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जयपुर, 29 मई (हि.स.)। राजस्थान उच्च न्यायालय ने डॉक्टर्स के बीच लंबे समय से चल रहे नॉन-प्रैक्टिसिंग अलाउंस और वेतन निर्धारण से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा है कि एनपीए नहीं लेने वाले डॉक्टर, जूनियर्स के बराबर या ज्यादा वेतन नहीं मांग सकते। ऐसे में जो डॉक्टर स्वेच्छा से एनपीए नहीं लेते और निजी प्रैक्टिस का विकल्प बनाए रखते हैं, वे उन डॉक्टर्स के बराबर वेतन नहीं मांग सकते, जिन्होंने एनपीए लेकर निजी प्रैक्टिस छोड़ दी है। अदालत ने कहा कि केवल सरकारी सेवा से मिलने वाले वेतन के आधार पर तुलना करना पूरी तरह से कृत्रिम और अधूरा है। कोई भी डॉक्टर, जो जानबूझकर निजी प्रैक्टिस जारी रखने का विकल्प चुनता है, वह उसके बाद उस प्रैक्टिस को छोड़ने से जुड़े वित्तीय लाभों की मांग नहीं कर सकता। जस्टिस आनंद शर्मा ने यह आदेश राज्य सरकार व अन्य की ओर से दायर करीब तीन दर्जन याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए दिए। इसके साथ ही अदालत ने सिविल सेवा अपीलीय अधिकरण के उस आदेश को यह कहते हुए रद्द कर दिया कि अधिकरण ने वैधानिक नियमों की अनदेखी कर समानता और सहानुभूति पर आदेश दिया है, जो कानून की नजरों में टिक नहीं सकता।
अदालत ने उन चिकित्सकों की याचिकाएं भी खारिज कर दी, जिनमें जूनियर के बराबर वेतन, स्टेपिंग-अप और एनपीए से जुड़े लाभ मांगे थे। अदालत ने कहा कि एनपीए वाला डॉक्टर निजी प्रैक्टिस का अधिकार छोड़ता है, जबकि एनपीए नहीं लेने वाला डॉक्टर निजी प्रैक्टिस से अतिरिक्त आय अर्जित कर सकता है। ऐसे में दोनों श्रेणियों के डॉक्टर समान स्थिति में नहीं हैं। राज्य सरकार के अतिरिक्त राजकीय अधिवक्ता अर्चित बोहरा ने अदालत को बताया कि राजस्थान सिविल सेवा संशोधित वेतनमान नियम, 2017 के तहत एनपीए लेने वाले डॉक्टरों के लिए अलग वेतन निर्धारण की व्यवस्था की गई है। एनपीए प्राप्त करना पूरी तरह वैकल्पिक है। जो डॉक्टर एनपीए लेते हैं, उन्हें निजी चिकित्सा प्रैक्टिस छोड़नी पड़ती है और हर साल निर्धारित प्रारूप में विकल्प व शपथ-पत्र देना होता है कि उन्होंने निजी प्रैक्टिस नहीं की है। इसके विपरीत एनपीए नहीं लेने वाले डॉक्टर निजी प्रैक्टिस कर सकते हैं और उससे आर्थिक लाभ ले सकते हैं। इन दोनों डॉक्टर्स को एक समान श्रेणी में नहीं रख सकते।
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हिन्दुस्थान समाचार / पारीक