सत्य के शुद्धिकरण में असत्य का विचलित होना स्वाभाविक
कैलाश चंद्र भारत को विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है, किंतु आज प्रश्न आकार का नहीं रह गया है। वास्तविक प्रश्न यह है कि विश्व का सबसे विश्वसनीय लोकतंत्र कौन है। लोकतंत्र की प्रतिष्ठा और शक्ति मतदाताओं की मात्रा से नहीं, बल्कि उसकी शुचिता, पव
कैलाश चन्‍द्र जी


कैलाश चंद्र

भारत को विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है, किंतु आज प्रश्न आकार का नहीं रह गया है। वास्तविक प्रश्न यह है कि विश्व का सबसे विश्वसनीय लोकतंत्र कौन है। लोकतंत्र की प्रतिष्ठा और शक्ति मतदाताओं की मात्रा से नहीं, बल्कि उसकी शुचिता, पवित्रता और विश्वसनीयता से निर्धारित होती है। यही कारण है कि मतदाता शुद्धि क्रिया को केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया समझना भूल होगी; यह लोकतांत्रिक नैतिकता के पुनर्जागरण का वह राष्ट्रीय संकल्प है जो आने वाले समय में भारत के लोकतांत्रिक भविष्य की दिशा तय करने वाला है।

मतदाता सूची ही लोकतंत्र की वास्तविक रीढ़ है। यदि सूची दूषित हो जाए, मृत व्यक्तियों के नाम वर्षों तक दर्ज रहें, बाहरी घुसपैठिये नकली पहचान के आधार पर मतदान कर सकें या राजनीतिक स्वार्थों के कारण पसंद–नापसंद के अनुसार नाम जोड़े या हटाए जाएँ, तो लोकतंत्र केवल एक औपचारिक ढांचा बनकर रह जाता है जिसकी नींव खोखली होती चली जाती है। पिछले वर्षों में देश के अनेक हिस्सों में दोहरी प्रविष्टियों, मृत मतदाताओं के नाम, एक ही व्यक्ति के एकाधिक पते और संगठित मतांतरण जैसी गंभीर गड़बड़ियाँ उजागर हुईं। यह स्थिति केवल तकनीकी त्रुटि नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा पर एक गहरी चोट है, क्योंकि जिस सूची से जनमत का मूल्य निकले, यदि वही संदिग्ध हो जाए, तो जनमत का अर्थ क्या रह जाता है।

इसी पृष्ठभूमि में विशेष पुनरीक्षण की प्रक्रिया आशा और विश्वास की किरण बनकर सामने आई है। मतदाता शुद्धि क्रिया का उद्देश्य सरल है कि सही व्यक्ति का नाम सूची में रहे और असत्य या अमान्य नाम हटाए जाएँ, किंतु यह कार्य जितना सरल दिखाई देता है, उतना है नहीं। भारत जैसा विविधतापूर्ण और विशाल देश केवल आँकड़ों का भूगोल नहीं है। मतदाता सूची जनसांख्यिक संतुलन, संवैधानिक अधिकार, सामाजिक संरचना, स्थानीय सुरक्षा, धार्मिक–सांस्कृतिक बनावट और राजनीतिक समीकरणों से गहराई से जुड़ा दस्तावेज है। ऐसे में घर–घर सत्यापन, डिजिटल जाँच, दोहरे नामों की पहचान, मृत व्यक्तियों के विलोपन और नकली पहचान की जाँच जैसी कठोर प्रक्रियाएँ लोकतंत्र की मजबूती के लिए अनिवार्य साधन बन जाती हैं।

इस संदर्भ में बिहार का उदाहरण उल्लेखनीय है। दो दशक से अधिक समय बाद वहाँ जिस व्यापक पुनरीक्षण की शुरुआत हुई, वह देश के लिए एक आदर्श मॉडल बनकर उभरा। लाखों घरों का सत्यापन हुआ, करोड़ों निर्धारण प्रपत्र जमा हुए और सूची से उन लाखों नामों का विलोपन किया गया जो या तो वर्षों से मृत थे, दोहरे पते पर दर्ज थे या लंबे समय से स्थानांतरित हो चुके थे। सर्वोच्च न्यायालय ने भी स्पष्ट निर्देश देते हुए कहा कि हटाए गए प्रत्येक नाम का कारण सार्वजनिक किया जाए। यह केवल प्रशासनिक कठोरता नहीं, बल्कि लोकतंत्र की नैतिक शुचिता के प्रति एक अनिवार्य प्रतिबद्धता है। प्रश्न यह है कि यदि बिहार यह कर सकता है, तो देश के अन्य राज्यों के लिए यह प्रक्रिया अनिवार्य क्यों न बने।

मतदाता शुद्धि क्रिया केवल प्रशासन या चुनाव आयोग की जिम्मेदारी नहीं है। यह प्रत्येक जागरूक नागरिक का सामाजिक और नैतिक कर्तव्य है। हर नागरिक को अपने परिवार, समाज और मोहल्ले के मतदाताओं की सूची का सत्यापन स्वयं करना चाहिए। वृद्धों, अशिक्षितों, ग्रामीणों और दूरस्थ क्षेत्रों में रहने वाले उन नागरिकों की सहायता करना चाहिए जिनके लिए स्वयं सत्यापन कठिन है। समाज में झूठ, उन्माद और दुष्प्रचार फैलाने के स्थान पर मतदाता सूची को शुद्ध बनाने की जागरूकता ही सच्चा राष्ट्रधर्म है। नकली पहचान, फर्जी पते या दोहरी प्रविष्टि कराना केवल विधिक अपराध नहीं, बल्कि नैतिक अपराध भी है, और मतदान का निर्णय धर्म, जाति, लाभ या प्रलोभन के आधार पर नहीं, बल्कि राष्ट्रहित, सुरक्षा, चरित्र और सत्य के आधार पर होना चाहिए।

स्वाभाविक है कि जब सत्य का शुद्धिकरण होता है तो असत्य विचलित होता है। आज मतदाता शुद्धि क्रिया का विरोध मुख्यतः वही समूह कर रहे हैं जिनकी राजनीति फर्जी नामों पर टिकी है, जिन्हें जनसांख्यिक असंतुलन से लाभ मिलता है और जिनके लिए भारत की एकता, सुरक्षा और शुचिता से अधिक अपने वोट–समूह का स्वार्थ महत्वपूर्ण है। लोकतंत्र मृत व्यक्तियों के नामों या नकली पहचान वाले मतों पर आधारित नहीं रह सकता। राष्ट्रहित किसी भी जाति, भाषा, वर्ग या समुदाय के स्वार्थ से ऊपर होना चाहिए।

भारत के लोकतंत्र को सबसे अधिक क्षति वोटबैंक की विकृत संस्कृति ने पहुँचाई है। आज बहुसंख्यक अपने अधिकार की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहा है और अल्पसंख्यक को विशेषाधिकार देने की प्रतियोगिता बढ़ती चली जा रही है। न्याय व्यवस्था भी अनेक मामलों में पीड़ितों को वर्षों तक न्याय नहीं दे सकी। अंकित शर्मा और दिलबर नेगी जैसे युवकों की करुण मृत्यु से लेकर पालघर के साधुओं और गोधरा के कारसेवकों तक, अनेक पीड़ितों की आत्मा आज भी न्याय की प्रतीक्षा कर रही है और इन अन्यायों के मूल में नकली पहचान, संगठित मतांतरण और फर्जी प्रविष्टियों का बिगड़ा हुआ तंत्र भी शामिल रहा है। यदि मतदाता सूची शुद्ध होगी तो न्याय की दिशा भी शुद्ध होगी।

देश आज एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। आने वाले वर्षों में जनसांख्यिक संतुलन, राष्ट्रीय सुरक्षा, सांप्रदायिक तनाव, विदेशी तंत्रों का हस्तक्षेप और वैचारिक संघर्ष एक साथ बढ़ने वाले हैं। ऐसे समय में मतदाता शुद्धि केवल तकनीकी सुधार नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का विषय है। यदि सूची शुद्ध नहीं तो कोई भी विधानसभा, संसद या पंचायत वास्तविक जनमत का प्रतिनिधि नहीं मानी जा सकती।

इस अभियान की सफलता तभी सुनिश्चित होगी जब इसके कार्यकर्ताओं, विशेषकर कक्ष–स्तर अधिकारियों की सुरक्षा, गरिमा और मानवीय सहूलियतों की पूर्ण व्यवस्था की जाए। किसी भी अधिकारी का जीवन किसी प्रशासनिक परिणाम से अधिक मूल्यवान है। लोकतंत्र की शुचिता के इस महाअभियान में सबसे पहले उन लोगों का सम्मान होना चाहिए जो धरातल पर कार्य कर रहे हैं।

नागरिक कर्तव्य का पुनर्जागरण आज राष्ट्रीय आवश्यकता बन गया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने लोकजागरण अभियान में नागरिक कर्तव्य को जिस महत्व के साथ प्रस्तुत किया है, वह इस समय की माँग है। लोकतंत्र केवल मतपत्रों पर नहीं चलता, वह नागरिकों के संस्कार, जागरूकता, सत्यनिष्ठा और जिम्मेदारी पर आधारित होता है। जब नागरिक अपने कर्तव्यों को समझता है, तो उसके अधिकार स्वतः सुरक्षित हो जाते हैं और राष्ट्र का जीवन सुदृढ़ होता है। कर्तव्य वह सेतु है जो व्यक्ति को समाज से और समाज को राष्ट्र से जोड़ता है। आधुनिक चुनौतियों, विभाजनकारी प्रवृत्तियों, दुष्प्रचार और हिंसा के विरुद्ध एक सजग, अनुशासित और कर्तव्यपरायण नागरिक ही राष्ट्र की सुरक्षा कर सकता है।

आज समय का आह्वान है कि प्रत्येक नागरिक मतदाता शुद्धि क्रिया में सहयोग करे, अपने और अपने पड़ोस के नाम सत्यापित करे, फर्जी प्रविष्टियों को हटाने में सहयोग दे और लोकतंत्र को पवित्र बनाए। लोकतंत्र केवल अधिकारों की सूची नहीं, कर्तव्यों का अनुशासन है। यदि हम आज तटस्थ रहे तो इतिहास हमें क्षमा नहीं करेगा। यह अवसर केवल सूची सुधार का नहीं, बल्कि भारत के लोकतांत्रिक भविष्य को सुरक्षित करने का राष्ट्रीय अवसर है।

(लेखक, राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ मध्‍य क्षेत्र के प्रचार प्रमुख हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी