अनूपपुर: अमरकंटक वन क्षेत्र में 30 साल बाद फिर बढ़ा साल बोरर का प्रकोप, 22 हजार साल वृक्ष संक्रमित
अनूपपुर, 19 जुलाई (हि.स.)। मध्य प्रदेश के अनूपपुर जिले के अमरकंटक वन परिक्षेत्र में लगभग तीन दशक बाद एक बार फिर साल बोरर (हार्टवुड बोरर) का प्रकोप बढ़ने लगा है। वन विभाग के वर्ष 2026-27 के सर्वेक्षण में साल के हजारों वृक्ष इस खतरनाक कीट से संक्रमित
साल बाेरर के कीडाे की माला


साल बाेरर कीडा


पेड से कीडा निकलते हुए


अनूपपुर, 19 जुलाई (हि.स.)। मध्य प्रदेश के अनूपपुर जिले के अमरकंटक वन परिक्षेत्र में लगभग तीन दशक बाद एक बार फिर साल बोरर (हार्टवुड बोरर) का प्रकोप बढ़ने लगा है। वन विभाग के वर्ष 2026-27 के सर्वेक्षण में साल के हजारों वृक्ष इस खतरनाक कीट से संक्रमित पाए गए हैं।

विभाग के अनुसार अमरकंटक वन परिक्षेत्र के 8,584 हेक्टेयर वन क्षेत्र के 18 कक्षों में लगभग 40 लाख साल के वृक्ष हैं, जिनमें करीब 22 हजार वृक्ष साल बोरर से प्रभावित मिले हैं। अभियान के दौरान अब तक 15 हजार से अधिक साल बोरर कीट पकड़े जा चुके हैं।

जानकारी के अनुसार अमरकंटक क्षेत्र में इससे पहले वर्ष 1995-96 में साल बोरर का बड़ा प्रकोप सामने आया था। उस समय शुरुआती स्तर पर नियंत्रण नहीं होने के कारण बड़ी संख्या में साल के वृक्ष संक्रमित हो गए थे और प्रभावित पेड़ों को काटकर जंगल से हटाना पड़ा था। इस बार संक्रमण अभी स्थानीय स्तर पर है और वन विभाग इसे नियंत्रित करने के लिए विशेष अभियान चला रहा है।

कैसे नुकसान पहुंचाता है साल बोरर

साल बोरर की इल्ली पेड़ की छाल को भेदकर तने के भीतर प्रवेश करती है और सैपवुड तथा हार्टवुड में सुरंगें बनाकर लकड़ी को नुकसान पहुंचाती है। इससे वृक्ष धीरे-धीरे कमजोर होकर सूखने लगता है। मानसून के दौरान वयस्क कीट बाहर निकलकर अन्य स्वस्थ वृक्षों को संक्रमित करते हैं, जिससे इस मौसम में संक्रमण तेजी से फैलने की आशंका रहती है।

अनूपपुर, डिंडौरी और छत्तीसगढ़ तक असर

वनमंडलाधिकारी डेविट डेविड व्यंकटराव चनाप के अनुसार अमरकंटक वन परिक्षेत्र के 17 कंपार्टमेंट में साल बोरर का प्रकोप दर्ज किया गया है। उन्होंने बताया कि अनूपपुर जिले में लगभग 10 हजार से अधिक साल वृक्ष प्रभावित होने का अनुमान है, जबकि पड़ोसी डिंडौरी जिले में करीब एक लाख वृक्ष साल बोरर से प्रभावित हैं। इसके अलावा छत्तीसगढ़ के सीमावर्ती वन क्षेत्रों में भी इस कीट का असर देखा जा रहा है।

ट्रैप ट्री ऑपरेशन से नियंत्रण की कोशिश

संक्रमण रोकने के लिए वन विभाग ने प्रभावित क्षेत्रों में विशेष ट्रैप ट्री ऑपरेशन शुरू किया है। इसके तहत रस छोड़ रहे संक्रमित वृक्षों को छह से सात टुकड़ों में काटकर जंगल में ही रखा जाता है। इनसे निकलने वाली गंध से आकर्षित होकर बड़ी संख्या में साल बोरर कीट इन लकड़ियों पर एकत्र हो जाते हैं। इसके बाद शाम से सुबह तक वनकर्मी और स्थानीय ग्रामीण इन्हें एकत्र कर संग्रहण केंद्र में जमा करते हैं, जहां निर्धारित प्रक्रिया के बाद इनका नष्टीकरण किया जाता है।

ग्रामीणों को मिलेगा प्रोत्साहन

वन विभाग ने इस अभियान में स्थानीय ग्रामीणों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए प्रत्येक पकड़े गए साल बोरर कीट पर दो रुपये का प्रोत्साहन तय किया है। सत्यापन के बाद राशि सीधे संबंधित ग्रामीण के बैंक खाते में भेजी जाती है। विभाग के अनुसार अब तक लगभग नौ हजार कीटों का नष्टीकरण किया जा चुका है।

देहरादून से पहुंचेगा वैज्ञानिक दल

साल बोरर के बढ़ते प्रकोप को देखते हुए भारतीय वानिकी अनुसंधान संस्थानों के वैज्ञानिकों का दल जल्द ही अमरकंटक पहुंचकर प्रभावित क्षेत्रों का अध्ययन करेगा। विशेषज्ञ कीट के व्यवहार, संक्रमण के कारणों और प्रभावी नियंत्रण के उपायों पर वैज्ञानिक अध्ययन करेंगे, ताकि भविष्य में इसके स्थायी प्रबंधन की रणनीति तैयार की जा सके।

साल बोरर का जीवनचक्र

वन विशेषज्ञों के अनुसार साल बोरर का जीवनचक्र लगभग एक वर्ष का होता है और यह मानसून से जुड़ा रहता है। जून में बारिश शुरू होते ही वयस्क कीट संक्रमित वृक्षों से बाहर निकलते हैं। मादा कीट छाल की दरारों में सामान्यतः 100 से 300 अंडे देती है, जिनसे तीन से सात दिन में लार्वा निकलते हैं। ये लार्वा कई महीनों तक तने के भीतर लकड़ी को नुकसान पहुंचाते हैं। दिसंबर से अप्रैल के बीच ये प्यूपा अवस्था में रहते हैं और अगले मानसून में वयस्क बनकर बाहर निकलते हैं, जिससे संक्रमण का नया चक्र शुरू हो जाता है।

वनमंडलाधिकारी डेविट डेविड व्यंकटराव चनाप ने बताया कि फिलहाल ग्रामीणों के सहयोग से व्यापक अभियान चलाया जा रहा है। यदि इससे अपेक्षित सफलता नहीं मिलती है तो संक्रमण रोकने के लिए अन्य वैज्ञानिक उपाय भी अपनाए जाएंगे।

हिन्दुस्थान समाचार / राजेश शुक्ला