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जयपुर, 29 मई (हि.स.)। राजस्थान उच्च न्यायालय ने एक आपराधिक मामले में कहा है कि प्रदेश में पर्याप्त जांच प्रयोगशालाएं उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे में पुलिस दूसरे राज्यों में स्थिति प्रयोगशालाओं की ओर से दी रिपोर्ट के आधार पर अपनी जांच कराने के लिए मजबूर है। जिससे जांच में अनावश्यक देरी होती है और अपराधी अक्सर इसी देरी का लाभ उठाना चाहते हें। ऐसे में अब समय आ गया है कि जांच करने वाले कर्मचारियों के पदों की संख्या बढाई जाए, ताकि समय पर एफएसएल रिपोर्ट मिल सके। अदालत ने यह भी कहा कि पुलिस जांच विंगों को मजबूत करना चाहिए और जांच में तेजी के प्रयास किए जाने चाहिए। अदालत ने कहा कि जांच में होने वाली देरी त्वरित सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन करती हैं। वहीं आलत ने आदेश की कॉपी मुख्य सचिव, एसीएस गृह और डीजीपी को भेजी है। जस्टिस अनूप कुमार की एकलपीठ ने यह आदेश प्रेम प्रकाश की ओर से दायर आपराधिक याचिका पर सुनवाई करते हुए दिए।
अदालत ने डीजी कानून व्यवस्था सहित अन्य अफसरों को आगामी सुनवाई 21 जुलाई को वीसी के जरिए अदालत से जुडने को कहा है।
अदालत ने कहा कि कई बार आपराधिक मामलों की जांच समय पर नहीं होती, क्योंकि जांच अधिकारी को ही कानून व्यवस्था का जिम्मा सौंप दिया जाता है। जिसके चलते उसे दोनों काम एक साथ करने में कठिनाई होती है। विधि आयोग की 154वीं रिपोर्ट में भी दोनों कामों के लिए अलग-अलग व्यवस्था करने को कहा गया है। इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट की ओर से प्रकाश सिंह के मामले में बीस साल पहले अलग-अलग विंग बनाने के संबंध में दिए आदेश की पालना आज तक नहीं हो पाई है। वहीं अदालत में उपस्थित एडीजी वीके सिंह सहित अन्य पुलिस अधिकारी अदालत में हाजिर हुए। एडीजी सिंह की ओर से कहा गया कि अदालती आदेश की पालना में डीजीपी ने एक कमेटी गठित की है। जिसने रिपोर्ट दी है कि पुलिस थानों में अलग-अलग कानून व्यवस्था, अनुसंधान और प्रशासनिक विंग स्थापित की जाएगी। इसके लिए पायलट प्रोजेक्ट के लिए 20 पुलिस थानों को चिन्हित किया गया है। रिपोर्ट में यह भी माना गया कि शहरी पुलिस थानों में एक जांच अधिकारी के पास 40 से 70 मुकदमों की जांच रहती है। वहीं महिला अपराध और संपत्ति से जुडे मामले में सजा का प्रतिशत भी 40 से 50 फीसदी के बीच है। सभी पक्षों को देखने के बाद अदालत ने पुलिस प्रशासन को लेकर दिशा-निर्देश जारी किए हैं।
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हिन्दुस्थान समाचार / पारीक