(नाग पंचमी/17 अगस्त/ विशेष) पारिस्थितिकी के पहरेदार
योगेश कुमार गोयल भारतीय संस्कृति की सबसे विशिष्ट विशेषताओं में एक यह है कि यहां प्रकृति को केवल संसाधन नहीं बल्कि जीवन का अभिन्न और पूजनीय अंग माना गया है। नदियों, पर्वतों, वृक्षों, पशु-पक्षियों और यहां तक कि धरती के भीतर रहने वाले जीवों के प्रति
योगेश कुमार गोयल


योगेश कुमार गोयल

भारतीय संस्कृति की सबसे विशिष्ट विशेषताओं में एक यह है कि यहां प्रकृति को केवल संसाधन नहीं बल्कि जीवन का अभिन्न और पूजनीय अंग माना गया है। नदियों, पर्वतों, वृक्षों, पशु-पक्षियों और यहां तक कि धरती के भीतर रहने वाले जीवों के प्रति भी श्रद्धा व्यक्त करने की परंपरा रही है। इसी व्यापक प्रकृति-दृष्टि का विशिष्ट पर्व है नाग पंचमी। इस साल नाग पंचमी 17 अगस्त को श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को है।

यह पर्व नागों के प्रति धार्मिक आस्था व्यक्त करने के साथ-साथ मनुष्य और वन्यजीवों के बीच सह-अस्तित्व की भारतीय अवधारणा को भी सामने लाता है। हिंदू धार्मिक परंपरा में नागों का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। भगवान शिव के गले में सुशोभित नाग हों, भगवान विष्णु की शेषनाग पर विराजमान दिव्य छवि हो अथवा समुद्र मंथन में वासुकि नाग की भूमिका, भारतीय पौराणिक आख्यानों में नाग बार-बार शक्ति, संरक्षण, रहस्य, अनंतता और प्रकृति की अदृश्य ऊर्जा के प्रतीक के रूप में सामने आते हैं।

यही कारण है कि नाग पंचमी पर नाग देवताओं की पूजा का विशेष विधान बताया गया है। कहीं नागों की प्रतिमाओं पर हल्दी, कुमकुम, अक्षत और पुष्प अर्पित किए जाते हैं तो कहीं मिट्टी अथवा कुश से नाग की आकृति बनाकर उसका पूजन किया जाता है। अलग-अलग क्षेत्रों में अनुष्ठानों की विधियां भिन्न हो सकती हैं लेकिन श्रद्धा का भाव लगभग समान है।

नाग पूजा की परंपरा कितनी प्राचीन है, इसका संकेत अनेक पौराणिक ग्रंथों और लोककथाओं में मिलता है। नागवंश की उत्पत्ति का संबंध महर्षि कश्यप और उनकी पत्नी कद्रू से जोड़ा गया है। नागों को पाताल लोक का निवासी बताया गया है। इसे आधुनिक भौगोलिक अवधारणा के रूप में देखने के बजाय प्राचीन भारतीय ब्रह्मांड-कल्पना के संदर्भ में समझना अधिक उचित है।

इन आख्यानों में नाग केवल भय उत्पन्न करने वाले जीव नहीं हैं बल्कि वे प्रकृति की ऐसी शक्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिन्हें मनुष्य पूरी तरह नियंत्रित नहीं कर सकता और जिनके साथ संतुलन बनाकर रहना आवश्यक है। नाग पंचमी की विशेषता केवल इतनी नहीं है कि इसमें नागों की पूजा की जाती है। इसकी सबसे बड़ी सांस्कृतिक विशेषता यह है कि यह मनुष्य को उस जीव के प्रति भी सम्मान करना सिखाती है, जिससे वह स्वाभाविक रूप से भयभीत रहता है।

सांप को देखकर मनुष्य की पहली प्रतिक्रिया अकसर डर होती है लेकिन भारतीय परंपरा ने इसी भय को श्रद्धा में बदलने का प्रयास किया। नाग को देवता मानने की परंपरा इस विचार को मजबूत करती है कि प्रकृति में प्रत्येक जीव का अपना महत्व है और मनुष्य को अपनी सुरक्षा के साथ-साथ अन्य जीवों के अस्तित्व का भी सम्मान करना चाहिए।

भारत के विभिन्न हिस्सों में नागों को केवल पौराणिक पात्र के रूप में नहीं बल्कि कुलदेवता, ग्राम देवता, क्षेत्रपाल और स्थान देवता के रूप में भी पूजा जाता रहा है। अनेक स्थानों के नाम भी नाग परंपरा से जुड़े दिखाई देते हैं। अनंतनाग, शेषनाग, नागपुर, नागालैंड और भागसूनाग जैसे नाम भारतीय सांस्कृतिक स्मृति में नागों की गहरी उपस्थिति की ओर संकेत करते हैं।

इस पर्व का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पक्ष इसका पर्यावरणीय महत्व है। आधुनिक विज्ञान ने यह स्पष्ट किया है कि सांप पारिस्थितिकी तंत्र के महत्वपूर्ण घटक हैं। खेतों और ग्रामीण क्षेत्रों में पाए जाने वाले अनेक सांप, चूहों तथा अन्य कृंतकों को खाते हैं। चूहे फसलों, अनाज और खाद्य भंडार को काफी नुकसान पहुंचाते हैं। ऐसे में सांप प्राकृतिक रूप से उनकी संख्या नियंत्रित करने में योगदान देते हैं। खाद्य- शृंखला में उनकी भूमिका जैविक संतुलन बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है।

सांपों की किसी प्रजाति के समाप्त होने का प्रभाव केवल उसी प्रजाति तक सीमित नहीं रहता बल्कि पूरे पारिस्थितिक तंत्र पर पड़ सकता है। दुर्भाग्य से नाग पंचमी की आस्था का लाभ उठाकर कुछ स्थानों पर सांपों को पकड़कर प्रदर्शित करने, उन्हें कैद रखने अथवा दूध पिलाने जैसी प्रथाएं भी देखने को मिलती हैं। वैज्ञानिक दृष्टि से सांपों को दूध पिलाना उनके प्राकृतिक व्यवहार का हिस्सा नहीं है। सांपों का शरीर दूध के लिए अनुकूलित नहीं होता और जबरन दूध पिलाना उनके स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह हो सकता है।

इसी प्रकार लंबे समय तक सांपों को कैद रखना, उन्हें शारीरिक रूप से प्रताड़ित करना या उनके प्राकृतिक आवास से निकालकर धार्मिक प्रदर्शन का साधन बनाना संरक्षण की भावना के विपरीत है। आस्था का सम्मान तभी सार्थक है, जब उसके नाम पर किसी जीव को पीड़ा न पहुंचाई जाए। सांपों की अनेक प्रजातियों को अवैध शिकार, आवासीय क्षेत्र में कमी, सड़क दुर्घटनाओं और मानव-सांप संघर्ष जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। उनकी खाल और अन्य जैविक उत्पादों के अवैध व्यापार ने भी कई प्रजातियों के सामने संकट खड़ा किया है। इसलिए नाग पंचमी को वन्यजीव संरक्षण के प्रति जागरूकता का अवसर बनाया जाना चाहिए।

लोगों को यह समझाना आवश्यक है कि प्रत्येक सांप विषैला नहीं होता और अधिकांश सांप मनुष्य से दूरी बनाए रखना ही पसंद करते हैं। घर या बस्ती में सांप दिखाई देने पर उसे मारने के बजाय प्रशिक्षित वन्यजीव बचाव दल की सहायता लेना अधिक सुरक्षित और जिम्मेदार व्यवहार है। सर्पदंश से बचाव और उसके उपचार के संबंध में भी वैज्ञानिक जागरुकता बेहद जरूरी है। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी कई बार सर्पदंश के बाद झाड़-फूंक या पारंपरिक उपचार पर निर्भरता देखी जाती है, जिससे उपचार में देरी हो सकती है।

सर्पदंश की स्थिति में तत्काल चिकित्सकीय सहायता प्राप्त करना जीवनरक्षक कदम हो सकता है। नाग पंचमी जैसे व्यापक जनसरोकार वाले पर्व को इस प्रकार की स्वास्थ्य और पर्यावरण संबंधी जागरूकता से जोड़ना समाज के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो सकता है। वास्तव में नाग पंचमी हमें केवल नागों की पूजा करने का अवसर नहीं देती बल्कि यह प्रश्न भी सामने रखती है कि प्रकृति के साथ हमारा व्यवहार कैसा होना चाहिए। यदि हम नाग देवता के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हैं, लेकिन वास्तविक सांपों को उनके आवास से निकालकर कष्ट पहुंचाते हैं तो हमारी आस्था का उद्देश्य अधूरा रह जाता है।

नागों के प्रति सच्चा सम्मान उन्हें सुरक्षित रहने देना, उनके आवासों की रक्षा करना और उनके प्रति वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करना है। नाग पंचमी भारतीय संस्कृति की उस जीवन-दृष्टि का पर्व है, जिसमें मनुष्य स्वयं को प्रकृति का स्वामी नहीं बल्कि उसका एक हिस्सा मानता है। पौराणिक आस्था और आधुनिक विज्ञान के बीच संवाद स्थापित करते हुए यह पर्व हमें सिखा सकता है कि श्रद्धा तभी सार्थक है, जब वह संरक्षण में बदल जाए।

नागों के प्रति सम्मान का अर्थ उनके जीवन और प्राकृतिक आवास की रक्षा करना है। यदि नाग पंचमी की धार्मिक चेतना जैव-विविधता संरक्षण, वन्यजीव करुणा और वैज्ञानिक जागरुकता से जुड़ जाए तो यह पर्व केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं रहेगा बल्कि मनुष्य और प्रकृति के बीच संतुलित सह-अस्तित्व का प्रभावशाली संदेश बन जाएगा। यही इस प्राचीन पर्व की आधुनिक प्रासंगिकता और इसकी सबसे बड़ी सार्थकता है।

(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / मुकुंद