुगनानी

नवम्बर माह में देश के सांस्कृतिक परिदृश्य में दो ऐसी घटनाएँ सामने आईं, जिन्होंने भारतीय समाज के नैतिक स्वास्थ्य, सांस्कृतिक संरचना और युवा पीढ़ी के मानसिक भविष्य पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। एक ओर अखिल भारतीय साहित्य परिषद् ने ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर प्रसारित हो रही अश्लील और मूल्यहीन सामग्री के विरुद्ध अपनी चिंता दर्ज कराते हुए एक व्यापक प्रस्ताव पारित किया। दूसरी ओर देश के सर्वोच्च न्यायालय ने भी ओटीटी की अनियंत्रित सामग्री को लेकर सरकार को कठोर कदम उठाने की सलाह दी। दोनों घटनाएँ मिलकर एक ऐसे संकट की ओर संकेत करती हैं, जिसे अब अनदेखा करना राष्ट्र के लिए संभव नहीं है।

भारतीय समाज लंबे समय से अपनी सांस्कृतिक आत्मा, नैतिक मर्यादाओं और पारिवारिक मूल्यों के लिए जाना जाता रहा है, किंतु पिछले कुछ वर्षों में मनोरंजन के नाम पर इन मूल्यों को व्यवस्थित रूप से ध्वस्त किया जा रहा है। ओटीटी प्लेटफॉर्म्स, जो एक समय रचनात्मकता, स्वतंत्र प्रयोग और कलात्मक अभिव्यक्ति का माध्यम माने जाते थे, अब बड़े स्तर पर अश्लीलता, उग्रता, विकृति और अराजकता के केंद्र बनते जा रहे हैं। फिल्मों और वेबसीरीज में नग्नता और हिंसा को ‘रियलिज्म’ का नाम दिया जा रहा है, पात्रों की भाषा में गालियों और भद्दे संवादों को ‘क्रिएटिव फ्रीडम’ बताकर परोसा जा रहा है और युवा पीढ़ी इसे आधुनिकता का प्रतीक समझने के भ्रम में फँसती जा रही है।

अखिल भारतीय साहित्य परिषद् जो भारत की सभी भाषाओं, बोलियों और लिपियों के संरक्षण-संवर्धन का संवैधानिक दायित्व निभाने वाला संगठन है ने इसी संकट को रेखांकित किया है। परिषद् का कहना है कि ओटीटी की सामग्री युवाओं के मन-मस्तिष्क में उग्रता, अश्लीलता, विकृत यौनाचार, नशाखोरी और हिंसक प्रवृत्तियों को बढ़ावा दे रही है। न केवल सामग्री, बल्कि उस सामग्री के प्रचार-प्रसार की शैली भी उतनी ही चिंताजनक है। पोस्टर, ट्रेलर, सोशल मीडिया रीले—सबमें आकर्षण का आधार ‘संस्कृति-विरोध’ और ‘वर्जना-भंग’ बनता जा रहा है।

विभिन्न शोध भी इस संकट की पुष्टि करते हैं। हाल ही में दिल्ली और मुंबई के कॉलेजों में किए गए सर्वे से पता चला कि 14 से 18 वर्ष के बीच के 70% बच्चे बिना किसी आयु-नियंत्रण के ओटीटी पर वयस्क सामग्री देखते हैं। अनेक मनोवैज्ञानिक रिपोर्टें बताती हैं कि लगातार हिंसा और अश्लीलता के संपर्क में रहने से किशोरों में तनाव, अवसाद, आक्रामकता और संबंधों की गलत समझ विकसित होती है।

साहित्य परिषद् ने केवल ओटीटी ही नहीं, बल्कि ऑनलाइन गेमिंग की बढ़ती विकृति पर भी चिंता जताई है। आज कई लोकप्रिय गेम, जिनमें हिंसा, हत्याएँ और आभासी अपराध मुख्य तत्व हैं, युवाओं में नशे की तरह फैल चुके हैं। बीते वर्षों में ‘ब्लू व्हेल चैलेंज’, ‘पबजी’ की लत से मानसिक विकृति, चोरी-डकैती और आत्महत्या तक की घटनाएँ सामने आईं। कई राज्यों में ऐसी घटनाओं के बाद गेमिंग पर प्रतिबंध और निगरानी की माँग उठी, किंतु इसका व्यापक समाधान आज भी प्रतीक्षित है।

इस संदर्भ में परिषद् ने जो पाँच प्रमुख माँगें रखी हैं, वे पूरी तरह तार्किक एवं राष्ट्रीय हित में हैं- स्वायत्त नियामक संस्था का गठन, सांस्कृतिक संवेदनशीलता की अनिवार्यता, बच्चों के लिए आयु-आधारित सामग्री का नियंत्रण, विकृत सामग्री पर कानूनी कार्रवाई और भारतीय मूल्यों पर आधारित वैकल्पिक मनोरंजन को प्रोत्साहन। वास्तव में, यदि एक राष्ट्र अपनी किशोर और युवा पीढ़ी को ही सुरक्षित न रख सके, तो उसकी प्रगति और सांस्कृतिक गरिमा दोनों खतरे में पड़ जाती हैं।

इसी के समानांतर सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणियाँ इस मुद्दे को और गंभीर बनाती हैं। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की पीठ ने स्पष्ट कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अमूल्य अधिकार है, पर इसका दुरुपयोग समाज के लिए हानिकारक है। अदालत ने यह भी कहा कि अश्लील सामग्री देने से पहले चेतावनी और नियमन अनिवार्य होना चाहिए। न्यायालय का यह संकेत महज कानूनी टिप्पणी नहीं, बल्कि समाज के प्रति नैतिक चेतावनी है यदि समय रहते नियंत्रण नहीं किया गया, तो यह प्रवृत्ति विकृति और अराजकता का रूप ले सकती है।

साहित्य परिषद् ने अपने अधिवेशन में आत्मबोध से विश्वबोध की परिकल्पना को आगामी वर्षों के वैचारिक पथ के रूप में निर्धारित किया है। यह संकल्प इस बात का संकेत है कि राष्ट्र की आत्मा तभी विश्वगुरु बन सकती है जब वह पहले स्वयं के भीतर की विकृतियों को पहचाने और उन्हें दूर करने का प्रयास करे। ओटीटी और डिजिटल माध्यमों की यह उच्छृंखलता भारत की सांस्कृतिक आत्मा के सामने वही चुनौती खड़ी कर रही है, जो औपनिवेशिक काल में भाषा, संस्कृति और परंपरा के सामने खड़ी हुई थी—बस माध्यम बदल गए हैं, स्वरूप बदला है, संकट वही है।

आज आवश्यकता सांस्कृतिक पुनर्जागरण की है। कई देश जैसे दक्षिण कोरिया, जापान और चीन—अपने डिजिटल माध्यमों पर कठोर सांस्कृतिक नियंत्रण रखते हैं। चीन में 18 वर्ष से कम आयु के बच्चों को गेमिंग खेलने के घंटे कानूनी रूप से सीमित हैं। दक्षिण कोरिया में अश्लील सामग्री का प्रसार कड़े दंड का विषय है। जापान ने मीडिया और मनोरंजन में सांस्कृतिक मूल्यों को अनिवार्य तत्व बनाया है। ये देश तकनीकी रूप से विकसित होने के बावजूद मूल्यहीनता को आधुनिकता का पर्याय नहीं मानते। भारत के लिए यह समय है कि वह अपनी सांस्कृतिक आत्मा को खोए बिना आधुनिकता की ओर बढ़े।

समस्या यह भी रही है कि ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ को एक ऐसे रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है जहाँ सभी सामाजिक और परंपरागत मान्यताएँ अप्रासंगिक बताई जाएँ। यह स्वतंत्रता जब मर्यादा खो देती है, तो वह स्वेच्छाचार बन जाती है। लोकतंत्र में अभिव्यक्ति का अधिकार उतना ही पवित्र है जितना उसका दुरुपयोग खतरनाक। समाज जब तक अपनी दिशाबोध खोए बिना स्वतंत्रता की सीमाएँ तय नहीं करेगा, तब तक अश्लीलता, हिंसा और विकृति का बाजार बढ़ता ही रहेगा।

आज ओटीटी की सामग्री केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सामाजिक मनोविज्ञान को प्रभावित करने वाला तंत्र बन चुकी है। जिस समाज में मनोरंजन संवेदना और मर्यादा पर भारी पड़ने लगे, वहाँ संस्कृति और भविष्य दोनों संकटग्रस्त हो जाते हैं। परिवार टूटने लगते हैं, संबंध उपभोग की वस्तु बन जाते हैं और जीवन मूल्य व्यंग्य का विषय। साहित्य परिषद् और सर्वोच्च न्यायालय की संयुक्त चिंता यह स्पष्ट करती है कि यह केवल ‘कंटेंट’ का मुद्दा नहीं, बल्कि ‘सामाजिक दिशा’ का प्रश्न है। यह आज का संकट नहीं, आने वाले वर्षों की संभावित आपदा का पूर्व संकेत है।

यदि समाज चाहता है कि उसकी भावी पीढ़ी संवेदनशील, मजबूत और मूल्यवान बने, तो ओटीटी के इस अनियंत्रित विस्तार को नियमन और मर्यादा की आवश्यकता है। यह केवल सरकार का दायित्व नहीं, बल्कि समाज, परिवार और शिक्षा संस्थानों की भी समान जिम्मेदारी है। भारत आत्मबोध के मार्ग पर खड़ा है। आत्मबोध तभी संभव है जब समाज अपनी मूल सांस्कृतिक चेतना को पहचानकर भविष्य की दिशा तय करे।

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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी